अल्लाह तआला की ज़ात-ए-गिरामी, अपनी खूबियों व कमालात में यकता और बे-मिसाल है, जिसने अदम के पर्दों को चाक करके वजूद की खूबसूरत कहानी रक़म की। ख़लाओं को वुसअत अता की, खामोशी को नग़्मगी बख्शी।
सिर्फ एक कलिमा-ए-“कुन” से कायनात को तख़्लीक़ का जामा पहनाया।
वह बे-मिसाल मुसव्विर है जिसने नीलगूँ आसमानों को, कहकशाओं के नगीनों से, आरास्ता किया। सितारों को नूर के ज़ेवर पहनाए, चाँद को रात का झूमर बनाया, गुल-ओ-लाला की मख़मली चादर बिछाकर ज़मीन का हुस्न दोबारा किया।
समुंदर की गहराई को आबी अजाइब और मोतियों से सजाया, हवाओं में साँसों की मिठास घोली। और यह सब कुछ इंसानों के लिए मुसख़्ख़र (वश में) कर दिया।
وَسَخَّرَ لَكُم مَّا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الْأَرْضِ جَمِيعًا مِّنْهُ (अल-जासिया)
“और अल्लाह तआला ने आसमानों और ज़मीन में जो कुछ भी है तुम्हारे लिए मुसख़्ख़र फ़रमाया।”
ख़ाक से बने इंसान को अपनी तख़्लीक़ का शाहकार बनाया, वजूद बख़्शा, अक़्ल-ओ-शऊर की रोशनी अता की, और इसके दिल के निहाँ-ख़ानों में अपनी मारिफ़त का चिराग़ रोशन किया।
इंसान, जिसकी हैसियत कायनात के बहर-ए-बेकराँ (असीमित समंदर) में एक ज़र्रे से ज़्यादा कुछ भी नहीं, उसे अशरफ़-उल-मख़लूक़ात और अपनी नेमतों का अमीन बना दिया।
وَلَقَدْ كَرَّمْنَا بَنِیْۤ اٰدَمَ وَ حَمَلْنٰهُمْ فِی الْبَرِّ وَ الْبَحْرِ وَ رَزَقْنٰهُمْ مِّنَ الطَّیِّبٰتِ وَ فَضَّلْنٰهُمْ عَلٰى كَثِیْرٍ مِّمَّنْ خَلَقْنَا تَفْضِیْلًا
(अल-इसरा: 70)
“और बेशक हमने औलाद-ए-आदम को इज़्ज़त बख़्शी और उन्हें खु़श्की और तरी में सवार किया और उनको साफ़-सुथरी चीज़ों से रिज़्क दिया और उन्हें अपनी बहुत सी मख़लूक़ पर बरतरी (श्रेष्ठता) अता की।”
वह रब्ब-ए-रहमान है, जिसकी रहमत इंसान, चरिंद-परिंद, पेड़-पौधे हत्ता कि बे-जान पत्थरों पर भी साया-फ़गन है।
وَرَحْمَتِي وَسِعَتْ كُلَّ شَيْءٍ (अल-आराफ़: 156)
“और मेरी रहमत हर चीज़ पर वसीअ (व्यापक) है।”
वह ग़फ़ूर-ओ-रहीम है, जो गुनाहों के अंबार पर मग़फ़िरत की बारिश बरसाता है, ख़ताओं पर नज़र-ए-करम डालता और उज़्र (क्षमा याचना) को शरफ़-ए-क़बूलियत बख़्शता है।
نَبِّئْ عِبَادِي أَنِّي أَنَا الْغَفُورُ الرَّحِيم (अल-हिज्र: 49)
“मेरे बंदों को बता दो कि मैं बहुत माफ़ करने वाला, रहम करने वाला हूँ।”
वह अलीम-ओ-ख़बीर है, जो दिलों की धड़कनों, नियतों के राज़, और आँखों की नमी से भी वाक़िफ़ है।
وَأَنَّ اللَّـهَ بِكُلِّ شَيْءٍ عَلِيمٌ (अल-मायदा: 97)
“और बेशक अल्लाह तआला हर चीज़ को जानने वाले हैं।”
वह समी-ओ-बसीर है, जो रात की तन्हाइयों में टपकते आँसुओं को देखता, और दिल की बे-ज़बान आहों को सुनता है।
إِنَّ اللَّـهَ لاَ يَخْفَىٰ عَلَيْهِ شَيْءٌ فِي الْأَرْضِ وَلَا فِي السَّمَاء (आल-ए-इमरान: 5)
“बेशक अल्लाह तआला से कोई चीज़ भी छुपी हुई नहीं है, न ज़मीन में न आसमान में।”
إِنَّهُ بِكُلِّ شَيْءٍ بَصِيرٌ (अल-मुल्क: 19)
“बेशक वह हर चीज़ को देखने वाला है।”
ज़रा सोचिए!
एक माँ की ममता, जब अपने नन्हे-मुन्ने बच्चे की मामूली सदा (आवाज़) पर तड़प जाती है, तो वह पालनहार जो बेशुमार माओं से ज़्यादा मेहरबान है, जिसके ख़ज़ाने में कोई कमी नहीं आती, जो ग़नी और मुग़नी (बे-नियाज़ और मालामाल करने वाला) है।
क्या वह अपने बंदे की फ़रियाद से ग़ाफ़िल रह सकता है? क्या वह अपने बंदे की आह-ओ-ज़ारी को नज़रअंदाज़ करेगा?
हरगिज़ नहीं!
वह ख़ुद फ़रमाता है:
ادْعُونِي أَسْتَجِبْ لَكُمْ (अल-ग़ाफ़िर: 60)
“मुझे पुकारो, मैं तुम्हारी पुकार सुनूँगा।”
इस रब्ब-ए-करीम ने क़ुरआन-ए-हकीम में बार-बार अपना तआरुफ़ (परिचय) कराया है, ताकि बंदों को अपने मालिक की अज़मत-ओ-किबरियाई का इदराक (बोध) हो। और वे अपनी हाजतें, ज़रूरतें, दर्द-ओ-दुख और परेशानियाँ अपने मुश्किल कुशा, हाजत रवा पालनहार के सामने रख सकें।
चुनाँचे इरशाद है:
قُلْ هُوَ اللَّهُ أَحَدٌ ٭ اللَّهُ الصَّمَدُ ٭ لَمْ يَلِدْ وَلَمْ يُولَدْ ٭ وَلَمْ يَكُن لَّهُ كُفُوًا أَحَدٌ (अल-इख़्लास)
“कह दो: वह अल्लाह यकता (एक) है। अल्लाह बे-नियाज़ है। न उसकी कोई औलाद है, न वह किसी की औलाद है। और न ही कोई उसके बराबर है।”
اللَّـهُ خَالِقُ كُلِّ شَيْءٍ وَهُوَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ وَكِيلٌ (अज़-ज़ुमर: 62)
“अल्लाह तआला हर चीज़ के ख़ालिक़ और हर चीज़ पर निगहबान हैं।”
أَنَّ اللَّهَ يَبْسُطُ الرِّزْقَ لِمَن يَشَاءُ وَيَقْدِرُ (अज़-ज़ुमर: 52)
“अल्लाह तआला जिसके लिए चाहते हैं रिज़्क़ को कुशादा (ज़्यादा) करते हैं और तंग करते हैं।”
يُدَبِّرُ الْأَمْرَ مِنَ السَّمَاءِ إِلَى الْأَرْضِ (अज़-सजदा: 5)
“वह आसमान से ज़मीन तक तमाम कामों की तदबीर फ़रमाते हैं।”
وَمَا مِن دَابَّةٍ فِي الْأَرْضِ إِلَّا عَلَى اللَّـهِ رِزْقُهَا (हूद: 6)
“रूए ज़मीन पर जो भी मख़लूक़ात हैं सब का रिज़्क़ अल्लाह तआला के ज़िम्मे है।”
عِنْدَهُ مَفَاتِحُ الْغَيْبِ لَا يَعْلَمُهَا إِلَّا هُوَ (अल-अनआम: 59)
“ग़ैब की कुंजियाँ अल्लाह तआला के पास हैं उनके सिवा उन्हें कोई नहीं जानता।”
وَكَفَىٰ بِرَبِّكَ هَادِيًا وَنَصِيرًا (अल-फ़ुरक़ान: 31)
“और ऐ नबी, रहनुमा और मददगार होने के एतबार से आपका रब्ब काफ़ी है।”
لَهُ مُلْكُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ يُحْيِي وَيُمِيتُ وَهُوَ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ (अल-हदीद: 2)
“आसमानों और ज़मीन की बादशाही अल्लाह तआला ही के लिए है, ज़िंदगी और मौत वही देते हैं और वह हर चीज़ पर कुदरत रखने वाले हैं।”
لَيْسَ كَمِثْلِهِ شَيْءٌ ۖ وَهُوَ السَّمِيعُ الْبَصِيرُ (अश-शूरा: 11)
“अल्लाह तआला जैसा कोई नहीं, और वह ख़ूब सुनने वाले, ख़ूब देखने वाले हैं।”
وَرَبُّكَ الْغَنِيُّ ذُو الرَّحْمَةِ ۚ إِن يَشَأْ يُذْهِبْكُمْ وَيَسْتَخْلِفْ مِن بَعْدِكُم مَّا يَشَاءُ (अल-अनआम: 133)
“और आपका रब्ब बे-नियाज़ है, रहमत वाला है, अगर चाहे तो तुम्हें हलाक कर दे और तुम्हारी जगह जिसे चाहे ले आए।”
أَمَّنْ يُجِيبُ الْمُضْطَرَّ إِذَا دَعَاهُ وَيَكْشِفُ السُّوءَ (अन-नमल: 62)
“भला वह कौन है जो बेक़रार व मजबूर की दुआ सुनता है और तकलीफ़ को दूर करता है?”
قُل لَّا أَمْلِكُ لِنَفْسِي نَفْعًا وَلَا ضَرًّا إِلَّا مَا شَاءَ اللَّـهُ (अल-आराफ़: 188)
“ऐ नबी ﷺ आप कह दीजिए कि मैं अपनी ज़ात के लिए भी नफ़ा या नुक़सान का मालिक नहीं सिवाए इसके जो अल्लाह तआला चाहें।”
हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हु रिवायत करते हैं कि नबी ﷺ ने फ़रमाया:
وَإِذَا سَأَلْتَ فَاسْأَلِ ٱللَّهَ، وَإِذَا ٱسْتَعَنْتَ فَٱسْتَعِنۢ بِٱللَّهِ، وَٱعْلَمْ أَنَّ ٱلْأُمَّةَ لَوِ ٱجْتَمَعَتْ عَلَىٰٓ أَن يَنفَعُوكَ بِشَىْءٍۢ لَمْ يَنفَعُوكَ إِلَّا بِشَىْءٍۢ قَدْ كَتَبَهُ ٱللَّهُ لَكَ، وَإِنِ ٱجْتَمَعُوا۟ عَلَىٰٓ أَن يَضُرُّوكَ بِشَىْءٍۢ لَمْ يَضُرُّوكَ إِلَّا بِشَىْءٍۢ قَدْ كَتَبَهُ ٱللَّهُ عَلَيْكَ، رُفِعَتِ ٱلْأَقْلَٰمُ وَجَفَّتِ ٱلصُّحُفُ
(तिर्मिज़ी)
जब तुम सवाल करो तो सिर्फ़ अल्लाह तआला से करो और जब मदद माँगो तो सिर्फ़ अल्लाह तआला से माँगो।
और जान लो! अगर सारी उम्मत (दुनिया के सारे लोग) तुम्हें कोई फ़ायदा पहुँचाने पर जमा हो जाएँ, तो भी वे तुम्हें कोई फ़ायदा नहीं पहुँचा सकते मगर वही जो अल्लाह तआला ने तुम्हारे लिए लिख दिया है।
और अगर वे सब तुम्हें नुक़सान पहुँचाने पर मुत्तहिद (एकजुट) हो जाएँ तो वे तुम्हें कुछ भी नुक़सान नहीं पहुँचा सकते मगर वही जो अल्लाह तआला ने तुम पर लिख दिया है। क़लम उठा दिए गए हैं और सहीफ़े ख़ुश्क हो चुके हैं (यानी तक़दीर लिख दी गई है)।
ऐसे बे-मिसाल, बे-नज़ीर परवरदिगार की सिफ़ात व कमालात समझना उन पर ग़ौर-ओ-फ़िक्र करना, उसकी नेमतों व एहसानात का तज़किरा, उससे दुआ-ओ-इस्तग़फ़ार, और ज़िंदगी के तमाम लम्हात में उसकी रज़ामंदी का ख़याल रखना ही ज़िक्रुल्लाह है।
ज़िक्र, दर-अस्ल दिल के झुकाव, रूह की लर्ज़िश, आँखों की नमी, और बंदगी के जज़बात से लबरेज़ एक मुकम्मल कैफ़ियत का नाम है।
ज़िक्र, इंसान को बंदगी का शऊर देता है और ज़िंदगी को इसका हक़ीक़ी मक़सद अता करता है।
ज़िक्र, दिल को सुकून बख़्शता और रूह को बुलंदी की तरफ़ ले जाता है।
ज़िक्र, अल्लाह तआला की अज़मत-ओ-किबरियाई के एहसास के साथ, ख़ौफ़-ओ-ख़शियत से लरज़ा दिल की गहराइयों से उठने वाली सदा है, जो बंदे को उसके ख़ालिक़ से जोड़ देती है।
ज़िक्र का लुग़वी (शाब्दिक) मानी
याद करना, तज़किरा करना, बयान करना है।
الذِّكْرُ نقيضُ النسيانِ، وهو الحِفْظُ للشيء (लिसानुल अरब)
ज़िक्र, भूल की ज़िद (उल्टा) है और किसी चीज़ को याद करना या याद रखना, ज़िक्र कहलाता है।
इस्तलाह (परिभाषा) में “ज़िक्रुल्लाह” से मुराद अल्लाह तआला को दिल से याद करना, ज़बान से उनकी बड़ाई बयान करना और उनकी इतात-ओ-फ़रमाबरदारी करना है।
क़ुरआन करीम में ज़िक्र मुतअद्दिद (अनेक) मअनों में इस्तेमाल हुआ है।
याद करना, पुकारना
وَ اذْكُرْ رَّبَّكَ فِیْ نَفْسِكَ تَضَرُّعًا وَّ خِیْفَةً وَّ دُوْनَ الْجَهْرِ مِنَ الْقَوْلِ بِالْغُدُوِّ وَ الْاٰصَالِ وَ لَا تَكُنْ مِّنَ الْغٰفِلِیْنَ (अल-आराफ़: 205)
“और अपने रब्ब को दिल ही दिल में आजिज़ी और ख़ौफ़ के साथ सुबह-ओ-शाम पुकारो मगर ऊँची आवाज़ में नहीं और ग़ाफ़िलों में से न हो जाना।”
فَاذۡكُرُوۡنِىۡٓ اَذۡكُرۡكُمۡ وَاشۡکُرُوۡا لِىۡ وَلَا تَكۡفُرُوۡنِ (अल-बक़रह: 152)
“तुम मुझे याद करो मैं तुम्हें याद करूँगा और मेरा शुक्र अदा करते रहो और मेरी नाशुक्र गुज़ारी न करो।”
यानी किसी अमल के वक़्त तुम मेरे हुक्म को याद रखो, मैं तुमको उस अमल की जज़ा (प्रतिफल) से याद करूँगा।
तुम मुझे इबादत और इतात से याद करो मैं तुमको अज्र-ओ-सवाब से याद करूँगा।
तुम मुझे दुआ व इल्तिजा की दर्द भरी आवाज़ से पुकारोगे, तो मैं तुम पर अपनी अताओं और रहमतों की बारिश बरसा दूँगा।
याद रखिये ज़िक्र महज़ तस्बीह के दानों को शुमार करने का नाम नहीं, बल्कि दिल के इख़्लास, अमल की सच्चाई और नियत की सफ़ाई का नाम है।
इसी तरह शुक्र गुज़ारी सिर्फ़ ज़बान की मदह-सराई (तारीफ़) नहीं, बल्कि दिल के झुकाव, अमल की वफ़ादारी और नेमतों का एतराफ़ है।
नसीहत, क़ुरआन करीम
اِنَّا نَحۡنُ نَزَّلۡنَا الذِّكۡرَ وَاِنَّا لَهٗ لَحٰـفِظُوۡنَ (अल-हिज्र: 9)
“बेशक हमने ही नसीहत (क़ुरआन करीम) नाज़िल किया है और बेशक हम ही इसकी हिफ़ाज़त करने वाले हैं।”
وَمَنْ أَعْرَضَ عَن ذِكْرِى فَإِنَّ لَهُۥ مَعِيشَةًۭ ضَنكًۭا (ता-हा: 124)
“और जो मेरे ज़िक्र (मेरे नाज़िल कर्दा क़ुरआन) से मुँह मोड़ेगा उसकी ज़िंदगी तंग हो जाएगी।”
وَمَنْ أَعْرَضَ عَن ذِكْرِي، أَيْ خَالَفَ أَمْرِي وَمَا أَنزَلْتُهُ عَلَى رَسُولِي (इब्न-ए-कसीर)
तज़किरा करना, बयान करना।
ذِكْرُ رَحْمَتِ رَبِّكَ عَبْدَهٗ زَكَرِیَّا (मर्यम: 2)
“यह बयान है तेरे रब्ब की उस रहमत का जो उसने अपने बंदा ज़करिया पर की।”
हमारे आइडियल, हज़रत नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की पूरी ज़िंदगी अल्लाह तआला के ज़िक्र (याद) से लबरेज़ थी।
और क्यों न हो?
जब सबसे बड़ी चीज़, अल्लाह तआला का ज़िक्र (याद) ही है।
इरशाद है:
وَلَذِكْرُ اللَّهِ أَكْبَرُ (अल-अंकबूत: 45)
“और अल्लाह तआला की याद सबसे बड़ी चीज़ है।”
नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इरशाद फ़रमाते हैं:
أَلَا أُنَبِّئُكم بِخَيْرِ أعمالِكُم ، وأَزْكاها عِندَ مَلِيكِكُم وأَرفعِها في دَرَجاتِكُم ۔۔۔۔۔۔ قال : ذِكْرُ اللهِ (तिर्मिज़ी, इब्न-ए-माजा)
“क्या मैं तुम्हें तुम्हारे सबसे बेहतरीन अमल के बारे में न बताऊँ?… वह अल्लाह की याद है।”
अल्लाह तआला का ज़िक्र, ज़िंदगी को राह-ए-रास्त पर लाने का सबसे बेहतर ज़रिया है। अगर इंसान को अल्लाह तआला की सिफ़ात व कमालात का इल्म और अपने हक़ीक़ी मोहसिन (उपकारी) की मारिफ़त हो, तो लाज़मी तौर पर उसका दिल-ओ-दिमाग़ उसे बार-बार मुतन्ब्ये (सचेत) करेगा कि:
“ख़बरदार! ऐसा कोई अमल न करना जो तुम्हारे पालनहार की नाराज़गी का मूजिब (कारण) बने।”
क्योंकि….
तुम्हारा रब्ब हर वक़्त तुम्हें देख रहा है।
तुम्हारा हर अमल उसके दफ़्तर में रिकॉर्ड हो रहा है।
और तुम्हें आख़िरत में उसके सामने खड़ा होना और अपने हर अमल का जवाब देना है।
अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाते हैं:
وَأَمَّا مَنْ خَافَ مَقَامَ رَبِّهِ وَنَهَى النَّفْسَ عَنِ الْهَوَىٰ فَإِنَّ الْجَنَّةَ هِيَ الْمَأْوَى (अन-नाज़िआत: 40-41)
“और जो अल्लाह तआला के सामने जवाबदेही के लिए खड़ा होने से डरा और इस डर की बुनियाद पर ख़ुद को ख़्वाहिशात-ए-नफ़्स की पैरवी से रोक लिया, उसका ठिकाना जन्नत है।”
हसन बसरी रहमतुल्लाह अलैह कहते हैं कि अल्लाह तआला का ज़िक्र यह है कि इंसान गुनाह का इरादा बनाए और उसे ख़याल आ जाए कि अल्लाह तआला के सामने जवाब देना है और फिर उससे बाज़ आ जाए।
هُوَ الرَّجُلُ يُهِمُّ بِالذَّنْبِ، ثُمَّ يَذْكُرُ مَقَامَ اللَّهِ عَلَيْهِ فَيَتْرُكُهُ (इब्न-ए-कसीर)
“एक शख़्स, किसी गुनाह का इरादा करे, फिर उसे अल्लाह तआला के सामने खड़े होने का ख़याल आए और वह अल्लाह तआला से डर कर अपने इरादे से बाज़ आ जाए।”
अल्लाह तआला ने नमाज़ का मक़सद भी ज़िक्र-ए-इलाही क़रार दिया है।
इरशाद फ़रमाया:
إِنَّنِي أَنَا اللَّـهُ لَا إِلَـهَ إِلَّا أَنَا فَاعْبُدْنِي وَأَقِمِ الصَّلَاةَ لِذِكْرِي (ता-हा: 14)
“बेशक मैं ही अल्लाह हूँ मेरे सिवा कोई माबूद नहीं लिहाज़ा मेरी ही इबादत करो और नमाज़ मेरी याद के लिए क़ायम करो।”
इसी तरह नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हमें तालीम दी कि:
हर अमल की इब्तिदा (शुरुआत) अल्लाह तआला के नाम (बिस्मिल्लाह) से हो और हर नेमत पर, अल्हम्दुलिल्लाह कहकर, अल्लाह तआला का शुक्र अदा किया जाए।
आप ﷺ हर लम्हा अपने रब्ब की याद में महव (मग्न) रहते थे।
घर से निकलते हुए कहते:
بِسْمِ اللّٰهِ تَوَكَّلْتُ عَلَى اللّٰهِ (बिस्मिल्लाहि तवक्कलतु अलल्लाहि)
“अल्लाह तआला के नाम से मैं निकल रहा हूँ और मैंने अल्लाह तआला की ज़ात पर भरोसा किया।”
घर में दाख़िल होते हुए फ़रमाते:
اَللّٰھُمَّ إِنِّيْ أَسْئَلُكَ خَیْرَ الْمَوْلَجِ وَخَیْرَ الْمَخْرَجِ بِسْمِ اللّٰهِ وَلَجْنَا، وَعَلَی اللّٰهِ رَبِّنَا تَوَکَّلْنَا (अल्लाहुम्मा इन्नी असअलुका ख़ैरुल मौलजि व ख़ैरुल मख़रजि बिस्मिल्लाहि वलज्ना व अलल्लाहि रब्बिना तवक्कलना)
“ऐ अल्लाह! मैं आप से सवाल करता हूँ कि मेरे अपने घर में आने, जाने को बेहतर बना दें। हम अल्लाह तआला का नाम लेकर दाख़िल हुए, और अल्लाह तआला पर भरोसा किया।”
खाने से पहले फ़रमाते:
بِسْمِ اللّٰهِ وَعَلٰی بَرَكَةِ اللّٰهِ (बिस्मिल्लाहि व अला बरकतिल्लाहि)
“अल्लाह तआला के नाम से और इसी की बरकत पर खाता हूँ।”
खाने के बाद अल्लाह तआला का शुक्र बजा लाते, और कहते:
الْحَمْدُ لِلّٰهِ الَّذِي أَطْعَمَنَا وَسَقَانَا وَجَعَلَنَا مِنَ الْمُسْلِمِينَ (अल्हम्दुलिल्लाहिल्लज़ी अत-अमना व सक़ाना व जा-अलना मिनल मुस्लिमीन)
“शुक्र है उस रब्ब का, जिसने हमें खिलाया, पिलाया और हमें इस्लाम की नेमत से नवाज़ा।”
सोने से क़ब्ल (पहले) कहते:
اللَّهُمَّ بِاسْمِكَ أَمُوتُ وَأَحْيَا (अल्लाहुम्मा बि-इस्मका अमुतु व अह्या)
“ऐ अल्लाह! मैं आपके नाम पर सोता हूँ और आपके नाम पर जागता हूँ।”
बेदार होते (जागते) वक़्त फ़रमाते:
الْحَمْدُ لِلّٰهِ الَّذِي أَحْيَانَا بَعْدَ مَا أَمَاتَنَا وَإِلَيْهِ النُّشُورُ (अल्हम्दुलिल्लाहिल्लज़ी अह्याना बाद मा अमातना व इलैहिन-नुशूर)
“शुक्र है उस अल्लाह तआला का जिसने हमें नींद की मौत के बाद ज़िंदगी बख़्शी और हम उसी की तरफ़ लौटाए जाएँगे।”
मस्जिद में दाख़िल होते वक़्त ज़बान पर होता:
اللَّهُمَّ افْتَحْ لِي أَبْوَابَ رَحْمَتِكَ (अल्लाहुम्मफ़-तह ली अबवाबा रहमतिक)
“ऐ अल्लाह! मेरे लिए अपनी रहमत के दरवाज़े खोल दीजिए।”
मस्जिद से निकलते हुए या रोज़ी की तलाश में जाते वक़्त फ़रमाते:
اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ مِنْ فَضْلِكَ (अल्लाहुम्मा इन्नी असअलुका मिन फ़ज़्लिक)
“ऐ अल्लाह! मैं आप से आपके फ़ज़ल का सवाल करता हूँ।”
ग़रज़ ये कि आप ﷺ की कोई भी नशिस्त-ओ-बर्ख़ास्त (उठना-बैठना) अल्लाह तआला के ज़िक्र से ख़ाली नहीं थी।
मगर वाज़ेह रहे कि नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने ज़िक्रुल्लाह के इन कलमात के लिए कहने और बोलने का लफ़्ज़ इस्तेमाल किया है, पढ़ने का नहीं।
और कहने और बोलने का ताल्लुक़ ज़बान के साथ दिल-ओ-दिमाग़ और समझ-बूझ से भी होता है।
मतलब साफ़ है कि ज़िक्र का दर्जा उन्हीं कलमात को हासिल होगा जो समझकर बोले जाएँ।
बिना समझे-बूझे बच्चों की तरह महज़ अल्फ़ाज़ का विर्द, मतलूबा (वांछित) ज़िक्र के दायरे में नहीं आएगा।
नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने तो नमाज़ के अज़कार पर भी अज्र-ओ-सवाब के लिए, उन्हें समझने की शर्त लगाई है।
चुनांचे इरशाद है:
ان العبد ليصلي الصلاة لا يكتب له سدسها ولا عشرها وانما يكتب للعبد من صلاته ما عقل منها
(मुसनद अहमद, अबू दाऊद, नसाई, इब्न-ए-हिब्बान)
“बंदा नमाज़ अदा करता है, उसके लिए उसकी नमाज़ का छठा, और न ही दसवाँ हिस्सा लिखा जाता है। बल्कि बंदे के लिए उसकी नमाज़ में से उतना ही लिखा जाता है (उतना ही अज्र मिलता है) जितना उसने समझकर अदा किया है।”
यह हदीस कई जगह मिलते-जुलते अल्फ़ाज़ में मज़कूर (वर्णित) है।
अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हु फ़रमाया करते थे कि:
ليس لك من صلاتك، إلاَّ ما عقلت منها
“तुम्हें तुम्हारी नमाज़ में से उतना ही मिलेगा जितना तुमने समझकर अदा किया होगा।”
इमाम ग़ज़ाली रहमतुल्लाह अलैह ‘एहया-उल-उलूम’ में लिखते हैं:
وقال عبد الواحد بن زيد أجمع العلماء على أنه ليس للعبد من صلاته إلا ما عقل منها فجعله إجماعا وما نقل من هذا الجنس عن الفقہاء المتورعین و علماء الأخرة اكثر من أن يحصي
कि अब्दुल वाहिद बिन ज़ैद कहते हैं कि इस बात पर उलमा का इज्मा (सहमति) है कि बंदे को उसकी नमाज़ में से उतना ही (अज्र) मिलेगा, जितना उसने समझकर अदा किया होगा।
और मज़ीद कहते हैं कि इस सिलसिले में अस्हाब-ए-वरअ व तक़वा (परहेज़गार) फ़ुक़्हा-ए-किराम और आख़िरत का इल्म रखने वालों से इस क़दर मनक़ूल (वर्णित) है, जिसका अहाता नहीं किया जा सकता।
और फ़रमाते हैं कि:
अगर कोई शख़्स नमाज़ को बिना समझे अदा करे तो उसकी नमाज़ अदा तो हो जाएगी, उसके लिए दोहराना ज़रूरी नहीं है, मगर…
فلا تجب عليه الإعادة وإن كان لا أجر له فيها ولا ثواب، فهو بمنزلة الصائم الذي لم يدع قول الزور والعمل به فليس له من صيامه إلا الجوع والعطش، وإلى هذا ذهب أكثر أهل العلم منهم الأئمة الأربعة، وهو الصحيح -إن شاء الله- فإن النصوص والآثار دلت على أن الأجر والثواب مشروط بالحضور، ولا تدل على وجوب الإعادة لا باطنا ولا ظاهراً. والله أعلم
ऐसी नमाज़ का कोई अज्र-ओ-सवाब नहीं मिलेगा। ऐसा शख़्स उस रोज़ेदार के मानिंद है जो रोज़े की हालत में भी झूठ वग़ैरह नहीं छोड़ता।
जिस तरह उसको भूख-प्यास के अलावा कुछ नहीं मिलेगा, इसी तरह ऐसे नमाज़ी को भी मेहनत और खड़े रहने के अलावा कुछ नहीं मिलेगा।
इसी तरफ़ अक्सर अहल-ए-इल्म गए हैं, अइम्मा-ए-अरबा रहमहुमुल्लाह का भी यही मौक़िफ़ है क्योंकि नुसूस व आसार इसी पर दलालत करते हैं कि अज्र-ओ-सवाब हुज़ूर-ए-क़ल्ब के साथ मश्रूत (शर्तिया) है।
अलबत्ता नमाज़ दोहराने की कोई दलील नहीं है।
अल्लामा इब्न-ए-क़य्यिम रहमतुल्लाह अलैह कहते हैं कि:
ولهذا لا يقبلها الله تعالى منه، وإن أسقطت الفرض في أحكام الدنيا، ولا يثيبه عليها؛ فإنه ليس للعبد من صلاته إلا ما عقل منها ..
(अल-वा बिलुस्सैय्यिब)
ऐसे शख़्स की नमाज़ मक़बूल नहीं होगी जो नमाज़ के अज़कार वग़ैरह को न समझता हो और इस पर उसे कोई अज्र भी नहीं मिलेगा।
हाँ, दुनियावी एतबार से फ़र्ज़ उससे साक़ित (ख़त्म) हो जाएगा यानी दुनिया में उस पर बे-नमाज़ी होने का हुक्म नहीं लगेगा, क्योंकि:
لیس للعبد من صلوته الا ما عقل منھا
“किसी को भी उसकी नमाज़ में से उतना ही (अज्र) मिलेगा जितना उसने समझकर अदा किया होगा।”
(अल-वा बिलुस्सैय्यिब)
बुख़ारी और मुस्लिम में है कि:
الْمُصَلِّي يُنَاجِي رَبَّهُ (अल-मुसल्ली युनाजी रब्बहु)
“नमाज़ अदा करने वाला अपने रब्ब से राज़-ओ-नियाज़ की बात करता है।”
और क्या कोई शख़्स बातचीत के लिए ऐसे अल्फ़ाज़ व कलमात इस्तेमाल करता है जिनका मतलब ख़ुद उसे ही न मालूम हो?
नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इरशाद फ़रमाते हैं:
كَمْ مِنْ قَائِمٍ حَظُّهُ مِنْ قِيَامِهِ التَّعَبُ وَالنَّصَبُ (नसाई, अन अबी हुरैरा)
“कितने नमाज़ी ऐसे हैं कि उनकी नमाज़ से सिर्फ़ थकन और मशक़्क़त ही उनके हिस्से में आती है।”
ज़िक्र-ए-इलाही के क़ुरआनी तरीक़े
तख़लीक़-ए-कायनात में ग़ौर-ओ-ख़ौज़ (ब्रह्मांड की रचना पर चिंतन)
إِنَّ فِي خَلْقِ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَاخْتِلَافِ اللَّيْلِ وَالنَّهَارِ لَآيَاتٍ لِّأُولِي الْأَلْبَابِ (आल-ए-इमरान: 190)
“बेशक आसमानों और ज़मीन की पैदाइश में और रात-ओ-दिन के बदलने में अक़्ल वालों के लिए निशानियाँ हैं।”
الَّذِينَ يَذْكُرُونَ اللَّـهَ قِيَامًا وَقُعُودًا وَعَلَى جُنُوبِهِمْ وَيَتَفَكَّرُونَ فِي خَلْقِ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ رَبَّنَا مَا خَلَقْتَ هَـذَا بَاطِلًا (आल-ए-इमरान: 191)
“जो लोग, खड़े, बैठे और लेटे हर हाल में अल्लाह तआला को याद करते हैं, और आसमान-ओ-ज़मीन की तख़लीक़ पर ग़ौर करते हैं। और कहते हैं: ऐ हमारे रब्ब! आपने इन्हें बेकार नहीं पैदा किया है।”
अल्लाह तआला की सिफ़ात व कमालात और उसके एहसानात का तज़किरा करना और लोगों के सामने उन्हें बयान करना।
فَاذْكُرُوا اللَّهَ كَذِكْرِكُمْ آبَاءَكُمْ أَوْ أَشَدَّ ذِكْرًا (अल-बक़रह: 200)
“अल्लाह को इस तरह याद करो जैसे तुम अपने आबा-ओ-अजदाद (पूर्वजों) को याद करते हो, बल्कि उससे भी ज़्यादा।”
आबा-ओ-अजदाद को याद करने का तरीक़ा: आम तौर पर उनके एहसानात याद करना या ख़ूबियाँ बयान करना हुआ करता है।
तन्हाई में, अपनी बेबसी के इज़हार और नाराज़गी के ख़ौफ़ के साथ अल्लाह तआला को याद करना और अपने किए पर माफ़ी माँगना।
وَاذْكُر رَّبَّكَ فِي نَفْسِكَ تَضَرُّعًا وَخِيفَةً (अल-अअराफ़)
“अपने रब्ब को दिल ही दिल में आज़ज़ी और ख़ौफ़ के साथ याद करो।”
ऐसी मजलिसों में शिरकत करना जिनमें अल्लाह तआला का ज़िक्र हो रहा हो, मसलन क़ुरआन करीम व अहादीस-ए-मुबारका की तफ़हीम व तशरीह के प्रोग्राम वग़ैरह।
अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाते हैं:
وَذَكِّرْ بِالْقُرْآنِ مَن يَخَافُ وَعِيدِ (क़ाफ़)
“और क़ुरआन करीम के ज़रिया उसे नसीहत करो जो मेरी वईद (चेतावनी) से डरता है।”
हदीस-ए-कुदसी है:
يَذْكُرُنِي فِي مَلَإٍ، أَذْكُرْهُ فِي مَلَإٍ خَيْرٍ مِنْهُمْ
(बुख़ारी)
“जब मेरा बंदा मुझे मजलिस में याद करता है तो मैं भी उसे उससे बेहतर (फ़रिश्तों की) मजलिस में याद करता हूँ।”
किसी ने क्या खूब कहा है:
रश्क करते हैं मलक ऐसी ज़मीं पर असअद जिस पे दो चार घड़ी ज़िक्रे ख़ुदा होता है
सहाबा-ए-किराम रज़ियल्लाहु अन्हुम का तरीक़ा-ए-ज़िक्र
عَنْ مُعَاوِيَةَ رَضِيَ اللهُ عَنْهُ قَالَ
خَرَجَ رَسُولُ اللّٰهِ ﷺ عَلَى حَلْقَةٍ مِنْ أَصْحَابِهِ، فَقَالَ
مَا أَجْلَسَكُمْ؟
قَالُوا: جَلَسْنَا نَذْكُرُ اللّٰهَ وَنَحْمَدُهُ عَلَى مَا هَدَانَا لِلْإِسْلَامِ، وَمَنَّ بِهِ عَلَيْنَا
قَالَ: آللّٰهِ مَا أَجْلَسَكُمْ إِلَّا ذَاكَ؟
قَالُوا: وَاللّٰهِ مَا أَجْلَسَنَا إِلَّا ذَاكَ قَالَ
أَمَا إِنِّي لَمْ أَسْتَحْلِفْكُمْ تُهْمَةً لَكُمْ، وَلٰكِنَّهُ أَتَانِي جِبْرِيلُ فَأَخْبَرَنِي أَنَّ اللّٰهَ يُبَاهِي بِكُمُ الْمَلَائِكَةَ. (مسلم ، ترمذی ، نسائی)
हज़रत मुआविया रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है वह फ़रमाते हैं:
रसूलुल्लाह ﷺ सहाबा-ए-किराम रज़ियल्लाहु अन्हुम के एक हलक़े (घेरे) के पास तशरीफ़ लाए और फ़रमाया:
“तुम किस लिए यहाँ बैठे हो?”
उन्होंने अर्ज़ किया:
“हम अल्लाह तआला का ज़िक्र कर रहे हैं और अल्लाह तआला के एहसानात व इनामात पर उनका शुक्र अदा कर रहे हैं कि अल्लाह तआला ने हमें इस्लाम की हिदायत अता फ़रमाई और हम पर एहसान किया।”
आप ﷺ ने फ़रमाया:
“अल्लाह की क़सम! क्या तुम वाक़ई इसी लिए बैठे हो?”
उन्होंने अर्ज़ किया:
“अल्लाह की क़सम! हम सिर्फ़ इसी नीयत से बैठे हैं।”
आप ﷺ ने फ़रमाया:
“मैंने तुमसे बदगुमानी की वजह से क़सम नहीं ली, बल्कि मेरे पास जिब्रईल (अलैहिस्सलाम) आए और उन्होंने मुझे ख़बर दी कि अल्लाह तआला तुम पर फ़रिश्तों के सामने फ़ख्र कर रहे हैं।”
दौर-ए-सहाबा में ज़िक्रुल्लाह की शक्ल आज के मुरव्वजा (प्रचलित) औराद-ओ-वज़ाइफ़ से मुख़्तलिफ़ (अलग) थी।
सहाबा-ए-किराम के मामूलात में अमल करने के इरादे से, क़ुरआन करीम की तिलावत करना, ज़िंदगी के हर काम में अल्लाह तआला से मदद माँगना और तकमील (पूरा होने) पर अल्लाह तआला का शुक्र अदा करना, रात की तन्हाइयों में अल्लाह तआला के सामने रोना, गिड़गिड़ाना शामिल था।
उनका असल वज़ीफ़ा अल्लाह तआला और रसूल-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से सच्ची मोहब्बत, इख़लास और दीन की सरबुलंदी के लिए क़ुर्बानी थी।
हज़रत अबूबक्र सिद्दीक़ रज़ियल्लाहु अन्हु को जब किसी मामले में परेशानी होती तो फ़ौरन सजदे में गिर जाते, और कहते:
“ऐ मेरे अल्लाह! मुझे मेरे नफ़्स के हवाले न करना।”
उनका वज़ीफ़ा इख़लास, तक़वा और तवाज़ो (विनम्रता) था।
हज़रत उमर फ़ारूक़ रज़ियल्लाहु अन्हु बार-बार यह दुआ माँगा करते थे:
“ऐ अल्लाह! आप मेरे हर अमल को नेक और ख़ालिस अपनी रज़ा के लिए बना दीजिए।”
हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसूद रज़ियल्लाहु अन्हु:
रोज़ाना क़ुरआन करीम की तिलावत करते, और रसूलुल्लाह ﷺ की सिखाई गई दुआएँ अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बनाए हुए थे।
ज़िक्रुल्लाह के असरात व फ़वाइद (प्रभाव और लाभ):
अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाते हैं:
إِنَّمَا الْمُؤْمِنُونَ الَّذِينَ إِذَا ذُكِرَ اللَّهُ وَجِلَتْ قُلُوبُهُمْ وَإِذَا تُلِيَتْ عَلَيْهِمْ آيَاتُهُ زَادَتْهُمْ إِيمَانًا وَعَلَى رَبِّهِمْ يَتَوَكَّلُونَ۔
“असल मोमिन तो वही हैं कि जब (उनके सामने) अल्लाह का ज़िक्र किया जाए तो अल्लाह तआला की अज़मत-ओ-किबरियाई और नाराज़गी के एहसास से उनके दिल डर जाते हैं और जब उनको अल्लाह तआला की आयतें सुनाई जाती हैं तो आयात की समझ और उनमें ग़ौर-ओ-तदब्बुर की बिना पर उनके ईमान, इस्तहज़ार व तवक्कुल में इज़ाफ़ा हो जाता है और वह अपने रब्ब ही पर भरोसा रखते हैं।”
इरबाज़ बिन सारिया रज़ियल्लाहु अन्हु रिवायत करते हैं:
عَنْ أَبِي نَجِيحٍ الْعِرْبَاضِ بْنِ سَارِيَةَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ قَالَ: وَعَظَنَا رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ مَوْعِظَةً وَجِلَتْ مِنْهَا الْقُلُوبُ وَذَرَفَتْ مِنْهَا الْعُيُونُ (अबू दाऊद, तिर्मिज़ी)
वह कहते हैं कि:
“हज़रत रसूलुल्लाह ﷺ ने हमें वअ़्ज़ (उपदेश) फ़रमाया, ऐसा वअ़्ज़ कि जिससे दिल ख़ौफ़ की वजह से काँप उठे और आँखों से आँसू रवाँ (जारी) हो गए।”
ज़िंदगी की वसतत़ों (विस्तार) में अगर कोई शय इंसान को थामे रखती है, तो वह अल्लाह तआला की याद है। दुनिया के हंगामे, वक़्त के तूफ़ान, और तक़दीर की उलट-फेर में वही शख़्स साबित क़दम रहता है जिसके दिल का मरकज़-ओ-महवर (केंद्र) सिर्फ़ अल्लाह तआला की ज़ात हो।
जो शख़्स अपने परवरदिगार की याद को दिल में बसा लेता है, उसका वजूद गो कि ज़मीन पर होता है, मगर उसकी रूह अर्श-ए-इलाही से जुड़ी रहती है। वह अपनी राहों में अकेला नहीं होता, क्योंकि उसके साथ वह ज़ात-ए-ग्रामी होती है जिसका ऐलान है:
فَاذْكُرُونِي أَذْكُرْكُمْ
“तुम मुझे याद करो, मैं तुम्हें याद रखूँगा।” (अल-बक़रह)
यह वादा, यह निस्बत, यह तअल्लुक़, बंदे को बंदगी की मेराज तक ले जाता है। जिस दिल को यह यक़ीन हासिल हो जाए कि मेरा रब्ब मुझे देख रहा है, सुन रहा है, मेरे दुखों को जानता है, और मेरी ख़ामोश दुआओं का सामिअ (सुनने वाला) है, वह दिल कभी मायूस नहीं होता, कभी बेचैन नहीं होता। वह सब्र को जीने का हुनर, शुक्र को ज़िंदगी का ज़ेवर और अल्लाह तआला की रज़ा को अपनी फ़ितरत बना लेता है।
ऐसा शख़्स जानता है कि अगर दुनिया उसे छोड़ दे, तब भी उसका मालिक उसके साथ है। अगर सारे दरवाज़े बंद हो जाएँ, तो भी आसमान का दरवाज़ा उसके लिए हमेशा खुला है।
अगर ज़मीन तंग हो जाए, तो भी दिल की खेत में रब्ब की याद फूलों की मानिंद खिलती रहती है।
याद-ए-इलाही सिर्फ़ सजदों तक महदूद नहीं, बल्कि यह हर हाल, हर कैफ़ियत, हर लम्हा, हर अमल में रब्ब की तरफ़ मुतवज्जह रहने का नाम है।
यही वह ज़िक्र-ए-दायमी है जो इंसान को रब्ब से जोड़ देता है।
अब न वह ख़ुशी में ग़ाफ़िल होता है, न ग़म में शाकी (शिकायत करने वाला)।
उसकी कामयाबी उसे मग़रूर नहीं बनाती और नाकामी उसे मायूस नहीं करती, क्योंकि वह जानता है…
وَهُوَ مَعَكُمْ أَيْنَ مَا كُنتُمْ
“और वह (अल्लाह तआला) तुम्हारे साथ है, जहाँ कहीं भी तुम हो।”
दुनिया की फ़ानी (नश्वर) कामयाबियाँ कुछ लम्हों की ख़ुशी दे सकती हैं, लेकिन याद-ए-इलाही दिल को दुनिया व आख़िरत का दायमी सुकून अता करती है।
यह तअल्लुक़ वह ख़ज़ाना है जो हर कमी को दूर कर देता है, अंधेरे में रोशनी बन जाता है और थकन में तवानाई (ऊर्जा)।
ऐसा बंदा, चलता दुनिया में है मगर दिल आख़िरत की तरफ़ रवाँ-दवाँ होता है।
वह ख़ल्क़त (सृष्टि) से रिश्ता निभाता है, मगर मोहब्बत अपने ख़ालिक़ (स्रष्टा) से करता है।
वह मसरूफ़ होता है, मगर ग़ाफ़िल नहीं होता।
वह रोता है, मगर शिकायत नहीं करता।
वह मुस्कुराता है, मगर फ़ख्र नहीं करता।
और यही वह मक़ाम है जहाँ बंदा ‘अब्द’ बन जाता है, जहाँ बंदगी महज़ इताअत (आज्ञाकारिता) नहीं बल्कि इश्क़ बन जाती है।
أَلَا بِذِكْرِ اللَّهِ تَطْمَئِنُّ الْقُلُوبُ
“ख़बरदार! दिलों को इत्मीनान सिर्फ़ अल्लाह तआला की याद से हासिल होता है।”
आइए! हम भी अपनी ज़िंदगियों को याद-ए-इलाही से महकाएँ, ताकि हमारी साँसें भी इबादत बन जाएँ, और हमें भी बंदगी की मेराज हासिल हो।




