क़ुरान करीम, इंसानी ज़िंदगी के हर पहलू पर मुहीत एक मुकम्मल ज़ाबता-ए-हयात है। यह वह इल्मी मोजिज़ा है जिसकी रोशनी क़यामत तक आलम-ए-इंसानियत को राह दिखाती रहेगी। इसका एजाज़ सिर्फ़ मानवी नहीं बल्कि उस्लूबियाती, इल्मी और कानूनी पहलुओं में भी नुमायाँ है।
यह ऐसा ज़िंदा मोजिज़ा है जिसने फ़साहत व बलाग़त के दावेदारों को आजिज़ कर दिया और जिसके दलाईल हर दौर में अपनी सच्चाई साबित करते रहे हैं।
अदबी एजाज़
क़ुरान करीम का उस्लूब (शैली) बे-नज़ीर और नामुमकिन-उत-तमसील (जिसकी मिसाल देना असंभव हो) है। इसकी ज़बान में एक ऐसा रब्त, हुस्न-ए-बयान, और मानी की गहराई है कि अरब के फ़सीह व बलीग़ शुअरा (कवियों) और खुतबा (वक्ताओं) भी इसके सामने झुक गए।
इसके अल्फ़ाज़ दिलों में उतरने वाले, इसकी तरतीब मुहैय्युर-अल-उक़ूल (बुद्धि को हैरान कर देने वाली), और इसके जुमले एक मुनफ़रिद (अनोखी) कशिश के हामिल हैं। अरबों के अदबी उरूज के दौर में, जबकि ज़बान व बयान के माहिरन अपने कमालात के झंडे गाड़ चुके थे, क़ुरान करीम ने उन्हें चैलेंज किया।
وَإِن كُنتُمْ فِي رَيْبٍ مِّمَّا نَزَّلْنَا عَلَىٰ عَبْدِنَا فَأْتُوا۟ بِسُورَةٍ مِّن مِّثْلِهِ (البقرہ: 23)
अगर तुम हमारी नाज़िल करदा आयात में से किसी आयत के बारे में शक में पड़े हो तो इस जैसी कोई एक सूरत ही ले आओ।
अल्लाह तआला के इस चैलेंज के बाद
अरब के फ़सीह व बलीग़ शुअरा, जो अपनी ज़बान दानी पर नाज़ां थे, क़ुरान करीम के मुनफ़रिद उस्लूब और मोजिज़ाती फ़साहत व बलाग़त के सामने बेबस नज़र आए।
जबकि अरब का माशरा शेर-ओ-अदब के उरूज पर था, और वे नस्र-ओ-नज़्म (गद्य और पद्य) के माहिर समझे जाते थे। लेकिन जब क़ुरान करीम की आयात उनके सामने आईं, तो उनकी तमाम फ़न्नी व लिसानी (तकनीकी और भाषाई) बरतरी मांद पड़ गई। और तमाम तर लिसानी महारत के बावजूद कोई शख़्स इस जैसा कलाम पेश करने की हिम्मत न कर सका।
चुनांचे जाहिली शुअरा और अहल-ए-अरब का रद्दे-अमल हैरानी, एतराफ़-ए-आजिज़ (विवशता का स्वीकार) और बाज़ औक़ात हसद व इंकार की सूरत में सामने आया।
▪️वलीद बिन मुग़ीरा की आज़िज़ी▪️
मशहूर अरब शायर और फ़सीह व बलीग़ ख़तीब वलीद बिन मुग़ीरा, जो नबी करीम ﷺ का शदीद (सख़्त) मुख़ालिफ़ था, जब उसने क़ुरान करीम को सुना तो दंग रह गया और उसने क़ुरैश के सरदारों से कहा:
“وَاللَّهِ إِنِّي لَسَمِعْتُ مِنْ مُحَمَّدٍ كَلَامًا مَا هُوَ مِنْ كَلَامِ الْإِنْسِ، وَلَا مِنْ كَلَامِ الْجِنِّ، وَإِنَّ لَهُ لَحَلَاوَةً، وَإِنَّ عَلَيْهِ لَطَلَاوَةً، وَإِنَّهُ لَمُثْمِرٌ أَعْلَاهُ، مُغْدِقٌ أَسْفَلُهُ، وَإِنَّهُ لَيَعْلُو وَلَا يُعْلَى عَلَيْهِ.” (तफ़सीर इब्न-ए-कसीर)
“अल्लाह की क़सम! मैंने मोहम्मद (ﷺ) से एक ऐसा कलाम सुना है जो न इंसान का कलाम मालूम होता है और न किसी जिन का। इसकी मिठास बे-मिसाल है, इसकी रोशनी दरख़्शां (चमकदार) है, वह ग़ालिब है, कोई उस पर ग़ालिब नहीं आ सकता।”
लेकिन हसद (ईर्ष्या) और ज़िद की वजह से क़ुरैश ने इसे जादू क़रार दे दिया, हालांकि वे खुद इसकी फ़साहत व बलाग़त से मग़लूब (प्रभावित) हो चुके थे।
लबैद बिन रबीआ का एतराफ़-ए-हक़
लबैद बिन रबीआ जाहिलियत के सबसे बड़े शुअरा में शुमार होते थे और उनके अशआर मक्का की दीवारों पर आवेज़ां (लटकाए) किए जाते थे। जब उन्होंने क़ुरान करीम सुना तो उन पर इतना असर हुआ कि उन्होंने शायरी तर्क कर दी और इस्लाम क़बूल कर लिया।
एक मौक़ा पर जब उनसे कहा गया कि वह कुछ अशआर सुनाएं, तो उन्होंने जवाब दिया:
“ما كنت لأقول شعرًا بعد أن قرأت القرآن.” (अल-इसाबा फ़ी तमीज़-इस-सहाबा)
“क़ुरान करीम पढ़ने के बाद मैंने शायरी को तर्क कर दिया है, क्योंकि अब शायरी की कोई ज़रूरत नहीं रही।”
रज़ियल्लाहु तआला अन्हु
उमय्या बिन अबी अस्-सल्त की हैरानी
उमय्या बिन अबी अस्-सल्त जाहिली दौर का मशहूर शायर था जो तौहीद और आख़िरत पर यक़ीन रखता था। उसका ख़याल था कि नबी-ए-आख़िरुज़्ज़मां वह खुद होगा।
लेकिन जब नबी करीम ﷺ की बेअसत (नुबूवत) हुई और उसने क़ुरान करीम सुना तो इसकी फ़साहत व बलाग़त से मुतास्सिर हुए बग़ैर न रह सका, मगर हसद और अनाद (दुश्मनी) की वजह से ईमान से महरूम रहा।
नबी करीम ﷺ इसके अशआर को पसंद फ़रमाते थे और सहाबा इकराम से सुनते थे। सहीह मुस्लिम की रिवायत है कि शरीद बिन सुवेद रज़ियल्लाहु अन्हु बयान करते हैं:
“رَدِفْتُ رَسُولَ اللهِ ﷺ يَوْمًا، فَقَالَ لِي: «هَلْ مَعَكَ مِنْ شِعْرِ أُمَيَّةَ بْنِ أَبِي الصَّلْتِ شَيْءٌ؟» قُلْتُ نَعَمْ. قَالَ: «هِيَهْ». فَأَنْشَدْتُهُ بَيْتًا، فَقَالَ: «هِيَهْ» ثُمَّ أَنْشَدْتُهُ بَيْتًا، فَقَالَ: «هِيَهْ». حَتَّى أَنْشَدْتُهُ مِائَةَ بَيْتٍ.” (सहीह मुस्लिम, किताबुश-शेर)
एक दिन मैं रसूल अल्लाह ﷺ के पीछे सवार था, तो आप ﷺ ने मुझ से फ़रमाया ‘क्या तुम्हारे पास उमय्या बिन अबी अस्-सल्त के कुछ अशआर हैं?’ मैंने अर्ज़ किया: जी हाँ। आप ﷺ ने फ़रमाया: ‘सुनाओ।’ मैंने एक शेर सुनाया, तो आप ﷺ ने फ़रमाया: ‘और सुनाओ।’ फिर मैंने एक और शेर सुनाया तो आप ﷺ ने फ़रमाया: ‘और सुनाओ।’ यहाँ तक कि मैंने आप ﷺ को सौ अशआर सुनाए।
▪️क़ुरैश की मुख़ालिफ़त और बेबसी▪️
क़ुरैश के सरदारों ने देखा कि लोग क़ुरान करीम की तासीर से मसहूर (प्रभावित) हो रहे हैं, तो उन्होंने लोगों को क़ुरान करीम सुनने से मना किया और लोगों को रोकने के लिए मुख़्तलिफ़ हरबे (तरीके) इस्तेमाल किए।
मगर क़ुरान करीम की तासीर ऐसी थी कि खुद उनके बड़े सरदार रात की तारीख़ी में छुप कर रसूल अल्लाह ﷺ की तिलावत सुनते थे।
तारीख़ में है कि अबू सुफ़यान, अबू जहल और अख़नस बिन शरीक़ रात के वक़्त छुप कर क़ुरान करीम सुनते थे और एक दूसरे से मिलने पर अहद करते थे कि दोबारा ऐसा नहीं करेंगे, मगर फिर भी वे अपनी ख़्वाहिश पर क़ाबू न पाते और दोबारा क़ुरान करीम सुनने आ जाते थे।
(सीरत इब्न-ए-हिशाम)
▪️नज़र बिन अल-हारिस का एतराफ़▪️
नज़र बिन अल-हारिस, जो रसूल अल्लाह ﷺ की मुख़ालिफ़त में पेश-पेश था, क़ुरान करीम सुन कर बे-अख़्तियार कह पड़ा:
لَقَدْ سَمِعْتُ مِنْهُ كَلَامًا مَا هُوَ مِنْ كَلَامِ الْإِنْسِ وَلَا مِنْ كَلَامِ الْجِنِّ، وَإِنَّ لَهُ لَحَلَاوَةً، وَإِنَّ عَلَيْهِ لَطَلَاوَةً. (दलाईल-उन-नुबूव्वह लिल-बैहक़ी)
“मैंने मोहम्मद (ﷺ) से ऐसा कलाम सुना है जो न इंसानों का कलाम मालूम होता है और न जिन्नों का। इसमें बे-मिसाल मिठास है और इसकी चमक-दमक बहुत दिलकश है।”
▪️वलीद बिन मुग़ीरा की आज़िज़ी▪️
मशहूर अरब शायर और फ़सीह व बलीग़ ख़तीब वलीद बिन मुग़ीरा, जो नबी करीम ﷺ का शदीद (सख्त) मुखालिफ़ था, जब उसने क़ुरान करीम को सुना तो दंग रह गया और उसने क़ुरैश के सरदारों से कहा:
“وَاللَّهِ إِنِّي لَسَمِعْتُ مِنْ مُحَمَّدٍ كَلَامًا مَا هُوَ مِنْ كَلَامِ الْإِنْسِ، وَلَا مِنْ كَلَامِ الْجِنِّ، وَإِنَّ لَهُ لَحَلَاوَةً، وَإِنَّ عَلَيْهِ لَطَلَاوَةً، وَإِنَّهُ لَمُثْمِرٌ أَعْلَاهُ، مُغْدِقٌ أَسْفَلُهُ، وَإِنَّهُ لَيَعْلُو وَلَا يُعْلَى عَلَيْهِ.” (तफ़सीर इब्न-ए-कसीर)
“अल्लाह की क़सम! मैंने मोहम्मद (ﷺ) से एक ऐसा कलाम सुना है जो न इंसान का कलाम मालूम होता है और न किसी जिन का। इसकी मिठास बे-मिसाल है, इसकी रोशनी दरख्शां (चमकदार) है, वह ग़ालिब है, कोई उस पर ग़ालिब नहीं आ सकता।”
लेकिन हसद और ज़िद की वजह से क़ुरैश ने इसे जादू करार दे दिया, हालांकि वे खुद इसकी फ़साहत व बलाग़त से मग़लूब (प्रभावित) हो चुके थे।
लबैद बिन रबीआ का एतराफ़-ए-हक़
लबैद बिन रबीआ जाहिलियत के सबसे बड़े शुअरा में शुमार होते थे और उनके अशआर मक्का की दीवारों पर आवेज़ां (लटकाए) किए जाते थे। जब उन्होंने क़ुरान करीम सुना तो उन पर इतना असर हुआ कि उन्होंने शायरी तर्क कर दी और इस्लाम क़बूल कर लिया।
एक मौक़ा पर जब उनसे कहा गया कि वह कुछ अशआर सुनाएं, तो उन्होंने जवाब दिया:
“ما كنت لأقول شعرًا بعد أن قرأت القرآن.” (अल-इसाबा फ़ी तमीज़-इस-सहाबा)
“क़ुरान करीम पढ़ने के बाद मैंने शायरी को तर्क कर दिया है, क्योंकि अब शायरी की कोई ज़रूरत नहीं रही।”
रज़ियल्लाहु तआला अन्हु
उमय्या बिन अबी अस्-सल्त की हैरानी
उमय्या बिन अबी अस्-सल्त जाहिली दौर का मशहूर शायर था जो तौहीद और आख़िरत पर यक़ीन रखता था। उसका ख़याल था कि नबी-ए-आख़िरुज़्ज़मां वह खुद होगा।
लेकिन जब नबी करीम ﷺ की बेअसत (नुबूवत) हुई और उसने क़ुरान करीम सुना तो इसकी फ़साहत व बलाग़त से मुतास्सिर हुए बग़ैर न रह सका, मगर हसद और अनाद (दुश्मनी) की वजह से ईमान से महरूम रहा।
नबी करीम ﷺ इसके अशआर को पसंद फ़रमाते थे और सहाबा इकराम से सुनते थे। सहीह मुस्लिम की रिवायत है कि शरीद बिन सुवेद रज़ियल्लाहु अन्हु बयान करते हैं:
“رَدِفْتُ رَسُولَ اللهِ ﷺ يَوْمًا، فَقَالَ لِي: «هَلْ مَعَكَ مِنْ شِعْرِ أُمَيَّةَ بْنِ أَبِي الصَّلْتِ شَيْءٌ؟» قُلْتُ نَعَمْ. قَالَ: «هِيَهْ». فَأَنْشَدْتُهُ بَيْتًا، فَقَالَ: «هِيَهْ» ثُمَّ أَنْشَدْتُهُ بَيْتًا، فَقَالَ: «هِيَهْ». حَتَّى أَنْشَدْتُهُ مِائَةَ بَيْتٍ.” (सहीह मुस्लिम, किताबुश-शेर)
एक दिन मैं रसूल अल्लाह ﷺ के पीछे सवार था, तो आप ﷺ ने मुझ से फ़रमाया ‘क्या तुम्हारे पास उमय्या बिन अबी अस्-सल्त के कुछ अशआर हैं?’ मैंने अर्ज़ किया: जी हाँ। आप ﷺ ने फ़रमाया: ‘सुनाओ।’ मैंने एक शेर सुनाया, तो आप ﷺ ने फ़रमाया: ‘और सुनाओ।’ फिर मैंने एक और शेर सुनाया तो आप ﷺ ने फ़रमाया: ‘और सुनाओ।’ यहाँ तक कि मैंने आप ﷺ को सौ अशआर सुनाए।
▪️क़ुरैश की मुख़ालिफ़त और बेबसी▪️
क़ुरैश के सरदारों ने देखा कि लोग क़ुरान करीम की तासीर से मसहूर (प्रभावित) हो रहे हैं, तो उन्होंने लोगों को क़ुरान करीम सुनने से मना किया और लोगों को रोकने के लिए मुख़्तलिफ़ हरबे (तरीके) इस्तेमाल किए।
मगर क़ुरान करीम की तासीर ऐसी थी कि खुद उनके बड़े सरदार रात की तारीख़ी में छुप कर रसूल अल्लाह ﷺ की तिलावत सुनते थे।
तारीख़ में है कि अबू सुफ़यान, अबू जहल और अख़नस बिन शरीक़ रात के वक़्त छुप कर क़ुरान करीम सुनते थे और एक दूसरे से मिलने पर अहद करते थे कि दोबारा ऐसा नहीं करेंगे, मगर फिर भी वे अपनी ख़्वाहिश पर क़ाबू न पाते और दोबारा क़ुरान करीम सुनने आ जाते थे।
(सीरत इब्न-ए-हिशाम)
▪️नज़र बिन अल-हारिस का एतराफ़▪️
नज़र बिन अल-हारिस, जो रसूल अल्लाह ﷺ की मुख़ालिफ़त में पेश-पेश था, क़ुरान करीम सुन कर बे-अख़्तियार कह पड़ा:
لَقَدْ سَمِعْتُ مِنْهُ كَلَامًا مَا هُوَ مِنْ كَلَامِ الْإِنْسِ وَلَا مِنْ كَلَامِ الْجِنِّ، وَإِنَّ لَهُ لَحَلَاوَةً، وَإِنَّ عَلَيْهِ لَطَلَاوَةً. (दलाईल-उन-नुबूव्वह लिल-बैहक़ी)
मैंने मोहम्मद (ﷺ) से ऐसा कलाम सुना है जो न इंसानों का कलाम मालूम होता है और न जिन्नों का। इसमें बे-मिसाल मिठास है और इसकी चमक-दमक बहुत दिलकश है।
▪️फ़ुसहा-ए-क़ुरैश का इज्तिमाई एतराफ़▪️
क़ुरान करीम के इस चैलेंज के बाद कि अगर तुम क़ुरान करीम को इंसानी कलाम समझते हो तो इस जैसी एक सूरत बना कर ले आओ, तो अरब के बड़े-बड़े फ़ुसहा और शुअरा ने जमा होकर तबअ-आज़माई की मगर सब के सब आजिज़ रहे और बोल पड़े:
“والله ما هذا بكلام بشر” (अत-तबरी)
“अल्लाह की क़सम! यह किसी बशर (इंसान) का कलाम नहीं है।”
और यह चैलेंज आज भी बदस्तूर क़ायम है, मगर सदियाँ गुज़र जाने के बावजूद कोई इसके हम-पल्ला कलाम पेश न कर सका।
अक़्ली व साइंसी दलाईल
क़ुरान करीम, अक़्ल-ए-इंसानी को ग़ौर-ओ-फ़िक्र की दावत देता है। यह सिर्फ़ अक़ायद व अहकाम बयान नहीं करता है बल्कि कायनात और इंसानी तख़लीक़ के ऐसे राज़ भी बयान करता है जो सदियों बाद जदीद (आधुनिक) साइंस के ज़रिए साबित हुए।
मिसाल के तौर पर
▪️तख़लीक़-ए-इंसानी के मराहिल▪️
क़ुरान करीम ने माँ के रहम में बच्चे की तख़लीक़ (निर्माण) के मराहिल (चरणों) का तफ़्सीली ज़िक्र किया है:
ثُمَّ خَلَقْنَا النُّطْفَةَ عَلَقَةً فَخَلَقْنَا الْعَلَقَةَ مُضْغَةً فَخَلَقْنَا الْمُضْغَةَ عِظَامًا فَكَسَوْنَا الْعِظَامَ لَحْمًا (अल-मुअमिनून: 14)
फिर हमने नुत्फ़े को जमे हुए ख़ून की शक्ल दी, फिर ख़ून के लोथड़े को गोश्त का टुकड़ा बनाया, फिर गोश्त के टुकड़े को हड्डियों में बदला, फिर हड्डियों पर गोश्त चढ़ाया।
यह जदीद एम्ब्रियोलॉजी (जनिनियात) के मुताबिक़ है जिसे डॉक्टर कीथ मोर जैसे माहिरन ने तस्लीम किया।
कायनात की तौसी (विस्तार)
अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है: وَالسَّمَاءَ بَنَيْنَاهَا بِأَيْدٍ وَإِنَّا لَمُوسِعُونَ (अज़-ज़ारियात: 47)
“और आसमान को हमने कु़व्वत से बनाया और हम ही इसे वुसअत (विस्तार) देने वाले हैं।”
जदीद फ़लकियात (आधुनिक खगोल विज्ञान) के मुताबिक़ कायनात मुसलसल फैल रही है।
कायनात का यह फैलाव (Expanding Universe) के साइंसी नज़रिए के ऐन मुताबिक़ है, जिसे 20वीं सदी में एडविन हबल (Edwin Hubble) ने दरयाफ़्त किया था।
जब कि क़ुरान करीम 1400 साल पहले इस हक़ीक़त को बयान कर चुका था।
پہاڑوں کا کردار (पहाड़ों का किरदार)
क़ुरान करीम बयान करता है कि पहाड़ ज़मीन को इस्तहकाम (मज़बूती) देते हैं:
وَجَعَلْنَا فِي الْأَرْضِ رَوَاسِيَ أَن تَمِيدَ بِهِمْ (अल-अंबिया: 31)
“और हमने ज़मीन में मज़बूत पहाड़ रख दिए ताकि वह उन्हें लेकर डगमगा न जाए।”
यह नज़रिया जदीद प्लेट टेक्टोनिक्स (Plate Tectonics) से मुताबिक़त रखता है, जो ज़मीन की सतह पर मौजूद प्लेटों और पहाड़ों के इस्तहकाम में उनके किरदार को साबित करता है।
पानी में ज़िंदगी की इब्तिदा
साइंस साबित कर चुकी है कि ज़िंदगी की इब्तिदा पानी में हुई, जबकि क़ुरान करीम ने सदियों पहले फ़रमा दिया था:
وَجَعَلْنَا مِنَ الْمَاءِ كُلَّ شَيْءٍ حَيٍّ (अल-अंबिया: 30)
“और हमने हर जानदार चीज़ को पानी से बनाया।”
यह हयातियात (Biology) के बुनियादी उसूलों में शामिल है कि तमाम ज़िंदा ख़लियात (Cells) का बड़ा हिस्सा पानी पर मुश्तमिल होता है।
दो समंदरों का न मिलना
क़ुरान बयान करता है कि दो मुख़्तलिफ़ समंदर आपस में नहीं मिलते बल्कि उनके दरमियान एक रुकावट होती है:
مَرَجَ الْبَحْرَيْنِ يَلْتَقِيَانِ بَيْنَهُمَا بَرْزَخٌ لَّا يَبْغِيَانِ (अर-रहमान: 19-20)
“उसने दो समंदरों को छोड़ दिया कि वे मिलते हैं, मगर उनके दरमियान एक पर्दा है, वे एक दूसरे से आगे नहीं बढ़ते।”
यह समंदरियात (Oceanography) में दरयाफ़्त शुदा हक़ीक़त है कि मुख़्तलिफ़ समंदरों में पानी की कशाफ़त (Density), नमकियात और दर्जा-ए-हरारत (Temperature) के फ़र्क़ की वजह से वे अलाहिदा रहते हैं।
क़ुरान करीम के ये साइंसी चैलेंजेस इसकी इल्हामी हैसियत का वाज़ेह सुबूत हैं। एक ऐसे दौर में जब साइंसी इल्म महदूद था, इन हक़ायक़ का बयान होना किसी इंसानी तस्नीफ़ का काम नहीं हो सकता।
यही वजह है कि क़ुरान करीम ने बारहा इंसान को तहक़ीक़ और तदब्बुर की दावत दी है।
अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:
سَنُرِيهِمْ آيَاتِنَا فِي الْآفَاقِ وَفِي أَنفُسِهِمْ حَتَّىٰ يَتَبَيَّنَ لَهُمْ أَنَّهُ الْحَقُّ (फ़ुस्सिलत: 53)
“हम उन्हें अपनी निशानियाँ आफ़ाक़ (ब्रह्मांड) में भी दिखाएंगे और खुद उनके नफ़्स में भी, यहाँ तक कि उन पर वाज़ेह हो जाएगा कि यही हक़ है।”
साइंसदान, जिन्होंने क़ुरान करीम से मुतास्सिर होकर इस्लाम क़बूल किया
प्रोफ़ेसर कीथ एल. मोर मरूफ़ एम्ब्रियोलॉजिस्ट, कनाडा
डॉ. कीथ एल. मोर (प्रोफ़ेसर ऑफ़ एम्ब्रियोलॉजी, कनाडा)
“The descriptions of the human embryo in the Qur’an cannot be based on scientific knowledge in the 7th century… It is inconceivable that this information could have come from a human source.”
“क़ुरान करीम में इंसानी जनीन (Embryo) की जो तफ़्सीलात हैं, वह सातवीं सदी के साइंसी इल्म पर मबनी नहीं हो सकतीं… यह नामुमकिन है कि यह मालूमात किसी इंसानी ज़रिया से आई हों।”
प्रोफ़ेसर ई. मार्शल जॉनसन Dr. E. Marshall Johnson (Professor of Anatomy & Developmental Biology, USA)
“As a scientist, I can only deal with things which I can specifically see. I can understand embryology and developmental biology. I can understand the words that are translated to me from the Qur’an. If I were to transpose myself into that era, knowing what I do today and describing things, I could not describe the things that were described in the Qur’an.”
ब-तौर साइंसदान, मैं सिर्फ़ वही चीज़ें जाँच सकता हूँ जो मैं देख सकता हूँ। मैं एम्ब्रियोलॉजी और डेवलपमेंटल बायोलॉजी को समझ सकता हूँ। मैं क़ुरान से मेरे लिए तर्जुमा शुदा (अनुवादित) अल्फ़ाज़ को भी समझ सकता हूँ। अगर मैं अपने आप को उस दौर में रखूँ, और आज जो कुछ जानता हूँ उसकी बुनियाद पर चीज़ों को बयान करने की कोशिश करूँ, तो मैं क़ुरान में दी गई तफ़्सीलात बयान नहीं कर सकता।”
डॉक्टर हेनरी लार्सन सीनियर प्रोफ़ेसर हार्वर्ड यूनिवर्सिटी, मौरूसी (आनुवंशिक) अंधेपन के इलाज के लिए स्टेम सेल दवा के मोजिद (आविष्कारक)।
Dr. Henry Larson (Harvard Professor & Stem Cell Researcher, USA)
“When I studied the Qur’an and compared it with modern scientific findings, I was amazed at its accuracy. This led me to accept Islam.
“जब मैंने क़ुरान करीम का मुतालआ किया और इसे जदीद साइंसी दरयाफ़्तों से मवाज़ना (तुलना) किया, तो मैं इसकी दुरुस्ती से हैरान रह गया। यही चीज़ मुझे इस्लाम क़बूल करने की तरफ ले गई।”
डॉक्टर ओकडा (जापानी साइंसदान) सूरह अल-हिज्र की आयत नंबर 36 से मुतास्सिर होकर इस्लाम में दाख़िल हुए।
Dr. Okuda (Japanese Scientist, Japan) “The statement in the Qur’an about human creation from ‘altered black smooth mud’ (Surah Al-Hijr:26) intrigued me. This aligns perfectly with our findings in genetics and embryology.”
“क़ुरान करीम में ‘बदली हुई काली हमवार मिट्टी’ से इंसान की तख़लीक़ के बयान ने मुझे हैरान कर दिया। यह हमारी जेनेटिक्स और एम्ब्रियोलॉजी की दरयाफ़्तों से मुकम्मल तौर पर मुताबिक़त रखता है।”
सऊदी आलिम शेख अब्दुल हमीद ज़िंदानी के मुताबिक़, एक साइंसदां ने इंसानी जिल्द (त्वचा) में दर्द के एहसास पर तहक़ीक़ की। जब उन्होंने सूरह निसा आयत नंबर 56 पढ़ी तो वह हैरान रह गए कि क़ुरान करीम ने चौदह सौ साल पहले ही यह हक़ीक़त बयान कर दी थी। इस इंक़शाफ़ के बाद उन्होंने इस्लाम क़बूल कर लिया और उनके ज़रिए मज़ीद 500 लोग हलग़ा-ब-गोश-ए-इस्लाम (इस्लाम में शामिल) हुए।
Unidentified Professor (USA/Germany) – Research on Pain Receptors “We discovered that pain sensation is only possible due to nerve endings in the skin. The Qur’an mentioned this fact over 1400 years ago in Surah An-Nisa (4:56). How could this knowledge have been available at that time? I embraced Islam after learning this truth.”
“हमने दरयाफ़्त किया कि दर्द का एहसास सिर्फ़ जिल्द (त्वचा) में मौजूद आसाबी सिरों (Nerve endings) की वजह से मुमकिन है। क़ुरान करीम ने 1400 साल पहले सूरह निसा 56 में इस हक़ीक़त को बयान कर दिया था। उस वक़्त यह इल्म कैसे दस्तयाब हो सकता था? इस हक़ीक़त को जानने के बाद मैंने इस्लाम क़बूल कर लिया।”
तशरीई निज़ाम:
▪️मबनी बर इंसाफ़▪️
क़ुरान करीम एक जामे (व्यापक) क़ानूनी और समाजी निज़ाम भी पेश करता है, जो फ़र्द (व्यक्ति) और मुआशरे (समाज) दोनों की इस्लाह (सुधार) करता है। चाहे वह अदल-ओ-इंसाफ़ का मामला हो, तिजारत व मईशत (व्यापार और अर्थव्यवस्था) के उसूल हों, या इज़्दिवाजी व आइली ज़िंदगी (वैवाहिक और पारिवारिक जीवन) के ज़वाबित (नियम)। हर पहलू पर क़ुरान करीम की तअलीमात मुकम्मल और मुतवाज़िन (संतुलित) हैं।
अदल-ओ-इंसाफ़
إِنَّ ٱللَّهَ يَأْمُرُ بِٱلْعَدْلِ وَٱلْإِحْسَانِ (अन-नहल: 90)
“बेशक, अल्लाह तआला अदल (न्याय) और एहसान का हुक्म देते हैं।”
यह उसूल इस्लामी क़ानून और अदालती निज़ाम की बुनियाद बना, जिसने दुनिया को एक ग़ैर-जानिबदार (निष्पक्ष) और मुंसिफ़ाना अदलिया का तसव्वुर (अवधारणा) दिया।
मईशी उसूल (आर्थिक सिद्धांत)
أَحَلَّ ٱللَّهُ ٱلْبَيْعَ وَحَرَّمَ ٱلرِّبَوٰا۟ (अलबक़रह: 275)
“अल्लाह तआला ने तिजारत को हलाल किया और सूद (ब्याज) को हराम क़रार दिया।”
जदीद मईशत (आधुनिक अर्थव्यवस्था) में भी सूदी निज़ाम के नुक़सानात तस्लीम किए जाने लगे हैं, जबकि क़ुरान करीम ने बहुत पहले ही इससे बचने की तलक़ीन कर दी थी।
क़ुरान करीम, एक ज़िंदा मोजज़ा
क़ुरान करीम का एजाज़ (चमत्कार) हर दौर में आशकार (प्रकट) होता रहा है। इसकी फ़साहत व बलाग़त ने अदीबों (साहित्यकारों) को मांद (फीका) कर दिया, इसके साइंसी हक़ायक़ ने साइंसदानों को हैरान कर दिया, और इसके क़वानीन ने मुआशरों (समाजों) में अदल-ओ-इंसाफ़ की शमऐं रोशन कर दीं।
यह एक ऐसा कलाम है जिसके अल्फ़ाज़ में रोशनी, मआनी (अर्थ) में गहराई, और पैग़ाम में ज़िंदगी की तमाम जेहतों (पहलुओं) का अहाता (समावेश) है। यही वजह है कि यह आज भी ज़िंदा-ओ-जावेद है, इंसानियत के लिए चराग़-ए-राह है, और क़यामत तक हर शोबा-ए-ज़िंदगी (जीवन के हर क्षेत्र) में रहनुमाई का सरचश्मा (स्रोत) रहेगा।
अबदी हिदायत
क़ुरान करीम का पैग़ाम हर ज़माने के इंसानों के लिए यकसां (एक जैसा) मौज़ूं और क़ाबिल-ए-अमल है। इसकी तअलीमात सिर्फ़ रूहानी ही नहीं बल्कि अक़्ली, साइंसी और क़ानूनी बुनियादों पर भी नाक़ाबिल-ए-तरदीद (अकाट्य) हैं।
अल्लाह तआला हम सब को क़ुरान करीम की अहमियत को समझने का शुऊर बख़्शें।
आमीन





