इंसानी समाज सिर्फ़ क़ानून, ज़ाब्तों और मुआहदों से नहीं चलता, बल्कि इसकी असल बुनियाद सच्चाई, भरोसे, वादे, अहद और आपसी ज़िम्मेदारी पर क़ायम होती है।
एक इंसान दूसरे इंसान पर उसी वक़्त भरोसा करता है जब उसे यक़ीन हो कि उसकी ज़ुबान से निकला हुआ वादा महज़ अल्फ़ाज़ का मज्मूआ नहीं बल्कि एक ज़िम्मेदारी है, जिसे वह पूरा करने की कोशिश करेगा।
घर के मामले हों या कारोबार के, दोस्ती हो या रिश्तेदारी, तालीम हो या मुलाज़मत, तिजारत हो या सियासत, इन्फ़िरादी ज़िंदगी हो या इज्तिमाई निज़ाम, हर जगह इंसान अपने क़ौल-व-क़रार के ज़रिए दूसरों से वाबस्ता होता है।
इसीलिए इस्लाम ने वादा पूरा करने को महज़ एक समाजी ख़ूबी नहीं बल्कि ईमान और अख़लाक़ का अहम तक़ाज़ा क़रार दिया है, और बदअहदी और वादा-ख़िलाफ़ी को निहायत संगीन अख़लाक़ी बुराई क़रार दिया है।
अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाते हैं:
يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا أَوْفُوا بِالْعُقُودِ (अल-माइदा: 1)
“ऐ ईमान वालो! अहद-व-पैमान पूरे करो।”
यह मुख़्तसर मगर जामे हुक्म इस बात की दलील है कि इस्लाम में वादा और मुआहदा मामूली चीज़ नहीं। जिस शख़्स ने किसी से कोई जायज़ अहद किया है, उस पर उसे पूरा करने की ज़िम्मेदारी आइद होती है।
वादा उस क़ौल-व-क़रार को कहते हैं जिसके ज़रिए इंसान आइंदा किसी काम के करने या न करने की ज़िम्मेदारी क़बूल करता है। जब कोई शख़्स ज़बान से कहता है कि “मैं यह काम ज़रूर करूँगा”, “मैं तुम्हारा हक़ फ़लाँ वक़्त अदा कर दूँगा”, “मैं तुम्हारी अमानत वापस कर दूँगा”, “मैं फ़लाँ ज़िम्मेदारी पूरी करूँगा”, तो वह महज़ एक जुमला नहीं बोल रहा होता, बल्कि अपनी ज़ुबान के ज़रिए अपने ऊपर एक अख़लाक़ी ज़िम्मेदारी आइद कर रहा होता है।
वादे के मफ़्हूम को अदा करने के लिए अरबी ज़बान में कई अल्फ़ाज़ इस्तेमाल होते हैं, जिनमें अहद, मीसाक़ और उक़ूद क़ाबिल-ए-ज़िक्र हैं। अगरचे यह अल्फ़ाज़ अपने बुनियादी मफ़हूम के ऐतबार से आपस में क़रीब और तक़रीबन हम-माना हैं, ताहम हर लफ़्ज़ अपने अंदर मअनी की एक मख़सूस वुस्अत और शिद्दत रखता है। अहद महज़ वादे तक महदूद नहीं बल्कि इससे ज़्यादा वसीअ मफ़हूम रखता है; जबकि मीसाक़ ऐसे मज़बूत, पुख़्ता और मुअक्कद अहद को कहते हैं जिसे मज़ीद इस्तेहकाम के साथ बाँधा गया हो। इसी तरह उक़ूद, जिसमें आपसी इल्तिज़ाम, पाबंदी और किसी मामले को बाक़ायदा तौर पर लाज़िम कर लेने का मफ़हूम पाया जाता है।
क़ुरआन-ए-करीम ने इंसानी ज़िंदगी में अहद-व-पैमान की पासदारी और वादों की तकमील को ग़ैर-मामूली अहमियत अता फ़रमाई है। मुख़्तलिफ़ मक़ामात पर अहद, मीसाक़ और उक़ूद को पूरा करने की सरीह ताकीद की गई है, जिससे मालूम होता है कि वादा महज़ ज़बान से अदा किए जाने वाले चंद अल्फ़ाज़ का नाम नहीं, बल्कि एक ऐसी ज़िम्मेदारी है जिसके बारे में इंसान को अल्लाह तआला के हुज़ूर जवाबदेह होना है।
चुनांचे अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाते हैं:
وَأَوْفُوا بِالْعَهْدِ ۖ إِنَّ الْعَهْدَ كَانَ مَسْئُولًا (अल-इस्रा: 34)
“और अहद को पूरा करो, बेशक अहद के बारे में बाज़पुर्स की जाएगी।”
यह आयत बदअह्दी की संगीनी को वाज़ेह करने के लिए काफ़ी है।
इंसान समझता है कि वादा तो ज़ुबान से किया था, उसे कौन पूछने वाला है? जबकि इंसान की ज़ुबान से निकलने वाला वादा उसके साथ ख़त्म नहीं हो जाता, बल्कि वह अल्लाह तआला के इल्म में महफ़ूज़ रहता है, और क़यामत के दिन उसके बारे में बाज़पुर्स हो सकती है।
वादा पूरा करने को अल्लाह तआला ने अपने सच्चे और मुत्तक़ी बंदों की सिफ़ात में बयान फ़रमाया है। इरशाद है:
وَالْمُوفُونَ بِعَهْدِهِمْ إِذَا عَاهَدُوا (अल-बक़रा: 177)
“और वह लोग जो अहद करें तो अपने अहद को पूरा करने वाले हों।”
फिर आगे इरशाद फ़रमाया:
أُولَٰئِكَ الَّذِينَ صَدَقُوا وَأُولَٰئِكَ هُمُ الْمُتَّقُونَ (अल-बक़रा: 177)
“वही लोग सच्चे हैं और वही लोग मुत्तक़ी हैं।”
ग़ौर कीजिए! अल्लाह तआला ने नेकी के जामे बयान में वादा पूरा करने को भी अहल-ए-तक़्वा-व-ईमान की नुमाया सिफ़त क़रार दिया।
इससे मालूम होता है कि किसी इंसान का रस्मी तौर पर इबादत-गुज़ार हो जाना काफ़ी नहीं, बल्कि उसके अख़लाक़ और मामलात भी उसके ईमान का आईना होने चाहिए।
जो शख़्स नमाज़ का पाबंद हो, क़ुरआन-ए-करीम की तिलावत से अपनी ज़ुबान को तर रखता हो, ज़िक्र-व-अज़कार में भी मशग़ूल रहता हो, मगर इसके बावजूद वादों की पासदारी न करता हो, लोगों के हुक़ूक़ की अदायगी में कोताही बरतता हो और क़ौल-व-क़रार की ख़िलाफ़वर्ज़ी उसकी आदत बन चुकी हो, तो उसकी शख़्सियत में एक निहायत संगीन और तशवीशनाक अमली तज़ाद पाया जाता है।
उसकी इबादतें अपनी जगह क़ाबिल-ए-क़द्र हैं, लेकिन इबादत का हक़ीक़ी असर इंसान के किरदार, मामलात और बर्ताव में नुमाया होना चाहिए।
जब ज़बान अल्लाह तआला के ज़िक्र से तर हो मगर उसी ज़बान से किए गए वादे बेवक़्अत हो जाएँ, जब पेशानी सजदों से आश्ना हो मगर हाथ दूसरों के हुक़ूक़ पामाल करने लगें, तो यह कैफ़ियत ईमान के मत्लूबा अमली तक़ाज़ों और आमाल के दरमियान एक गहरी खाई की निशानदेही करती है।
इस्लाम इंसान को सिर्फ़ नमाज़ पढ़ने वाला, तिलावत करने वाला और ज़िक्र करने वाला नहीं बनाना चाहता, बल्कि उसे ऐसा सच्चा, दियानतदार, अमानतदार और क़ाबिल-ए-भरोसा इंसान बनाना चाहता है जिसके क़ौल-व-क़रार पर भरोसा किया जा सके, जिसके वादे को ज़मानत समझा जाए, जिसके साथ मुआमला करने में दिल मुत्मइन रहे और जिससे दूसरों के हुक़ूक़ महफ़ूज़ रहें।
नबी करीम ﷺ ने मोमिन की तारीफ़ यूँ बयान फ़रमाई है:
الْمُؤْمِنُ مَنْ أَمِنَهُ النَّاسُ عَلَى دِمَائِهِمْ وَأَمْوَالِهِمْ (नसई, तिर्मिज़ी)
“मोमिन वह है जिससे लोग अपनी जानों और अपने मालों के बारे में बेख़ौफ़ और मुतमइन हों।”
इबादत इंसान के बातिन को सँवारती है, लेकिन इस बातिन की सच्चाई का नुमाया असर उसके मुआमलात और अख़लाक़ में ज़ाहिर होना चाहिए।
चुनांचे अगर किसी शख़्स की ज़बान अल्लाह तआला के ज़िक्र से तर हो, पेशानी सज्दों से आशना हो, तिलावत उसका मामूल हो, लेकिन उसकी ज़बान से निकला हुआ वादा लोगों के लिए क़ाबिल-ए-भरोसा न हो, तो उसे अपने अंदरून का जायज़ा लेने की ज़रूरत है कि आख़िर उसकी इबादतों का हासिल क्या है?
जब्कि क़ुरआन करीम ने बारहा इबादतों की मश्रूइयत का मक़सद तक़्वा बयान फ़रमाया है।
अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाते हैं:
يَا أَيُّهَا النَّاسُ اعْبُدُوا رَبَّكُمُ الَّذِي خَلَقَكُمْ وَالَّذِينَ مِن قَبْلِكُمْ لَعَلَّكُمْ تَتَّقُونَ (अल-बक़रा: 21)
“ऐ लोगो! अब रब की इबादत करो जिसने तुम्हें और तुम्हारे आबा-व-अज्दाद को पैदा किया ताकि तुम मुत्तक़ी बन जाओ।”
इस्लाम इबादत और अख़लाक़ को एक दूसरे से जुदा नहीं करता, वह बंदे को अल्लाह तआला का हक़ अदा करने के साथ बंदों के हुक़ूक़ अदा करने और अपने क़ौल-व-क़रार की हिफ़ाज़त का भी पाबंद बनाता है।
वादा-ख़िलाफ़ी की क़बाहत उस वक़्त मज़ीद बढ़ जाती है जब हम नबी करीम ﷺ की वह हदीस पढ़ते हैं जिसमें आपﷺ ने मुनाफ़िक़ की अलामतें बयान फ़रमाई हैं।
रसूलुल्लाह ﷺ इरशाद फ़रमाते हैं:
آيَةُ الْمُنَافِقِ ثَلَاثٌ: إِذَا حَدَّثَ كَذَبَ، وَإِذَا وَعَدَ أَخْلَفَ، وَإِذَا اؤْتُمِنَ خَانَ (बुख़ारी, मुस्लिम)
“मुनाफ़िक़ की तीन निशानियाँ हैं: जब बात करे तो झूठ बोले, जब वादा करे तो वादा-ख़िलाफ़ी करे, और जब उसके पास अमानत रखी जाए तो ख़यानत करे।”
यहाँ नबी करीम ﷺ ने वादा-ख़िलाफ़ी को आम अख़्लाक़ी कमज़ोरियों की फ़ेहरिस्त में नहीं रखा बल्कि इसे निफ़ाक़ की अलामत क़रार दिया। यानी जिस शख़्स में यह आदत पैदा हो जाए कि वह वादे करता है और फिर पूरा करने का इरादा ही नहीं रखता, तो वह अपने अंदर मुनाफ़िक़ाना सिफ़ात पैदा कर रहा है।
एक और हदीस में चार ख़तरनाक सिफ़ात का ज़िक्र है। रसूलुल्लाह ﷺ इरशाद फ़रमाते हैं:
أَرْبَعٌ مَنْ كُنَّ فِيهِ كَانَ مُنَافِقًا خَالِصًا… (बुख़ारी, मुस्लिम)
“चार ख़स्लतें जिस शख़्स में हों वह ख़ालिस मुनाफ़िक़ है, और जिसमें इनमें से एक ख़स्लत हो उसमें निफ़ाक़ की एक ख़स्लत है जब तक वह उसे छोड़ न दे: जब अमानत दी जाए तो ख़यानत करे, बात करे तो झूठ बोले, अह्द करे तो बदअह्दी करे, और झगड़ा करे तो बदज़ुबानी करे।”
इस हदीस में “وَإِذَا عَاهَدَ غَدَرَ” के अल्फ़ाज़ निहायत क़ाबिल-ए-ग़ौर हैं। अहद करने के बाद उसमें ख़यानत करना, वादा करके जान-बूझकर तोड़ देना और भरोसा हासिल करने के बाद उस भरोसे को पामाल कर देना इस्लामी अख़लाक़ियात के खिलाफ है।
अल्लाह तआला के नज़दीक वादा निहायत संजीदा मामला है
बाज़ लोग वादा करते वक़्त अल्फ़ाज़ को बहुत हल्का समझते हैं: “देखेंगे।” “कोशिश करेंगे।” “हो जाएगा।” “मैं ज़रूर कर दूँगा।” “आप फ़िक्र न करें।” फिर वक़्त आने पर कहते हैं: “अरे! वह तो ऐसे ही कह दिया था। वह तो जुमला था…”
इसी तरह आजकल हमारे समाज में वादा करने का एक नया अंदाज़ आम हो रहा है। बाज़ लोग किसी काम का वादा करते वक़्त ज़ुबान से “इंशाअल्लाह” पढ़ देते हैं, लेकिन दिल में उस काम को अंजाम देने का कोई हक़ीक़ी इरादा नहीं होता। वह सिर्फ़ सामने वाले को मुत्मइन करने, वक़्ती तौर पर बात टालने या वादे से बच निकलने के लिए “इंशाअल्लाह” का सहारा लेते हैं।
यह तर्ज़-ए-अमल दुरुस्त नहीं। “इंशाअल्लाह” वादे से बचने, झूठी उम्मीद दिलाने या सामने वाले को मस्नूई इत्मीनान देने का ज़रिआ नहीं, बल्कि अल्लाह तआला की मशीयत पर भरोसे और अपने इरादे को अल्लाह तआला के सुपुर्द करने का इज़हार है। इसका सही मफ़हूम यह है कि इंसान किसी काम का हक़ीक़ी इरादा और अज़्म रखता हो, उसे अंजाम देने की कोशिश भी करे, लेकिन अपने मुस्तक़बिल के इरादे को अल्लाह तआला की मशीय्यत के ताबे समझते हुए कहे: मैं यह काम करने की कोशिश करूँगा, अगर अल्लाह तआला ने चाहा तो यह काम हो जाएगा।
अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाते हैं:
وَلَا تَقُولَنَّ لِشَيْءٍ إِنِّي فَاعِلٌ ذَٰلِكَ غَدًا إِلَّا أَنْ يَشَاءَ اللَّهُ (अल-कहफ़: 23-24)
“और किसी काम के बारे में यह न कहो कि मैं इसे कल ज़रूर करने वाला हूँ, मगर यह कहो कि अगर अल्लाह तआला चाहें।”
लिहाज़ा “इंशाअल्लाह” को वादा-ख़िलाफ़ी का पर्दा या झूठा इत्मीनान दिलाने का ज़रिआ बनाना दुरुस्त नहीं, यह एक तरह का धोखा है। अगर किसी शख़्स का किसी काम को करने का इरादा ही नहीं तो उसे “इंशाअल्लाह” कहकर सामने वाले को उम्मीद दिलाने के बजाय साफ़ और सच्ची बात कहनी चाहिए। साफ़ इनकार, झूठी उम्मीद से बेहतर है, और सच्ची बात, मस्नूई वादे से कहीं ज़्यादा इस्लामी अख़लाक़ के क़रीब है।
इस्लामी अख़लाक़ में वादा-ख़िलाफ़ी इंतिहाई ख़तरनाक अमल है
अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाते हैं:
وَلَا تَقْرَبُوا مَالَ الْيَتِيمِ إِلَّا بِالَّتِي هِيَ أَحْسَنُ حَتَّىٰ يَبْلُغَ أَشُدَّهُ ۚ وَأَوْفُوا بِالْعَهْدِ ۖ إِنَّ الْعَهْدَ كَانَ مَسْئُولًا (अल-इसरा: 34)
“और यतीम के माल के क़रीब भी न जाओ मगर ऐसे तरीक़े से जो बेहतरीन हो, यहाँ तक कि वह अपनी जवानी को पहुँच जाए, और अहद को पूरा करो, बेशक अहद के बारे में बाज़पुर्स होगी।”
यहाँ वादा पूरा करने का हुक्म हुक़ूक़-उल-इबाद और माली ज़िम्मेदारियों के बयान के दरमियान आया हुआ है। इससे अंदाज़ा किया जा सकता है कि अहद-शिक्नी को इस्लाम महज़ शख़्सी अख़लाक़ का मसला नहीं समझता, बल्कि इसे इंसानी हुक़ूक़ और समाजी ज़िम्मेदारियों से जोड़ता है।
क़ुरआन ए करीम ने अहद-शिक्नी को अल्लाह तआला के ग़ज़ब का सबब क़रार दिया।
सूरह माइदा में बनी इस्राईल के बाज़ आमाल का ज़िक्र करते हुए अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाते हैं:
فَبِمَا نَقْضِهِمْ مِيثَاقَهُمْ لَعَنَّاهُمْ وَجَعَلْنَا قُلُوبَهُمْ قَاسِيَةً (अल-माइदा: 13)
“फिर उनके अपने मीसाक़ तोड़ने की वजह से हमने उन पर लानत की और उनके दिल सख़्त कर दिए।”
मीसाक़ तोड़ने का नतीजा सिर्फ़ एक वादे का ख़त्म होना नहीं, बल्कि दिल की सख़्ती और अल्लाह तआला की नाराज़गी तक पहुँच सकता है। जब इंसान बार-बार अहद तोड़ता है तो उसके दिल से वफ़ादारी की क़द्र ख़त्म होने लगती है। फिर वादा उसके नज़दीक खेल बन जाता है, झूठ मामूल बन जाता है और दूसरों का भरोसा उसके लिए बे मानी हो जाता है।
वादा-ख़िलाफ़ी का सबसे पहला नुक़सान यह होता है कि इंसान अपनी अख़लाक़ी साख खो देता है। कोई शख़्स अगर एक बार किसी का भरोसा तोड़ देता है तो वह शख़्स आइंदा के लिए हमेशा मुहतात हो जाता है। अगर दूसरी बार भी वादा तोड़ दिया तो भरोसा मज़ीद कम हो जाता है। और जब बदअह्दी आदत बन जाए तो लोग उसकी बात सुनकर भी यक़ीन नहीं करते। फिर एक वक़्त आता है कि उस शख़्स की ज़ुबान से निकला हुआ सच्चा वादा भी दूसरों के लिए बे मानी हो जाता है।
यह बदअहदी की दुनियावी सज़ा है। और आख़िरत का मामला इससे कहीं ज़्यादा संगीन है, क्योंकि वहाँ हर क़ौल-व-फ़ेल का हिसाब होगा।
अल्लाह तआला के नज़दीक क़ौल-व-अमल का तज़ाद सख़्त नापसंद है। इरशाद है:
يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لِمَ تَقُولُونَ مَا لَا تَفْعَلُونَ كَبُرَ مَقْتًا عِنْدَ اللَّهِ أَنْ تَقُولُوا مَا لَا تَفْعَلُونَ (अस-सफ़: 2-3)
“ऐ ईमान वालो! तुम वह बात क्यों कहते हो जो करते नहीं? अल्लाह तआला के नज़दीक यह बात सख़्त नापसंदीदा है कि तुम वह कहो जो करते नहीं।”
इंसान की ज़ुबान उसके अमल की तर्जुमान होनी चाहिए। अगर ज़ुबान वादे करे और अमल उन्हें मुसलसल झुठलाता रहे तो ऐसा शख़्स निहायत दर्जा नाक़ाबिल-ए-एतबार हो जाता है। मोमिन की शान यह है कि उसका क़ौल उसके अमल का पेशख़ेमा हो, न कि अमल क़ौल की तकज़ीब करता फिरे।
अलबत्ता अगर किसी शख़्स ने वादा करते वक़्त वाक़ई पूरा करने का इरादा रखा, लेकिन बाद में कोई हक़ीक़ी मजबूरी पेश आ गई और वह वादा पूरा न कर सका, तो उसे उस शख़्स के बराबर नहीं रखा जाएगा जो शुरू ही से वादा पूरा करने का इरादा नहीं रखता था। बिलख़ुसूस यह उस सूरत में है जब इंसान जान-बूझकर वादा करे और वादा पूरा करने का इरादा न रखे, या बिला उज़्र उसे तोड़ दे।
इसीलिए मुसलमान को वादा करते वक़्त अपनी इस्तिताअत, हालात और मुस्तक़बिल की ज़िम्मेदारियों को सामने रखना चाहिए। हर बात पर फ़ौरन “हाँ” कहना नेकी नहीं। कभी-कभी वादा न करना, वादा करके तोड़ने से बेहतर होता है। अगर मालूम है कि फ़लाँ काम मुमकिन नहीं तो साफ़ कह देना चाहिए: “मैं मुआफ़ी चाहता हूँ, मैं यह ज़िम्मेदारी नहीं ले सकता।” लेकिन “ज़रूर कर दूँगा” कहकर बाद में जान-बूझकर ग़ायब हो जाना बदअह्दी है।
बिलावजह वादे करना भी ख़तरनाक आदत है
बाज़ लोग मुख़ातब को ख़ुश करने के लिए वादे करते हैं। किसी ने मदद माँगी, फ़ौरन कह दिया: “मैं कर दूँगा।” किसी ने क़र्ज़ माँगा: “कल दे दूँगा।” किसी ने किसी काम की उम्मीद लगाई: “आपका काम पक्का समझें।” किसी रिश्तेदार से कहा: “मैं कल आपसे ज़रूर मिलूँगा।” फिर न फ़ोन, न वज़ाहत, न माज़रत!
ऐसे बेशुमार छोटे-छोटे वादे इंसान के अख़लाक़ी किरदार को कमज़ोर करते रहते हैं। इसलिए मोमिन की ज़ुबान मुह्तात होनी चाहिए। वह बोलने से पहले सोचता है: क्या मैं यह कर सकता हूँ? क्या मुझे यह कहना चाहिए? अगर मैं यह वादा करूँ तो क्या मैं इसे पूरा कर सकूँगा?
अल्लाह तआला के नाम पर किया गया वादा और भी संगीन है
अगर किसी शख़्स ने अल्लाह तआला का नाम लेकर किसी काम का अहद किया तो मामला मज़ीद अहम हो जाता है। मिसाल के तौर पर कोई शख़्स कहे: “वल्लाह! मैं यह काम करूँगा।” यह महज़ आम वादा नहीं बल्कि क़सम के हुक्म में दाख़िल है, और इसके लिए शरई अहकाम अलग हैं। अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाते हैं:
وَاحْفَظُوا أَيْمَانَكُمْ (अल-माइदा: 89)
“और अपनी क़समों की हिफ़ाज़त करो।”
इसलिए मुसलमान को क़सम खाने में भी एहतियात बरतनी चाहिए और अल्लाह तआला के नाम को मामूली गुफ़्तगू में इस्तेमाल करके अपनी बात को ग़ैर-ज़रूरी तौर पर मुअक्कद नहीं करना चाहिए।
अहद-ए-इलाही की ख़िलाफ़वर्ज़ी सबसे बड़ी बदअह्दी है।
इंसानों से किए गए वादों के साथ-साथ क़ुरआन ए करीम ने अल्लाह तआला के साथ किए गए अह्द को भी बड़ी अहमियत दी है।
अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाते हैं:
الَّذِينَ يَنْقُضُونَ عَهْدَ اللَّهِ مِنْ بَعْدِ مِيثَاقِهِ وَيَقْطَعُونَ مَا أَمَرَ اللَّهُ بِهِ أَنْ يُوصَلَ وَيُفْسِدُونَ فِي الْأَرْضِ ۚ أُولَٰئِكَ هُمُ الْخَاسِرُونَ (अल-बक़रा: 27)
“जो लोग अल्लाह तआला के अह्द को पुख़्ता करने के बाद तोड़ देते हैं, और जिन्हें (रिश्तों को) अल्लाह तआला ने जोड़ने का हुक्म दिया है उसे काटते हैं, और ज़मीन में फ़साद बरपा करते हैं, वही लोग नुक़सान उठाने वाले हैं।”
यह आयत अह्द-शिक्नी को फ़साद और ख़सारे के साथ जोड़ती है। क्योंकि जब अह्द की हुर्मत ख़त्म हो जाए तो भरोसा ख़त्म हो जाता है, और जब भरोसा ख़त्म हो जाए तो समाजी निज़ाम कमज़ोर हो जाता है।
अह्द सिर्फ़ दोस्तों के साथ नहीं, मुख़ालिफ़ीन और दुश्मनों के साथ भी पूरा करना है।
इस्लाम की अज़्मत यह है कि उसने वफ़ादारी का उसूल सिर्फ़ अपने लोगों के लिए मुक़र्रर नहीं किया। अल्लाह तआला फ़रमाते हैं:
وَأَوْفُوا بِعَهْدِ اللَّهِ إِذَا عَاهَدْتُمْ (अन-नह्ल: 91)
“और जब तुम अह्द करो तो अल्लाह तआला के अह्द को पूरा करो।”
और आगे इरशाद फ़रमाया:
وَلَا تَنْقُضُوا الْأَيْمَانَ بَعْدَ تَوْكِيدِهَا (अन-नह्ल: 91)
“और अपनी क़समों को पुख़्ता करने के बाद न तोड़ो।”
इस्लामी अख़लाक़ का यह बुलंद मेयार है कि अगर किसी के साथ मुआहदा हो गया है तो उसे महज़ इस वजह से नहीं तोड़ा जा सकता कि अब उससे फ़ायदा हासिल नहीं हो रहा।
मोमिन मफ़ाद के ताबे नहीं बल्कि उसूल का पाबंद होता है।
बदअह्दी का एक अहम पहलू हुक़ूक़-उल-इबाद है
अगर किसी शख़्स के वादे पर किसी दूसरे इंसान ने भरोसा करके कोई फ़ैसला किया और फिर वादा-ख़िलाफ़ी की वजह से उसे नुक़सान उठाना पड़ा तो मामला सिर्फ़ अख़्लाक़ी कमज़ोरी नहीं रहता, बल्कि हुक़ूक़-उल-इबाद से मुताल्लिक़ हो जाता है। मसलन:
क़र्ज़ वापस करने का वादा करके बिलावजह टालना
मुलाज़िम की उजरत मुक़र्ररा वक़्त पर देने का वादा करके रोक लेना
कारोबारी मुआहिदे की ख़िलाफ़वर्ज़ी करना
किसी की अमानत मुक़र्ररा वक़्त पर वापस न करना
निकाह या ख़ानदानी मामलात में किए गए जायज़ वादों से बेएतनाई
किसी ज़रूरतमंद से मदद का वादा करके उसे उम्मीद में मुब्तला रखना
किसी से ज़िम्मेदारी पूरी करने का वादा करके उसे नुक़सान पहुँचाना
यह सब सूरतें अपने-अपने दर्जे में क़ाबिल-ए-एहतिसाब हैं।
और अगर बदअह्दी से किसी का माली या हक़ीक़ी हक़ ज़ाया हो गया तो सिर्फ़ “अल्लाह तआला से मुआफ़ी” काफ़ी नहीं, जिसका हक़ ज़ाया हुआ है, उसका हक़ अदा करना और मुनासिब तौर पर उससे मुआफ़ी माँगना भी ज़रूरी होगा।
इसी तरह तिजारत में वादा-ख़िलाफ़ी का असर बहुत दूर तक जाता है। एक ताजिर जब क़ीमत, मिक़दार, मेयार, वक़्त-ए-फ़राहमी या अदायगी के बारे में कोई जायज़ मुआहदा करता है तो वह दूसरे फ़रीक़ के भरोसे को क़बूल करता है। अगर वह जान-बूझकर अपने वादे से फिर जाए तो वह सिर्फ़ एक शख़्स को धोखा नहीं देता बल्कि तिजारत के बुनियादी उसूल-ए-एतमाद को मजरूह करता है।
रसूलुल्लाह ﷺ ने इरशाद फ़रमाया:
مَنْ غَشَّنَا فَلَيْسَ مِنَّا (मुस्लिम)
“जिसने हमें धोखा दिया वह हम में से नहीं।”
इस हदीस में धोखादेही की शदीद मज़म्मत है, और बदअह्दी भी इसी अख़्लाक़ी बीमारी का एक अहम मज़्हर बन सकती है।
वादा-ख़िलाफ़ी सिर्फ़ बाज़ार और कारोबार का मसला नहीं
बाज़ औक़ात इंसान बाहर की दुनिया में बड़ा बाउसूल नज़र आता है, मगर घरवालों से किए हुए वादों की कोई अह्मियत नहीं समझता। वालिदैन औलाद से वादा करते हैं और पूरा नहीं करते, शौहर बीवी से वादा करता है और भूल जाता है, बीवी शौहर से वादा करके पूरा नहीं करती, भाई भाई से वादा करके मुकर जाता है। नतीजतन भरोसा कमज़ोर हो जाता है।
ख़ुसूसन बच्चों के साथ बार-बार वादा-ख़िलाफ़ी उनके ज़हन में बड़ों की बात की क़द्र कम कर देती है। इसलिए वालिदैन को बच्चों से भी वही वादा करना चाहिए जिसे पूरा करने का इमकान हो।
अगर हम चाहते हैं कि हमारी औलाद सच्ची, अमानतदार और ज़िम्मेदार बने तो हमें उन्हें सिर्फ़ नसीहत नहीं करनी चाहिए बल्कि अपने किरदार से सबक़ देना चाहिए। बच्चा देखता है कि अब्बू ने वादा किया तो पूरा किया कि नहीं? अम्मी ने वादा करके पूरा किया कि नहीं? बड़े भाई, बड़ी बहन वादे के कितने पाबंद हैं? वह इन्हीं मुशाहदात से अख़लाक़ सीखता है। इसलिए किरदार की ज़ुबान, नसीहत की ज़ुबान से ज़्यादा मुअस्सिर होती है।
ज़रा तसव्वुर कीजिए: अगर मुलाज़िम को मालिक पर भरोसा न हो, मालिक को मुलाज़िम पर भरोसा न हो, ख़रीदार को दुकानदार पर भरोसा न हो, दुकानदार को ख़रीदार पर भरोसा न हो, मियाँ-बीवी एक दूसरे की बात पर यक़ीन न करें, दोस्त एक दूसरे के वादों पर भरोसा न करें, ताजिर मुआहदों की पाबंदी न करें, हुकूमतें अपने मुआहदों की पासदारी न करें, तो क्या कोई समाज मज़बूत रह सकता है?
हरगिज़ नहीं।
इसलिए वफ़ा-ए-अहद समाज की अहम बुनियाद है।
क़ानून हर जगह मौजूद नहीं हो सकता, अदालत हर मामले में फ़ौरी फ़ैसला नहीं कर सकती, हर शख़्स पर हर वक़्त निगरानी नहीं की जा सकती, लेकिन अगर लोगों के दिलों में अल्लाह तआला का ख़ौफ़ और अह्द की पासदारी मौजूद हो तो समाज ख़ुद-ब-ख़ुद अमन-व-एतमाद की तरफ़ बढ़ता है।
बदअह्दी सिर्फ़ ज़ुबान की बीमारी नहीं, दिल की बीमारी भी है
बार-बार वादा-ख़िलाफ़ी करने वाला शख़्स आहिस्ता-आहिस्ता तीन चीज़ें खो देता है: सच्चाई, ज़िम्मेदारी और भरोसा। फिर उसके लिए झूठ बोलना आसान हो जाता है। वादा करना और उसे तोड़ना भी आसान हो जाता है। और अपनी ग़लती तस्लीम करना, माज़रत करना बहुत मुश्किल हो जाता है। यही वह मक़ाम है जहाँ अख़लाक़ी बीमारी किरदार का हिस्सा बन जाती है। इसलिए बदअह्दी की इस्लाह इब्तिदा ही में करनी चाहिए।
माज़रत वादा-ख़िलाफ़ी का इलाज नहीं, लेकिन इस्लाह का दरवाज़ा ज़रूर है। अगर इंसान से वाक़ई कोई वादा पूरा न हो सका तो उसे ख़ामोशी इख़्तियार नहीं करनी चाहिए। उसे चाहिए कि सच बताए, माज़रत करे, दूसरे के नुक़सान की तलाफ़ी करे और आइंदा ग़ैर-ज़रूरी वादा न करे। यह रवैया इंसान को अख्लाक़ी ऐतबार से बुलंद करता है। ग़लती हो जाना इंसानी कमज़ोरी है, लेकिन ग़लती को तस्लीम न करना और उसे मुसलसल दोहराते रहना अख़्लाक़ी ज़वाल है।
वादा-ख़िलाफ़ी के बावजूद मुआफ़ी का रास्ता बंद नहीं
इस्लाम इंसान को गुनाह से डराता ज़रूर है, मगर तौबा का दरवाज़ा बंद नहीं करता। अगर किसी शख़्स ने बदअह्दी की है तो उसे चाहिए कि अल्लाह तआला से सच्ची तौबा करे, आइंदा वादा-ख़िलाफ़ी न करने का अज़्म करे, और अगर किसी बंदे का हक़ मुतअस्सिर हुआ है तो उसका हक़ अदा करे या उससे मुआफ़ी हासिल करे। यही हक़ीक़ी इस्लाह है।
नबी करीम ﷺ की सीरत , वफ़ा-ए- अह्द के रोशन नमूने
नबी करीम ﷺ की सीरत में वफ़ा-ए-अह्द के बेशुमार रोशन नमूने मौजूद हैं।
आपﷺ ने दुश्मनों के साथ भी मुआहदात की पासदारी फ़रमाई। सुलह-ए-हुदैबिया का वाक़िआ इस सिलसिले में ख़ास अहमियत रखता है। बाज़ शराइत बज़ाहिर मुसलमानों के लिए सख़्त थीं, मगर नबी करीम ﷺ ने मुआहदे की पासदारी फ़रमाई। यही इस्लामी अख़लाक़ है: जिस वक़्त वादा हमारे मफ़ाद में हो तो वफ़ादारी आसान है, लेकिन जब वादा निभाने में हमें नुक़सान महसूस हो और उसके बावजूद हम उसे पूरा करें, तब वफ़ा-ए-अहद के अख़लाक़ी कमाल का इज़हार होता है।
मुसलमान को सबसे ज़्यादा ख़ौफ़ इस बात से होना चाहिए कि कोई अख़लाक़ी बुराई रफ़्ता-रफ़्ता उसकी शख़्सियत का हिस्सा न बन जाए। आज एक वादा-ख़िलाफ़ी, कल दूसरी, फिर तीसरी, फिर वादा-ख़िलाफ़ी के लिए झूठ, फिर झूठ छुपाने के लिए दूसरा झूठ, फिर लोगों का भरोसा ख़त्म, फिर अमानत में ख़यानत, और आख़िर में इंसान का अख़लाक़ी वजूद अंदर से कमज़ोर हो जाता है। इसीलिए रसूलुल्लाह ﷺ ने वादा-ख़िलाफ़ी को निफ़ाक़ की अलामतों में शुमार फ़रमाया है।
यहाँ एक शरई उसूल भी समझना ज़रूरी है।
इस्लाम जायज़ और दुरुस्त वादों की पाबंदी की तालीम देता है। अगर कोई शख़्स गुनाह या ज़ुल्म का वादा करे तो ऐसा वादा पूरा करना जायज़ नहीं। मसलन कोई शख़्स कहे: “मैं फ़लाँ बेगुनाह को नुक़सान पहुँचाऊँगा।” या: “मैं फ़लाँ हराम काम ज़रूर करूँगा।” ऐसा वादा पूरा करना दीनी वफ़ादारी नहीं बल्कि गुनाह है।
रसूलुल्लाह ﷺ ने इरशाद फ़रमाया:
لَا طَاعَةَ فِي مَعْصِيَةٍ، إِنَّمَا الطَّاعَةُ فِي الْمَعْرُوفِ (बुख़ारी, मुस्लिम)
“गुनाह के काम में इताअत नहीं, इताअत सिर्फ़ नेकी के काम में है।”
लिहाज़ा अह्द-व-वादे की पाबंदी का हुक्म शरीअत के दायरे में है। मोमिन का अख़्लाक़ यह होना चाहिए कि वह बात सोचकर करे, वादा सोच-समझकर करे, वादा करे तो पूरा करे, मजबूर हो जाए तो बरवक़्त इत्तिला दे, नुक़सान हुआ हो तो तलाफ़ी करे और ग़लती हो जाए तो माज़रत करे।
ऐसे इंसान की ज़ुबान पर लोगों को भरोसा होता है। और जिस इंसान की ज़बान क़ाबिल-ए-एतमाद हो जाए, उसकी शख़्सियत समाज में ख़ुद-ब-ख़ुद मुहतरम हो जाती है।
क़यामत के दिन इंसान से सिर्फ़ यह नहीं पूछा जाएगा कि उसने कितनी इबादत की, बल्कि उससे यह भी पूछा जा सकता है कि: तुमने किससे क्या वादा किया था? कौन तुम पर भरोसा करके बैठा था? किसने तुम्हारी बात पर अपना फ़ैसला किया था? तुमने किसका हक़ अपने वादे की वजह से मुअत्तल किया? किसको तुमने उम्मीद दिलाई? किसका भरोसा तोड़ा? और अगर किसी बंदे का हक़ ज़ाया किया तो उसे कैसे वापस किया?
यह सवालात इंसान के लिए इंतिहाई ख़ौफ़नाक हैं। बद्अह्दी बज़ाहिर एक छोटी सी अख़लाक़ी लग़्ज़िश मालूम होती है, लेकिन हक़ीक़त में यह सच्चाई, अमानत, भरोसे और इंसानी तअल्लुक़ात की बुनियादों को मुतज़लज़ल करने वाला ख़तरनाक अख़्लाक़ी जुर्म है।
एक वादा सिर्फ़ चंद अल्फ़ाज़ का मज्मूआ नहीं, यह किसी इंसान के दिल में पैदा होने वाले भरोसे की ज़िम्मेदारी है। जब कोई शख़्स कहता है: “मैं करूँगा” — तो दूसरे इंसान के दिल में उम्मीद पैदा होती है। जब वह कहता है: “मैं ज़रूर आऊँगा” — तो दूसरा उसकी आमद पर अपने कामों की तरतीब बनाता है। जब वह कहता है: “मैं तुम्हारा हक़ अदा कर दूँगा” — तो दूसरा अपने हक़ के मिलने की उम्मीद बाँध लेता है। और जब वह बार-बार वादा करके मुकर जाता है तो वह सिर्फ़ अपना वादा नहीं तोड़ता, बल्कि किसी दूसरे इंसान के भरोसे, उम्मीद और हक़ को भी मज्रूह करता है। इसीलिए रसूलुल्लाह ﷺ ने वादा-ख़िलाफ़ी को मुनाफ़िक़ाना ख़स्लत क़रार दिया।
आइए, ख़ुद-एहतसाबी करें
हमें अपने ईमान का जायज़ा लेना चाहिए। हम दूसरों से कितने वादे करते हैं? इनमें से कितने पूरे करते हैं? क्या हमारी ज़बान पर लोगों को भरोसा है? क्या हमारे घरवाले हमारी बात पर यक़ीन करते हैं? क्या हमारे दोस्त हमारे वादों को मोतबर समझते हैं? क्या हमारे कारोबारी मामलात में हमारी ज़ुबान हमारी तहरीर के बराबर मोतबर है? क्या हमारी औलाद हमें वादा पूरा करने वाला इंसान समझती है? और सबसे बढ़कर: क्या हम उस दिन के लिए तैयार हैं जब अल्लाह तआला के सामने हमारे तमाम अह्द-व-पैमान पेश किए जाएँगे?
याद रखिए! झूठा इंसान सिर्फ़ अपनी ज़बान का एतबार खोता है, लेकिन बदअह्द इंसान दूसरों के दिलों से अपना भरोसा खो देता है। और जिस इंसान पर लोगों का भरोसा ख़त्म हो जाए, उसकी समाजी क़ुव्वत कम हो जाती है, जबकि जिस बंदे की ज़बान सच्ची, वादा पुख़्ता और किरदार क़ाबिल-ए-एतमाद हो, वह लोगों के दिलों में जगह बनाता है।
मोमिन की शान यह नहीं कि वह बहुत वादे करे, मोमिन की शान यह है कि वह कम वादे करे, लेकिन जो वादा करे उसे वफ़ा के साथ निभाए।
आइए! हम अपने आप से अहद करें कि:
हम ग़ैर-ज़रूरी वादे नहीं करेंगे,
वादा करने से पहले अपनी इस्तिताअत देखेंगे,
जायज़ वादा करेंगे तो उसे पूरा करने की पूरी कोशिश करेंगे,
किसी मजबूरी की वजह से वादा पूरा न कर सकें तो बरवक़्त इत्तिला देंगे,
किसी का हक़ मुतअस्सिर हुआ हो तो उसकी तलाफ़ी करेंगे,
और अपनी ज़ुबान को ऐसी ज़िम्मेदारी से महफ़ूज़ रखेंगे जिसे हम पूरा न कर सकें।
क्योंकि ज़ुबान से निकला हुआ वादा इंसानों के कानों तक पहुँचता है, लेकिन इसकी ज़िम्मेदारी अल्लाह तआला के इल्म में महफ़ूज़ हो जाती है।
अल्लाह तआला हमें सच्ची ज़बान, पाकीज़ा किरदार, वफ़ा-ए-अहद, अमानतदारी और हुक़ूक़-उल-इबाद की अदायगी की तौफ़ीक़ अता फ़रमाएँ। आमीन




