बिदअत: दीन में तहरीफ़ (बदलाव)

इस्लाम एक मुकम्मल दीन है, जिसे नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने क़ुरआन करीम और अपनी पाकीज़ा सुन्नत के ज़रिए उम्मत तक पहुँचा दिया है। अब इसमें किसी तरह के इज़ाफ़े (बढ़ोतरी) की गुंजाइश बाक़ी नहीं है।

अलबत्ता हर ज़माने में हालात के पेशे-नज़र क़ुरआनी आयात व अहादीस-ए-मुबारका में तशरीहात (व्याख्या) का सिलसिला जारी रहेगा, जो वक़्त के मोतबर उलमा-ए-दीन करते रहेंगे।

मगर किसी नए अक़ीदे, अमल या इबादत को दीन में शामिल करने या दीन में किसी तरह की बे-एतदाली यानी इस्लाम के अहम अहकामात को ग़ैर-अहम और ग़ैर-अहम को अहम क़रार देने की इजाज़त नहीं है।

कोई भी अक़ीदा, इबादत या अमल जिसकी बुनियाद क़ुरआन करीम या नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सुन्नत में न हो, उसे “बिदअत” कहते हैं।

अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाते हैं:

ٱلۡيَوۡمَ أَكۡمَلۡتُ لَكُمۡ دِينَكُمۡ وَأَتۡمَمۡتُ عَلَيۡكُمۡ نِعۡمَتِي وَرَضِيتُ لَكُمُ ٱلۡإِسۡلَٰمَ دِينٗا
(अल-माइदा: 3)

“आज मैंने तुम्हारे लिए तुम्हारा दीन मुकम्मल कर दिया, और तुम पर अपनी नेमत पूरी कर दी, और तुम्हारे लिए इस्लाम को बतौरे दीन पसंद कर लिया।”

बिदअत की तारीफ़ (परिभाषा):

बिदअत अरबी ज़बान का लफ़्ज़ है, जिसका मतलब है नई चीज़ ईजाद करना।

इस्तलाही मानी (तकनीकी अर्थ):

हर वह नया अक़ीदा, अमल, इबादत जो दीन में शामिल की जाए, जबकि उसकी बुनियाद क़ुरआन करीम, अहादीस-ए-मुबारका में न हो, “बिदअत” कहलाता है।

रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:

«مَنْ أَحْدَثَ فِي أَمْرِنَا هَذَا مَا لَيْسَ مِنْهُ فَهُوَ رَدٌّ» (सहीह बुख़ारी, सहीह मुस्लिम)

“जिसने हमारे दीन में कोई नई चीज़ ईजाद की जो इसमें नहीं है, वह मरदूद (खारिज) है।”

बिदअत की क़िस्में

उलमा-ए-किराम ने बिदअत की दो क़िस्में बयान की हैं:

बिदअत-ए-एतक़ादी

यह वह बिदअत है जो अक़ीदे में शामिल कर ली जाए और इसकी दलील क़ुरआन करीम या नबी करीम ﷺ की सुन्नत में न हो।

अल्लाह तआला क़ुरआनी अहकामात के बारे में इरशाद फ़रमाते हैं:

وَأَنَّ هَٰذَا صِرَٰطِي مُسْتَقِيمٗا فَٱتَّبِعُوهُۖ وَلَا تَتَّبِعُوا۟ ٱلسُّبُلَ فَتَفَرَّقَ بِكُمۡ عَن سَبِيلِهِۦۚ (अल-अनआम: 153)

“और मेरा सीधा रास्ता यही है, लिहाज़ा इसी पर चलो और दीगर (दूसरे) रास्तों पर मत चलो, वरना वे तुम्हें अल्लाह तआला के रास्ते से हटा देंगे।”

बिदअत-ए-अमली

इबादात और आमाल में किसी तरह का इज़ाफ़ा करना जो नबी करीम ﷺ और सहाबा-ए-किराम (रज़ियल्लाहु अन्हुम) से साबित न हो।

जैसे कोई मुस्तक़िल नमाज़, रोज़ा वग़ैरह ईजाद करना या नमाज़, ज़िक्र, दुआ वग़ैरह, किसी ऐसे तरीक़े पर शुरू करना जो न तो नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से साबित हो न सहाबा-ए-किराम रिज़वानुल्लाह अलैहिम अजमईन से, अमली बिदअत है।

रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:

«سَتَرَوْنَ بَعْدِي أُمُورًا تُنْكِرُونَهَا» (सहीह बुख़ारी, सहीह मुस्लिम)

“मेरे बाद तुम देखोगे कि कुछ लोग दीन में नई चीज़ें पैदा करेंगे, पस तुम उन्हें रद्द कर देना।”

▪️ तरजीहात में बे-एतदाली, फ़िक्री बिदअत ▪️

इस्लाम एक मुतवाज़िन (संतुलित) दीन है, जो एतदाल (मध्यम मार्ग), हिकमत और तरजीहात (प्राथमिकताओं) के उसूल पर क़ायम है। शरियत में हर हुक्म की दर्जा-बंदी और अहमियत है, इसलिए दीन के किसी अहम को ग़ैर-अहम या ग़ैर-अहम को अहम समझना, बे-एतदाली और फ़िक्री बिदअत है।\

मसलन कोई शख़्स फ़राइज़ व मोहोर्रमात (अनिवार्य कर्तव्यों और वर्जित कार्यों) को अहमियत न दे। इबादतें, हुक़ूक़, अख़्लाक़ियात और मुआमलात के फ़राइज़ की अदायगी में कोताही करे, हुक़ूक़ुल-इबाद (बंदों के अधिकार) को पामाल करे, झूठ, धोखा, ज़ुल्म, ग़सब (हड़पना), ख़ियानत, बद-दियानती, अहद-शिकनी (वादा तोड़ना), ग़ीबत जैसी संगीन बुराइयों में मुब्तला हो।

मगर साथ ही अपनी कुछ ज़ाहिरी इबादतों और वज़अ-क़ता (दिखावे और हुलिए) से सालेहीन (नेक लोगों) का रंग अपनाता हो, तो वह दीन की हक़ीक़ी तरजीहात को पस-ए-पुश्त (पीछे) डालने वाला और ख़ुद-फ़रेबी में मुब्तला है।

दीन में तरजीहात (प्राथमिकताओं) का उसूल

दीन में एतदाल (संतुलन) लाज़िम है। इस्लामी तअलीमात में फ़राइज़ व मोहोर्रमात और हुक़ूक़ुल-इबाद को बुनियादी अहमियत हासिल है।

जो शख़्स फ़राइज़ व मोहोर्रमात को अहमियत न देकर ग़ैर-ज़रूरी उमूर यानी सुनन व मुस्तहब्बात पर ज़ोर देता है, तो वह दीन की असल रूह से भटक गया है।

जैसे कोई शख़्स नमाज़-ए-पंजगाना (पाँच वक्त की नमाज़) तो पढ़ता है मगर उसके ज़िम्मे जो दूसरे फ़राइज़ हैं, उनकी परवाह नहीं करता। इसी तरह एक शख़्स साल भर फ़र्ज़ नमाज़ें भी नहीं पढ़ता मगर रमज़ान में तरावीह वग़ैरह का ख़ूब एहतमाम करता है, तो वह दीन-ए-इस्लाम के मिज़ाज के ख़िलाफ़ अमल कर रहा है।

अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाते हैं:

إِنَّ ٱللَّهَ يَأْمُرُ بِٱلْعَدْلِ وَٱلْإِحْسَٰنِ وَإِيتَآءِ ذِى ٱلْقُرْبَىٰ وَيَنْهَىٰ عَنِ ٱلْفَحْشَآءِ وَٱلْمُنكَرِ وَٱلْبَغْىِ يَعِظُكُمْ لَعَلَّكُمْ تَذَكَّरُونَ (सूरह अन-नहल: 90)

“बेशक अल्लाह तआला इंसाफ़, एहसान, और रिश्तेदारों को उनका हक़ देने का हुक्म देते हैं, और बे-हयाई, बुराई, और ज़ुल्म से रोकते हैं, वह तुम्हें नसीहत करते हैं ताकि तुम सबक़ हासिल करो।”

ज़ाहिरी तक़वा, बातिनी ख़ियानत

बाज़ लोग ज़ाहिरी दीनदारी और मज़हबी वज़अ-क़ता (हुलिए) को इख़्तियार करके ख़ुद को नेकोकार ज़ाहिर करने की कोशिश करते हैं, मगर वे ख़ियानत, बद-दियानती, ज़ुल्म और हुक़ूक़ुल-इबाद (बंदों के अधिकारों) की पामाली में ज़रा भी दरेग़ (संकोच) नहीं करते। ऐसे लोगों का यह रवैया ख़ुद उनके लिए ख़तरनाक है।

अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाते हैं:

فَلَا تُزَكُّوا أَنفُسَكُمْ هُوَ أَعْلَمُ بِمَنِ اتَّقَى (अन्-नज्म: 32)

“अपनी पारसाई (नेकी) मत ज़ाहिर करो, अल्लाह तआला अच्छी तरह जानते हैं कि कौन शख़्स कितना मुत्तक़ी है।”

नबी करीम ﷺ ने ऐसे लोगों के बारे में सख़्त वईद (चेतावनी) इरशाद फ़रमाई है।

عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ ﷺ قَالَ
“أَتَدْرُونَ مَا الْمُفْلِسُ؟
قَالُوا: الْمُفْلِسُ فِينَا مَنْ لَا دِرْهَمَ لَهُ وَلَا مَتَاعَ
فَقَالَ: “إِنَّ الْمُفْلِسَ مِنْ أُمَّتِي يَأْتِي يَوْمَ الْقِيَامَةِ بِصَلَاةٍ وَصِيَامٍ وَزَكَاةٍ، وَيَأْتِي قَدْ شَتَمَ هَذَا وَقَذَفَ هَذَا، وَأَكَلَ مَالَ هَذَا، وَسَفَكَ دَمَ هَذَا وَضَرَبَ هَذَا، فَيُعْطَى هَذَا مِنْ حَسَنَاتِهِ، وَهَذَا مِنْ حَسَنَاتِهِ، فَإِنْ فَنِيَتْ حَسَنَاتُهُ قَبْلَ أَنْ يُقْضَى مَا عَلَيْهِ، أُخِذَ مِنْ خَطَايَاهُمْ، فَطُرِحَتْ عَلَيْهِ، ثُمَّ طُرِحَ فِي النَّارِ. (صحیح مسلم)

“तुम जानते हो मुफ़्लिस कौन है?”

सहाबा ने अर्ज़ किया: “हमारे नज़दीक मुफ़्लिस वह है जिसके पास न दरहम है और न माल-ओ-असबाब।”

नबी करीम ﷺ ने फ़रमाया: “मेरी उम्मत का मुफ़्लिस वह शख़्स है जो क़यामत के दिन बहुत सी नमाज़, रोज़े और ज़कात लेकर आएगा, मगर किसी को गाली दी होगी, किसी पर बोहतान (आरोप) लगाया होगा, किसी का माल खाया होगा, किसी का ख़ून बहाया होगा, किसी को नाहक़ मारा होगा, तो इन लोगों को उसकी नेकियाँ दे दी जाएँगी, यहाँ तक कि अगर उसकी नेकियाँ ख़त्म हो गईं और बदला बाक़ी रह गया, तो उनके गुनाह उस पर डाल दिए जाएँगे और फिर उसे जहन्नम में डाल दिया जाएगा।”

वाज़ेह (स्पष्ट) है कि इबादात का एहतमाम करने वाला, अगर हुक़ूक़ुल-इबाद में ख़ियानत करेगा, तो वह क़यामत के दिन शदीद ख़सारे (बड़े नुकसान) में होगा।

इस्लामी तरजीहात में अफ़रात-ओ-तफ़रीत, एक फ़िक्री बिदअत

दीन में अफ़रात-ओ-तफ़रीत यानी इंतहा-पसंदी (कट्टरपंथ) और बे-एतदाली (असंतुलन) को हमेशा नापसंद किया गया है।

अगर कोई शख़्स फ़राइज़ को नज़र-अंदाज़ करके मुस्तहब्बात को अहमियत देता है, या कबीरा गुनाहों को नज़र-अंदाज़ करके सग़ाएर व मकरूहात को अहमियत देता है, तो वह दरअसल इस्लामी अहकाम में ग़ैर-मुतवाज़िन (असंतुलित) तर्ज़-ए-फ़िक्र का शिकार है।

नबी अकरम ﷺ ने फ़रमाया:

إِيَّاكُمْ وَالغُلُوَّ فِي الدِّينِ، فَإِنَّمَا هَلَكَ مَنْ كَانَ قَبْلَكُمْ بِالغُلُوِّ فِي الدِّينِ (सुनन नसई)

“दीन में गुलू (इंतहा-पसंदी) से बचो, क्योंकि तुम से पहले लोग इसी की वजह से हलाक हुए।”

दीन में ग़ैर-मुतवाज़िन (असंतुलित) तरजीहात इख़्तियार करना एक हलाकत-खेज़ (विनाशकारी) रविश है।

दीन में फ़राइज़ की अव्वलीन (प्राथमिक) हैसियत है, और नवाफ़िल व मुस्तहब्बात फ़राइज़ की तकमील (पूरा करने) का ज़रिया हैं, न कि फ़राइज़ का मुतबादिल (विकल्प)।

हुक़ूक़ुल-इबाद की पामाली, ज़ुल्म, ख़ियानत और बद-दियानती एक संगीन जुर्म है, और इसका मुर्तकिब (दोषी) महज़ ज़ाहिरी इबादात से अल्लाह तआला की पकड़ से नहीं बच सकता।

जो शख़्स दीन में तरजीहात का लिहाज़ नहीं रखता और ख़ुद को सिर्फ़ कुछ ज़ाहिरी इबादात के ज़रिए मुत्तक़ी बावर कराने (सिद्ध करने) की कोशिश करता है, वह हक़ीक़त में गुमराही और फ़िक्री बिदअत का शिकार है।

असल दीनदारी यह है कि ईमान, इबादात, मुआमलात, मुआशरत और अख़्लाक़ियात सब में क़ुरआन व सुन्नत की हिदायात पर अमल किया जाए।

▪️ बिदअत के नुक़सानात ▪️

बिदअत से दीन की असल शक्ल बिगड़ जाती है और हक़ीक़ी तअलीमात (वास्तविक शिक्षाएं) धुंधली पड़ जाती हैं। बिदअत का दूसरा बड़ा नुक़सान यह है कि जब बिदअत रायज (प्रचलित) होती है तो सुन्नत छुप जाती है।

नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम फ़रमाते हैं:

عَنْ أَنَسِ بْنِ مَالِكٍ، قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ﷺ: لَا يَزَالُ النَّاسُ يَبْتَدِعُونَ بِدَعًا حَتَّىٰ تَكُونَ الْبِدْعَةُ سُنَّةً (सुनन अद-दारमी)

हज़रत अनस बिन मालिक रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया: “लोग बिदअतें ईजाद करते रहेंगे यहाँ तक कि बिदअत ही (लोगों के नज़दीक) सुन्नत बन जाएगी।”

▪️ बिदअत जहन्नम का रास्ता है ▪️

रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:

«كُلُّ بِدْعَةٍ ضَلَالَةٌ، وَكُلُّ ضَلَالَةٍ فِي النَّارِ» (सहीह मुस्लिम)

“हर नई चीज़ बिदअत है, और हर बिदअत गुमराही है, और हर गुमराही जहन्नम में ले जाने वाली है।”

बिदअती, बिदअत पर दीन समझ कर अमल करता है इसलिए उसे अपनी ग़लती का एहसास नहीं होता और न ही उससे वह कभी तौबा कर पाता है।

▪️ बिदअत से बचने के तरीक़े ▪️

क़ुरआन व सुन्नत को मज़बूती से पकड़ना:

अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाते हैं:

وَمَا آتَىٰكُمُ ٱلرَّسُولُ فَخُذُوهُ وَمَا نَهَىٰكُمۡ عَنۡهُ فَٱنتَهُوا۟ۚ (अल-हश्र: 7)

“और रसूल जो कुछ तुम्हें दे, वह ले लो, और जिस चीज़ से मना करें, उससे बाज़ (रुक) रहो।”

नबी करीम ﷺ की सुन्नत पर अमल करना:

रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:

فَعَلَيْكُمْ بِسُنَّتِي وَسُنَّةِ الْخُلَفَاءِ الرَّاشِدِينَ الْمَهْدِيِّينَ، تَمَسَّكُوا بِهَا، وَعَضُّوا عَلَيْهَا بِالنَّوَاجِذِ (सुनन अबू दाऊद, तिरमिज़ी)

“तुम पर लाज़िम है कि मेरी और मेरे खुल्फ़ा-ए-राशिदीन की सुन्नत को मज़बूती से पकड़ो और उसे दाढ़ों के साथ मज़बूती से थामे रहो।”
सहाबा-ए-किराम (रज़ियल्लाहु अन्हुम) के तरीक़े पर अमल करना

अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाते हैं:

فَإِنْ آمَنُوا بِمِثْلِ مَا آمَنتُمْ بِهِ فَقَدِ اهْتَدَوْا (अल-बक़रा: 137)

“पस अगर वे (दूसरे लोग) भी उसी तरह ईमान ले आएँ जैसे तुम ईमान लाए हो, तो वे हिदायत पा जाएँगे।”

أَصْحَابِي كَالنُّجُومِ بِأَيِّهِمُ اقْتَدَيْتُمُ اهْتَدَيْتُمْ (मुश्किलुल-आसार लित्तहावी)

“मेरे सहाबा सितारों के मानिंद (समान) हैं, तुम उनमें से जिसकी भी पैरवी करोगे हिदायत पाओगे।”

दीन में नई चीज़ों से एहतियात बरतना

रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:

إِنَّ أَصْدَقَ الْحَدِيثِ كِتَابُ اللَّهِ، وَخَيْرَ الْهُدَى هُدَى مُحَمَّدٍ، وَشَرَّ الْأُمُورِ مُحْدَثَاتُهَا (सहीह मुस्लिम)

“बेशक सबसे सच्ची बात अल्लाह तआला की किताब है, और सबसे बेहतरीन हिदायत हज़रत मुहम्मद ﷺ की हिदायत है, और सबसे बदतरीन अमर (काम) दीन में नई चीज़ें ईजाद करना है।”

हर बिदअत गुमराही है

عَنْ جَابِرِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ قَالَ: كَانَ رَسُولُ اللَّهِ ﷺ يَقُولُ فِي خُطْبَتِهِ: أَمَّا بَعْدُ، فَإِنَّ خَيْرَ الْحَدِيثِ كِتَابُ اللَّهِ، وَخَيْرَ الْهُدَىٰ هُدَىٰ مُحَمَّदٍ، وَشَرَّ الْأُمُورِ مُحْدَثَاتُهَا، وَكُلَّ بِدْعَةٍ ضَلَالَةٌ (सहीह मुस्लिम)

हज़रत जाबिर बिन अब्दुल्लाह रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ अपने खुतबे में फ़रमाया करते थे:

“अम्मा बाद! बेशक सबसे बेहतरीन बात अल्लाह तआला की किताब है, और सबसे बेहतरीन हिदायत हज़रत मुहम्मद (ﷺ) की हिदायत है, और बदतरीन उमूर (काम) वे हैं जो (दीन में) नए ईजाद किए गए हों, और हर बिदअत गुमराही है।”

बिदअत का अंजाम जहन्नम है

عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عُمَرَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُمَا قَالَ: قَالَ النَّبِيُّ ﷺ: “كُلُّ بِدْعَةٍ ضَلَالَةٌ، وَكُلُّ ضَلَالَةٍ فِي النَّارِ”

हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा से रिवायत है कि नबी ﷺ ने फ़रमाया: “हर बिदअत गुमराही है, और हर गुमराही जहन्नम में पहुँचने का ज़रिया है।”

खुल्फ़ा-ए-राशिदीन रज़ियल्लाहु अन्हुम का अमल भी सुन्नत है

عَنْ الْعِرْبَاضِ بْنِ سَارِيَةَ قَالَ: وَعَظَنَا رَسُولُ اللَّهِ ﷺ مَوْعِظَةً بَلِيغَةً وَقَالَ: فَعَلَيْكُمْ بِسُنَّتِي، وَسُنَّةِ الْخُلَفَاءِ الرَّاشِدِينَ الْمَهْدِيِّينَ، تَمَسَّكُوا بِهَا وَعَضُّوا عَلَيْهَا بِالنَّوَاجِذِ وَإِيَّاكُمْ وَمُحْدَثَاتِ الْأُمُورِ، فَإِنَّ كُلَّ مُحْدَثَةٍ بِدْعَةٌ وَكُلَّ بِدْعَةٍ ضَلَالَةٌ

(सुनन अबू दाऊद, सुनन तिरमिज़ी)

हज़रत इरबाज़ बिन सारिया रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने हमें निहायत मुअस्सिर (असरदार) नसीहत फ़रमाई और कहा: “तुम पर लाज़िम है कि मेरी सुन्नत और मेरे हिदायत याफ़्ता खुल्फ़ा-ए-राशिदीन की सुन्नत को मज़बूती से पकड़ो, और उसे अपने दांतों (दाढ़ों) से थाम लो, और दीन में नए उमूर से बचो, क्योंकि हर नया काम बिदअत है, और हर बिदअत गुमराही है।”

दीन में हर इज़ाफ़ा (बढ़ोतरी) बिदअत है

عَنْ حُذَيْفَةَ بْنِ الْيَمَانِ قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ﷺ: لَا تَحْدُثُوا فِي دِينِ اللَّهِ مَا لَيْسَ فِيهِ، فَإِنَّ كُلَّ إِحْدَاثٍ بِدْعَةٌ (मुसनद अहमद)

हज़रत हुज़ैफ़ा बिन यमान रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया: “अल्लाह तआला के दीन में कोई ऐसी चीज़ मत दाख़िल करो जो इसमें न हो, क्योंकि दीन में हर नई ईजाद बिदअत है।”

बिदअती के आमाल मरदूद हैं

عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ ﷺ قَالَ: مَنْ عَمِلَ عَمَلًا لَيْسَ عَلَيْهِ أَمْرُنَا فَهُوَ رَدٌّ (सहीह मुस्लिम)

हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया: “जिसने ऐसा अमल किया जो हमारे तरीक़े पर नहीं है, तो वह मरदूद है (क़बूल नहीं किया जाएगा)।”

क़यामत के दिन बिदअती को हौज-ए-कौसर से दूर कर दिया जाएगा।

عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللَّهِ ﷺ: إِنِّي فَرَطُكُمْ عَلَى ٱلْحَوْضِ، فَلَا يُؤْتَيَنَّ أَحَدٌ بِكُمْ فَيُذَبُّ عَنِّي، فَيَقُولُ: يَا رَبِّ إِنَّهُ مِنِّي، فَيُقَالُ: إِنَّكَ لَا تَدْرِي مَا أَحْدَثَ بَعْدَكَ (सहीह बुख़ारी, सहीह मुस्लिम)

हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:

“मैं तुम से पहले हौज (कौसर) पर पहुँच जाऊँगा लेकिन कुछ लोग वहाँ आएँगे जिन्हें मेरे पास आने से रोक दिया जाएगा, मैं कहूँगा: ऐ मेरे रब! ये तो मेरी उम्मत के लोग हैं, तो कहा जाएगा: आप नहीं जानते कि उन्होंने आपके बाद क्या कुछ नया ईजाद किया था।”

ख़ुलासा

बिदअत दीन में बग़ैर किसी दलील के शामिल की गई नई चीज़ है जो सुन्नत को ख़त्म कर देती है और दीन में बिगाड़ पैदा करती है। हमें चाहिए कि हम क़ुरआन करीम और अहादीस-ए-मुबारका पर अमल करें और बिदआत से बचें।

अल्लाह तआला हमें बिदआत से महफ़ूज़ रखें और खालिस सुन्नत पर अमल करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाएँ।

आमीन

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