इस्लाम में इख़्लास और सच्चाई की बहुत ज़्यादा अहमियत है। ईमान की असल बुनियाद यही है कि दिल, ज़बान और अमल में यकसानीयत (समानता) हो। मगर बाज़ लोग ज़ाहिरी तौर पर इस्लाम का दावा करते हैं, मगर उनके दिल में ईमान नहीं होता। ऐसे लोगों को “मुनाफ़िक़” कहा जाता है और उनके इस दोगले रवैये को “निफ़ाक़” कहा जाता है।
निफ़ाक़ की तारीफ़ (परिभाषा):
निफ़ाक़ का लुग़वी (शाब्दिक) माना है “किसी चीज़ के अंदर छुप जाना” या “धोखा देना”।
इस्तलाह (तकनीकी शब्दावली) में निफ़ाक़ का मतलब यह है कि इंसान ज़ाहिरी तौर पर मुसलमान होने का दावा करे मगर हक़ीक़त में अपने अंदर कुफ़्र और बे-ईमानी को छुपाए रखे।
अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाते हैं:
إِنَّ الْمُنَافِقِينَ يُخَادِعُونَ اللَّهَ وَهُوَ خَادِعُهُمْ (अन्-निसा: 142)
“बेशक मुनाफ़िक़ अल्लाह तआला को धोखा देने की कोशिश करते हैं, हालाँकि वह खुद को ही धोखा दे रहे होते हैं।”
निफ़ाक़ की क़िस्में:
इस निफ़ाक़ से इंसान इस्लाम से ख़ारिज (बाहर) हो जाता है और अगर इसी हालत में उसकी मौत हो जाए तो हमेशा के लिए उसका ठिकाना जहन्नम होगा।
▪ निफ़ाक़-ए-ऐतक़ादी की मिसालें ▪
- दिल में इस्लाम से बुग़्ज़ (द्वेष) रखना, मगर ज़बान से ईमान का दावा करना।
- क़ुरआन करीम की किसी आयत या अल्लाह तआला के रसूल ﷺ की किसी बात को (जो सरीह व मोतबर संदों से साबित हो) झुठलाना।
- अल्लाह तआला के दुश्मनों से मोहब्बत और मुसलमानों से दुश्मनी रखना।
- दीन का मज़ाक़ उड़ाना या इस्लामी अहकाम को हल्का समझना।
अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाते हैं:
إِنَّ الْمُنَافِقِينَ فِي الدَّرْكِ الْأَسْفَلِ مِنَ النَّارِ (अन्-निसा: 145)
“बेशक मुनाफ़िक़ जहन्नम के सबसे निचले दर्जे में होंगे।”
निफ़ाक़-ए-अमली
इस निफ़ाक़ से इंसान इस्लाम से तो ख़ारिज (बाहर) नहीं होता, मगर यह उसके आमाल को बर्बाद कर देता है और अगर तौबा न करे तो यह भी आख़िरत में ख़तरनाक साबित हो सकता है।
▪ निफ़ाक़-ए-अमली की मिसालें:
- झूठ बोलना।
- वादा-ख़िलाफ़ी करना।
- अमानत में ख़यानत करना।
- धोखा देना।
रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
آيَةُ الْمُنَافِقِ ثَلَاثٌ: إِذَا حَدَّثَ كَذَبَ، وَإِذَا وَعَدَ أَخْلَفَ، وَإِذَا ائْتُمِنَ خَانَ (बुखारी: 33, मुस्लिम: 59)
“मुनाफ़िक़ की तीन अलामतें (निशानियाँ) हैं: जब बात करे तो झूठ बोले, जब वादा करे तो ख़िलाफ़-वर्ज़ी करे, और जब उसके पास अमानत रखी जाए तो ख़यानत करे।”
मुनाफ़िक़ीन की निशानियाँ
▪ धोखा देना
يُخَادِعُونَ اللَّهَ وَالَّذِينَ آمَنُوا وَمَا يَخْدَعُونَ إِلَّا أَنفُسَهُمْ وَمَا يَشْعُرُونَ (अल-बक़रह: 9)
“वह अल्लाह तआला और ईमान वालों को धोखा देना चाहते हैं, मगर हक़ीक़त में वह खुद को ही धोखा दे रहे हैं, मगर उन्हें शऊर (बोध) नहीं।”
▪ ज़बान और दिल में तज़ाद (विरोधाभास) ▪
يَقُولُونَ بِأَفْوَاهِهِم مَّا لَيْسَ فِي قُلُوبِهِمْ (आल इमरान: 167)
“वे अपनी ज़बान से वह बात कहते हैं जो उनके दिलों में नहीं होती।”
▪ वादा-ख़िलाफ़ी ▪
وَمِنْهُم مَّنْ عَاهَدَ اللَّهَ لَئِنْ آتَانَا مِن فَضْلِهِ لَنَصَّدَّقَنَّ وَلَنَكُونَنَّ مِنَ الصَّالِحِينَ (75) فَلَمَّا آتَاهُم مِّن فَضْلِهِ بَخِلُوا بِهِ وَتَوَلَّوا وَّهُم مُّعْرِضُونَ (76) (अत-तौबा: 75-76)
“और उनमें से कुछ वे हैं जिन्होंने अल्लाह तआला से वादा किया कि अगर वह हमें अपने फ़ज़ल (कृपा) से नवाज़ेगा तो हम ज़रूर सदक़ा करेंगे और नेकोकारों में से होंगे। फिर जब अल्लाह तआला ने उन्हें अपने फ़ज़ल से नवाज़ दिया तो वे बुख़्ल (कंजूसी) करने लगे और पीठ फेरकर (वादा-ख़िलाफ़ी करते हुए) फिर गए।”
▪ मोमिनों को नुक़सान पहुँचाने की कोशिश ▪
“هُمُ الْعَدُوُّ فَاحْذَرْهُمْ” (अल-मुनाफ़िक़ून: 4)
“यही (मुनाफ़िक़) तुम्हारे दुश्मन हैं, पस इनसे होशियार रहो।”
▪ कुफ़्र और ईमान के दरम्यान झूलना ▪
कभी वे मुसलमानों के साथ नज़र आते हैं और कभी कुफ़्फ़ार के साथ जा मिलते हैं।
अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाते हैं:
مُّذَبْذَبِينَ بَيْنَ ذَٰلِكَ لَا إِلَىٰ هَٰؤُلَاءِ وَلَا إِلَىٰ هَٰؤُلَاءِ ۚ وَمَن يُضْلِلِ اللَّهُ فَلَن تَجِدَ لَهُ سَبِيلًا (अन्-निसा: 143)
“वे (मुनाफ़िक़ीन) बीच में मुअल्लक़ (लटके हुए) हैं, न इन (मुसलमानों) की तरफ़ होते हैं और न इन (काफ़िरों) की तरफ़, और जिसे अल्लाह गुमराह कर दे तो फिर तू उसके लिए कोई रास्ता न पाएगा।”
और एक मक़ाम पर इरशाद है:
وَإِذَا لَقُوا الَّذِينَ آمَنُوا قَالُوا آمَنَّا وَإِذَا خَلَوْا إِلَىٰ شَيَاطِينِهِمْ قَالُوا إِنَّا مَعَكُمْ إِنَّمَا نَحْنُ مُسْتَهْزِئُونَ (14) اللَّهُ يَسْتَهْزِئُ بِهِمْ وَيَمُدُّهُمْ فِي طُغْيَانِهِمْ يَعْمَهُونَ (15) (अल-बक़रह: 14-15)
“और जब ये ईमान वालों से मिलते हैं तो कहते हैं कि हम भी ईमान लाए हैं, और जब अपने शैतानों (सरदारों) के पास जाते हैं तो कहते हैं: हम तो तुम्हारे साथ हैं, हम तो सिर्फ़ (मुसलमानों से) इस्तहज़ा (मज़ाक़) कर रहे थे। अल्लाह तआला उनको उनकी सरकशी में ढील देकर उनके इस्तहज़ा का जवाब दे रहे हैं।”
▪ नमाज़ में सुस्ती और रियाकारी ▪
وَإِذَا قَامُوا إِلَى الصَّلَاةِ قَامُوا كُسَالَى يُرَاءُونَ النَّاسَ وَلَا يَذْكُرُونَ اللَّهَ إِلَّا قَلِيلًا (अन्-निसा: 142)
“और जब वे नमाज़ के लिए खड़े होते हैं तो सुस्ती के साथ खड़े होते हैं, मक़सद लोगों को दिखाना होता है और अल्लाह को बहुत कम याद करते हैं।”
लोगों के सामने मजबूरन नमाज़ अदा करते हैं ताकि किसी को उनके कुफ़्र का पता न चल सके।
रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
أَرْبَعٌ مَنْ كُنَّ فِيهِ كَانَ مُنَافِقًا خَالِصًا، وَمَنْ كَانَتْ فِيهِ خَصْلَةٌ مِنْهُنَّ كَانَتْ فِيهِ خَصْلَةٌ مِنْ النِّفَاقِ حَتَّى يَدَعَهَا: إِذَا اؤْتُمِنَ خَانَ، وَإِذَا حَدَّثَ كَذَبَ، وَإِذَا عَاهَدَ غَدَرَ، وَإِذَا خَاصَمَ فَجَرَ (बुखारी व मुस्लिम)
“चार बातें ऐसी हैं कि जिसमें ये सब हों वह ख़ालिस (पक्का) मुनाफ़िक़ है, और जिसमें इनमें से एक हो, तो उसमें निफ़ाक़ की एक ख़स्लत (आदत) है जब तक कि वह उसे तर्क (छोड़) न कर दे:
- जब उसके पास अमानत रखी जाए तो ख़यानत करे
- जब बात करे तो झूठ बोले
- जब अहद (वादा) करे तो धोखा दे
- और जब झगड़ा करे तो हद से तजावुज़ करे (यानी गाली-गलौज और बद-कलामी करे)।”
(सहीह बुखारी, सहीह मुस्लिम)
नबी करीम ﷺ ने इरशाद फ़रमाया:
آيَةُ الْمُنَافِقِ ثَلَاثٌ: إِذَا حَدَّثَ كَذَبَ، وَإِذَا وَعَدَ أَخْلَفَ، وَإِذَا اؤْتُمِنَ خَانَ۔ (وَفِي رِوَايَةٍ: وَإِنْ صَامَ وَصَلَّى وَزَعَمَ أَنَّهُ مُسْلِمٌ) (मुस्लिम, किताबुल ईमान, बाब बयाने खिसाले मुनाफ़िक़)
“मुनाफ़िक़ की तीन निशानियाँ हैं: जब बात करे तो झूठ बोले, जब वादा करे तो ख़िलाफ़-वर्ज़ी करे, और जब उसके पास अमानत रखी जाए तो ख़यानत करे।”
(एक रिवायत में यह भी है): “चाहे वह रोज़ा रखे, नमाज़ पढ़े और अपने आप को मुसलमान समझे।”
(सहीह मुस्लिम, किताबुल ईमान, बाब बयाने खिसाले मुनाफ़िक़)
निफ़ाक़ के नुक़सानात
▪ आख़िरत में सख़्त तरीन अज़ाब
अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाते हैं कि: إِنَّ الْمُنَافِقِينَ فِي الدَّرْكِ الْأَسْفَلِ مِنَ النَّارِ “मुनाफ़िक़ जहन्नम के सबसे निचले दर्जे में होंगे।” (अन्-निसा: 145)
▪ नेकियों का ज़ाया (बर्बाद) हो जाना
मुनाफ़िक़ का कोई भी नेक अमल क़बूल नहीं होता, क्योंकि उसका दिल इख़्लास (शुद्धता) से ख़ाली होता है।
अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाते हैं:
وَمَا مَنَعَهُمْ أَن تُقْبَلَ مِنْهُمْ نَفَقَاتُهُمْ إِلَّا أَنَّهُمْ كَفَرُوا بِاللَّهِ وَبِرَسُولِهِ وَلَا يَأْتُونَ الصَّلَاةَ إِلَّا وَهُمْ كُسَالَىٰ وَلَا يُنفِقُونَ إِلَّا وَهُمْ كَارِهُونَ (अत-तौबा: 54)
“और उनके सदक़ात (खैरात) क़बूल न होने की यही वजह है कि उन्होंने अल्लाह तआला और उसके रसूल का इंकार किया, और वे नमाज़ के लिए नहीं आते मगर सुस्ती के साथ, और वे ख़र्च नहीं करते मगर नागोवारी के साथ।”
मुनाफ़िक़ का अमल अल्लाह तआला के यहाँ बे-वक़्त (मूल्यहीन) है।
रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
إِنَّ اللَّهَ لَا يَقْبَلُ مِنَ الْعَمَلِ إِلَّا مَا كَانَ لَهُ خَالِصًا وَابْتُغِيَ بِهِ وَجْهُهُ (नसई: सहीह अल-जामे)
“बेशक अल्लाह तआला किसी अमल को क़बूल नहीं फ़रमाते मगर वह जो ख़ालिस उसी के लिए हो और उसके ज़रिए अल्लाह तआला की रज़ा मतलूब (वांछित) हो।”
▪ मुनाफ़िक़ीन से बे-एतमादी ▪
मुनाफ़िक़ की दोगली पॉलिसी की वजह से लोग उस पर भरोसा नहीं करते।
अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाते हैं:
وَيَحْلِفُونَ بِاللَّهِ إِنَّهُمْ لَمِنكُمْ وَمَا هُم مِّنكُمْ وَلَٰكِنَّهُمْ قَوْمٌ يَفْرَقُونَ (56) لَوْ يَجِدُونَ مَلْجَأً أَوْ مَغَارَاتٍ أَوْ مُدَّخَلًا لَّوَلَّوْا إِلَيْهِ وَهُمْ يَجْمَحُونَ (57) (अत-तौबा: 56-57)
“और वे अल्लाह तआला की क़समें खाते हैं कि वे तुम ही में से हैं, हालाँकि वे तुम में से नहीं हैं, बल्कि वे ऐसे लोग हैं जो (तुमसे) डरते हैं। अगर उन्हें कोई पनाह की जगह, कोई ग़ार (गुफा) या (कहीं छुपने का) रास्ता मिल जाए तो वे फ़ौरन वहाँ भाग जाएँगे।”
▪ निफ़ाक़ से बचने के तरीक़े ▪
- नमाज़ को इख़्लास और ख़ुशू-ओ-ख़ुज़ू के साथ अदा करना।
मुनाफ़िक़ीन बा-दिल-ना-ख़्वास्ता (बेमन से) नमाज़ अदा करते हैं, मोमिन को चाहिए कि वह दिल लगाकर नमाज़ अदा करे।
▪ सच बोलने की आदत डालना ▪
عَلَيْكُمْ بِالصِّدْقِ، فَإِنَّ الصِّدْقَ يَهْدِي إِلَى الْبِرِّ، وَإِنَّ الْبِرَّ يَهْدِي إِلَى الْجَنَّةِ (सहीह बुखारी, सहीह मुस्लिम)
“सच्चाई इख़्तियार करो, क्योंकि सच्चाई नेकी की तरफ़ ले जाती है और नेकी जन्नत की तरफ़ ले जाती है।”
▪ अमानतदारी और वादे की पाबंदी करना ▪
अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाते हैं:
إِنَّ اللَّهَ يَأْمُرُكُمْ أَنْ تُؤَدُّوا الْأَمَانَاتِ إِلَى أَهْلِهَا وَإِذَا حَكَمْتُمْ بَيْنَ النَّاسِ أَنْ تَحْكُمُوا بِالْعَدْلِ (अन्-निसा: 58)
“बेशक अल्लाह तआला तुम्हें हुक्म देते हैं कि अमानतें उनके हक़दारों को पहुँचा दो, और जब लोगों के दरम्यान फ़ैसला करो तो इंसाफ़ के साथ करो।”
وَأَوْفُوا بِالْعَهْدِ ۖ إِنَّ الْعَهْدَ كَانَ مَسْئُولًا (अल-इस्रा: 34)
“और वादा पूरा करो, बेशक वादे के बारे में बाज़-पुर्स (पूछताछ) होगी।”
▪ इस्लाम के अहकाम को दिल से मानना ▪
فَلَا وَرَبِّكَ لَا يُؤْمِنُونَ حَتَّىٰ يُحَكِّمُوكَ فِيمَا شَجَرَ بَيْنَهُمْ ثُمَّ لَا يَجِدُوا فِي أَنفُسِهِمْ حَرَجًا مِّمَّا قَضَيْتَ وَيُسَلِّمُوا تَسْلِيمًا (अन्-निसा: 65)
“पस (ऐ नबी!) तुम्हारे रब की क़सम! ये लोग मोमिन नहीं हो सकते जब तक कि अपने आपस के झगड़ों में तुम्हें फ़ैसला करने वाला न मान लें, फिर जो फ़ैसला तुम कर दो, उस पर अपने दिल में कोई तंगी न महसूस करें और मुकम्मल तौर पर तस्लीम (स्वीकार) कर लें।”
रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
إِنَّ اللَّهَ لَا يَنْظُرُ إِلَى صُوَرِكُمْ وَأَمْوَالِكُمْ، وَلَكِنْ يَنْظُرُ إِلَى قُلُوبِكُمْ وَأَعْمَالِكُمْ (सहीह मुस्लिम)
“अल्लाह तुम्हारी शक्लों और माल को नहीं देखता, बल्कि वह तुम्हारे दिलों और आमाल को देखता है।”
रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
لَا يُؤْمِنُ أَحَدُكُمْ حَتَّىٰ يَكُونَ هَوَاهُ تَبَعًا لِمَا جِئْتُ بِهِ (शरह अस्-सुन्नह लिल-बग़वी: 103)
“तुममें से कोई उस वक़्त तक मोमिन नहीं हो सकता जब तक उसकी ख़्वाहिश मेरे लाए हुए दीन के ताबे (अधीन) न हो जाए।”
निफ़ाक़ एक इंतिहाई संगीन गुनाह है जो इंसान के ईमान को तबाह कर देता है। निफ़ाक़-ए-ऐतक़ादी जहन्नम का रास्ता है, जबकि निफ़ाक़-ए-अमली भी अगर बढ़ जाए तो ईमान को ख़तरे में डाल सकता है।
इसलिए हर मुसलमान को चाहिए कि वह इख़्लास और सच्चाई के साथ दीन पर अमल करे, निफ़ाक़ के तमाम आमाल से बचे और अल्लाह तआला से हमेशा ईमान पर साबित-क़दमी के लिए दुआ करता रहे।
अल्लाह तआला हम सबको हर तरह के निफ़ाक़ से महफ़ूज़ रखें – आमीन।




