तारीख़ गवाह है कि क़ौमें जब अपने फ़िक्री, दीनी और तहज़ीबी तशख़्ख़ुस (पहचान) से दस्तबरदार हो जाती हैं तो उनकी शनाख़्त मिट जाती है और वह किसी ग़ालिब क़ौम के साये में अपनी हस्ती खो बैठती हैं।
ऐसे ही लम्हों में एक लफ़्ज़ पूरी शिद्दत से उभरता है: “तशब्बोह”।
तशब्बोह, एक तहज़ीबी अलमिया (सांस्कृतिक त्रासदी) है जिसमें क़ौमें अपनी असलियत छोड़कर दूसरों की ज़ाहिरी चमक-दमक में गुम हो जाती हैं।
किसी दूसरी क़ौम की मुशाबहत इख़्तियार करना—उसकी मख़सूस रस्मों, तरीक़ों, लिबास, अंदाज़, आदात-ओ-अतवार और त्यौहार को अपनाना, यानी अपना तशख़्ख़ुस छोड़कर दूसरों की हैयत (रूप) में ढल जाना।
इस्लाम में ऐसा करना सिर्फ़ नापसंदीदा नहीं बल्कि शनाख़्ती ख़ुदकुशी के मुतरादिफ़ (समान) समझा गया है।
रसूलुल्लाह ﷺ ने इरशाद फ़रमाया: “मन् तशब्बहा बि-क़ौमिन फ़हुवा मिन्हुम” “जो किसी क़ौम की मुशाबहत इख़्तियार करे, वह उन्हीं में शुमार होगा।” (सुनन अबी दाऊद)
यह हदीस, किसी क़ौम की न सिर्फ़ ज़ाहिरी मुशाबहत से मना करती है, बल्कि उसकी तरफ़ दिल-ओ-दिमाग़ के झुकाव से भी रोकती है। यहाँ असल मसला महज़ लिबास या वज़अ-ओ-क़तअ (हूलिये) का नहीं, बल्कि फ़िक्र, रवैये और शनाख़्त (पहचान) का है।
आज हम जिस दौर से गुज़र रहे हैं, वह तहज़ीबी यलग़ार (सांस्कृतिक आक्रमण) का दौर है। मग़रिब (पश्चिम) की ज़ाहिरी तरक़्क़ी, साइंसी शौकत और मीडिया के बे-तहाशा असर ने हमारे नौजवानों के दिल-ओ-दिमाग़ में यह वसवसा बिठा दिया है कि तरक़्क़ी-याफ़्ता होने के लिए मग़रिबी तर्ज़-ए-ज़िंदगी इख़्तियार करना नागुज़ीर (अनिवार्य) है।
चुनाँचे अब ईद की चमक-दमक मांद और क्रिसमस की चकाचौंध बढ़ रही है। ज़िंदगी में एक बार बच्चों का अक़ीक़ा करना मुश्किल हो रहा है, इसकी हिकमत और मश्रूइयत (वैधता) पर तरह-तरह के सवालात हो रहे हैं, मगर हर साल बर्थ-डे मनाना, केक काटना और मोमबत्तियों पर फूँक मारना तरक़्क़ी की अलामत (निशानी) है।
अक़ीक़ा की मश्रूइयत (वैधता) पर सवाल उठाने वाले, इन आमाल की अफ़ादियत (उपयोगिता) बताने के लिए तैयार नहीं हैं।
सादगी की जगह नमूूद-ओ-नुमाइश (दिखावा) और इस्लामी वक़ार की जगह मग़रिबी फ़ैशन ने ले ली है।
एहसास-ए-कमतरी
तशब्बोह दरअस्ल एहसास-ए-कमतरी की अलामत (हीन भावना की निशानी) है। जब कोई क़ौम अपने इक़दार (मूल्यों) पर एतमाद खो देती है, तो वह दूसरों की तक़लीद (नकल) को इज़्ज़त समझने लगती है।
मगर याद रखें कि क़ौमें जब दूसरों की नक़्क़ाली में ख़ुद को भूल जाती हैं, तो वह किधर की भी नहीं रहतीं… न उन्हें असली तरक़्क़ी मिलती है, न रूहानी सुकून।
मुसलमानों की पहचान
मुसलमानों की शनाख़्त (पहचान), हमेशा उनकी सच्चाई, अमानतदारी, वादा-वफ़ाई, अहद की पाबंदी, इन्साफ़, तवाज़ो (विनम्रता) और ईमान से वाबस्ता रही है। उन्होंने हमेशा दुनिया को मुतास्सिर (प्रभावित) किया है, खुद मरऊब (प्रभावित या दबे हुए) नहीं हुए हैं।
सहाबा-ए-किराम रज़ियल्लाहु अन्हुम, ताबेईन और अहलुल्लाह, कभी किसी बातिल तहज़ीब के सामने नहीं झुके, बल्कि अपनी असल पर क़ायम रहकर दुनिया वालों की रहनुमाई की।
तशब्बोह का रद
किसी क़ौम की मुशाबहत से बचना दरअस्ल अपने तशख़्ख़ुस (पहचान) की हिफ़ाज़त है। यह वही तशख़्ख़ुस है जिस पर क़ुरआन करीम ने फ़ख़्र किया है।
इरशाद है: “كُنْتُمْ خَيْرَ أُمَّةٍ أُخْرِجَتْ لِلنَّاسِ” (आल इमरान: 110) “तुम बेहतरीन उम्मत हो जो लोगों के लिए निकाली गई है।”
लिहाज़ा ज़रूरी है कि मुसलमान अपनी तहज़ीब, मुआमलात और तर्ज़-ए-हयात में असल इस्लामी इक़दार (मूल्यों) के अमीन बनें और ‘खैर-ए-उम्मत’ के मेआर (मानक) पर उतरें।
सिर्फ़ मस्जिद में नहीं, बल्कि बाज़ार, गली, स्कूल, मुआमलात व मुआशरत, मीडिया और तर्ज़-ए-गुफ़्तगू में उनसे इस्लाम झलके।
आज तशब्बोह एक फ़ैशन बन चुका है, लेकिन असल में यह फ़िक्री ग़ुलामी का शौक़ (जाल/तौक़) है, जिसे काटने के लिए तालीम, ख़ुदी, शऊर और फ़िक्री व दीनी तरबियत की ज़रूरत है।
मुसलमानों को चाहिए कि वे अपने रब की दी हुई शनाख़्त (पहचान) पर नाज़ करें, न कि दूसरों की तक़लीद (नकल) में अपनी असल गुम कर बैठें।
तशब्बोह का लुग़वी (शाब्दिक) माना:
التَّشَبُّهُ مَأْخُوذٌ مِنَ الْمُشَابَهَةِ، وَهِيَ الْمُمَاثَلَةُ وَالْمُحَاكَاةُ وَالتَّقْلِيدُ (الرسالة لناصر العقل)
तशब्बोह ‘मुशाबहत’ से माख़ूज़ (निकला हुआ) है, यानी मुमासि़लत (बराबरी), नक़्ल उतारना और तक़लीद करना।
اصطلاحي معني (इस्तलाही माना – तकनीकी अर्थ)
هُوَ تَمَثُّلُ الْمُسْلِمِ بِالْكُفَّارِ فِي عَقَائِدِهِمْ أَوْ عِبَادَاتِهِمْ أَوْ أَخْلَاقِهِمْ أَوْ فِيمَا يَخْتَصُّونَ بِهِ مِنْ عَادَاتٍ (التدابير الواقية)
अक़ाइद (धार्मिक विश्वास), इबादत, और मख़सूस (विशिष्ट) अख़्लाक़ व आदात में कुफ़्फ़ार की नक़्ल करना।
इमाम ज़हबी रहमतुल्लाह अलैहि फ़रमाते हैं:
لَا يَكُونُ التَّشَبُّهُ بِالْكُفَّارِ إِلَّا بِفِعْلِ مَا اخْتَصُّوا بِهِ مِنْ دِينِهِمْ أَوْ مِنْ عَادَاتِهِمْ (तशबीहुल ख़सीस बि-अहलिल ख़सीस लि-ज़हबी)
ममनूआ (वर्जित) तशब्बोह सिर्फ़ उसी सूरत में लाज़िम आता है, जब कोई मुसलमान, कुफ़्फ़ार के दीनी उमूर (धार्मिक मामलों) या उनकी मख़सूस आदतों और सिफ़तों को अपनाएगा।
दौर-ए-हाज़िर में पढ़े-लिखे लोग भी तशब्बोह को महज़ वज़अ-क़तअ (हूलिये) की तक़लीद (नकल) तक महदूद समझते हैं, जबकि इसका दायरा काफ़ी वसीअ (व्यापक) है।
फ़िक्री और अख़्लाक़ी तशब्बोह की अहमियत, ज़ाहिरी तशब्बोह से किसी दर्जा भी कम नहीं है। अक़ाइद-ओ-नज़रियात, अफ़कार-ओ-ख़्यालात, मुआमलात-ओ-मुआशरत और त्यौहारों व रस्मों में भी तशब्बोह की मुमानअत (मनाही) उसी तरह है जैसे दीगर ज़ाहिरी उमूर (मामलों) में।
तशब्बोह के वसीअ मफ़हूम (व्यापक अर्थ) की वज़ाहत के लिए इसकी कुछ मिसालें दर्ज-ज़ैल (नीचे दी गई) हैं।
▪ ऐतक़ादी उमूर में तशब्बोह ▪
अक़ाइद (धार्मिक विश्वास) में मुमासि़लत व मुशाबहत यानी ऐसे ख़्यालात रखना, जिनका तअल्लुक़ कुफ़्फ़ार के अक़ाइद से हो या वह इस्लाम के किसी बुनियादी अक़ीदे के ख़िलाफ़ हो।
जैसे यह कहना कि इंसान को उसके करतूत की सज़ा दुनिया ही में मिल जाती है। यह बात जिस तरह इस्लाम के अक़ीदा-ए-आख़िरत के ख़िलाफ़ है, हिंदुओं के अक़ीदा-ए-आवागौन (पुनर्जन्म) से मुशाबहत रखती है।
किसी के आमाल की पूरी जज़ा (प्रतिफल) या सज़ा दुनिया में मिलना मुमकिन ही नहीं है। मिसाल के तौर पर, जो शख़्स कई लोगों का क़ातिल हो, क्या उसे सज़ा के तौर पर मुतअद्दिद (कई) बार क़त्ल किया जा सकता है? ज़ाहिर है दुनिया में ऐसा नहीं हो सकता, फिर तो किसी ऐसी अदालत का होना नागुज़ीर (अनिवार्य) है, जहाँ उसे उसके जुर्म की मुकम्मल सज़ा मिल सके, और यह सिर्फ़ अल्लाह तआला की अदालत है।
▪ अफ़कार-ओ-ख़्यालात में तशब्बोह ▪
यहूद-ओ-नसारा और मुशरिकीन जैसी सोच रखना। मसलन कोई शख़्स किसी को नस्ली बुनियाद पर आला-ओ-अरफ़ा (श्रेष्ठ) और किसी को कमतर समझे यानी वह इंसानों में नस्ली बुनियाद पर ऊँच-नीच का क़ायल हो।
इस तरह का ख़्याल यहूद-ओ-नसारा का है, वह लोग ख़ुद को नस्ली तौर पर आला-ओ-अरफ़ा समझते हैं और दूसरों को कमतर।
अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाते हैं:
وَقَالَتِ الْيَهُودُ وَالنَّصَارَىٰ نَحْنُ أَبْنَاءُ اللَّهِ وَأَحِبَّاؤُهُ ۚ قُلْ فَلِمَ يُعَذِّبُكُم بِذُنُوبِكُم ۖ بَلْ أَنتُم بَشَرٌ مِّمَّنْ خَلَقَ (अल-माइदा: 18)
“और यहूदियों और ईसाइयों ने कहा: हम अल्लाह तआला के बेटे और उसके प्यारे हैं। आप कहिए (अगर ऐसा है तो) फिर वह तुम्हें, तुम्हारे गुनाहों पर अज़ाब क्यों देते हैं? बल्कि तुम (भी) अल्लाह तआला की मख़्लूक़ में से (आम) आदमी हो।”
इसलिए अगर कोई मुसलमान यह समझता हो कि मुसलमानों की बाज़ बिरादरियाँ बाज़ दूसरी बिरादरियों से आला-ओ-अरफ़ा हैं, तो वह मुसलमान, फ़िक्री तौर पर यहूद-ओ-नसारा और भारतीय ब्राह्मणों के मुशाबेह (समान) है।
▪ अख़्लाक़-ओ-मुआशरत में तशब्बोह ▪
अख़्लाक़-ओ-मुआशरत में तशब्बोह की सूरत यह होगी कि कोई शख़्स ग़ैर-मुस्लिमों की मख़सूस (विशिष्ट) आदात व सिफ़ात को अपनाए।
अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाते हैं:
وَلَا تَكُونُوا كَالَّذِينَ خَرَجُوا مِن دِيَارِهِم بَطَرًا وَرِئَاءَ النَّاسِ وَيَصُدُّونَ عَن سَبِيلِ اللَّهِ ۚ وَاللَّهُ بِمَا يَعْمَلُونَ مُحِيطٌ (अल-अनफ़ाल: 47)
“और उन लोगों की तरह न हो जाना जो अपने घरों से इतराते हुए, लोगों को दिखाने के लिए निकलते हैं और वह अल्लाह तआला की राह से रोकते हैं और उनके सारे काम अल्लाह तआला के क़ाबू में हैं।”
इतराना, दिखावा करना और अल्लाह तआला की राह से लोगों को रोकना। यहाँ तीन बातों का ज़िक्र हुआ है, अव्वल-उल-ज़िक्र (पहले बताई गई) दोनों बातें तो वाज़ेह (स्पष्ट) हैं मगर तीसरी बात यानी अल्लाह तआला के रास्ते से रोकने का क्या मतलब है?
इमाम तबरी रहमतुल्लाह अलैहि फ़रमाते हैं:
وَيَصُدُّونَ عَن سَبِيلِ اللَّهِ يَقُولُ: وَيَمْنَعُونَ النَّاسَ عَن دِينِ اللَّهِ وَالدُّخُولِ فِي الْإِسْلَامِ (तफ़सीर-ए-तबरी)
अल्लाह तआला की राह से रोकने का मतलब, अल्लाह तआला के दीन में दाख़िल होने से रोकना है।
बर-ए-सग़ीर (भारतीय उपमहाद्वीप) में अल्लाह तआला के दीन से रोकने के कई नए तरीक़े भी रायज (प्रचलित) हैं।
क़ुरआन करीम को समझकर पढ़ने से रोकना, इसके ख़िलाफ़ मुहिम चलाना, ज़हन-साज़ी करना मसलन यह कहना कि क़ुरआन करीम समझना सिर्फ़ उलमा की ज़िम्मेदारी है… दरअस्ल इमला बदलकर (यानी समझाने की जगह समझना रखकर) मुसलमानों को धोखा देने की कोशिश की गई है।
और बाज़ कहते हैं कि क़ुरआन करीम समझने के लिए 14 या 24 उलम (विद्याओं) में महारत होनी ज़रूरी है, वग़ैरा-वग़ैरा।
इस तरह का ख़्याल क़ुरआन करीम के मक़सद-ए-नुज़ूल (अवतरण के उद्देश्य) की नफ़ी (खंडन) करता है। अल्लाह तआला ने क़ुरआन करीम के नाज़िल करने का मक़सद यह बताया है कि इसे समझा जाए, इसमें ग़ौर-ओ-तदब्बुर (चिंतन-मनन) किया जाए।
इरशाद है:
كِتَابٌ أَنزَلْنَاهُ إِلَيْكَ مُبَارَكٌ لِّيَدَّبَّرُوا آيَاتِهِ وَلِيَتَذَكَّرَ أُولُو الْأَلْبَابِ (ص: 29)
“(यह क़ुरआन करीम) मुबारक किताब है जो हमने तुम्हारी तरफ़ नाज़िल की है, ताकि लोग इसकी आयतों में ग़ौर-ओ-फ़िक्र करें और अक़्लमंद इससे नसीहत हासिल करें।”
और हुदल्लिन्नास (هُدًى لِّلنَّاسِ), लितुबय्यिना लिन्नास (لِتُبَيِّنَ لِلنَّاسِ) जैसे अल्फ़ाज़ मुतअद्दिद (कई) बार क़ुरआन करीम में आए हुए हैं, जिसमें इसके आम लोगों के लिए हिदायत होने का तज़किरा है।
नीज़ (साथ ही) यह कि क़ुरआन करीम का नुज़ूल, अरब के उम्मियों (निरक्षरों) और अनपढ़ों के दरम्यान हुआ था, फिर भी उनकी समझ में आया।
और आज भी आलमी सतह (वैश्विक स्तर) पर ग़ैर-मुस्लिमीन में इस्लाम की तरफ़ रग़बत (झुकाव) की बुनियाद क़ुरआन करीम है। वह इसे पहले पढ़ते और समझते हैं, फिर इस्लाम की हक़्क़ानियत को तस्लीम करके हल्क़ा-बगोश-ए-इस्लाम (इस्लाम के दायरे में शामिल) हो जाते हैं।
▪ बिरादराना असबियत ▪
भारत में बिरादरान-ए-वतन (देशवासियों) को इस्लाम से दूर रखने में बिरादराना असबियत (भाईचारे की कट्टरता/पक्षपात) का अहम किरदार है।
यहाँ की अकसरियती आबादी (बहुसंख्यक आबादी), जो सदियों से दबी-कुचली और पसमांदा (पिछड़ी) है, और अरसे से इज़्ज़त-ए-नफ़्स (आत्म-सम्मान) की बाज़याबी की जद्दोजहद में लगी हुई है, मगर मुसलमानों के दरम्यान जारी बिरादराना असबियत और ऊँच-नीच की कशमकश ने उनके सामने इस्लाम की शबीह (छवि) ‘ब्राह्मणवाद’ जैसी बना रखी है।
लिहाज़ा, अगर कोई शख़्स मुसलमानों के दरम्यान रायज (प्रचलित) बिरादराना असबियत और ऊँच-नीच की वजह से इस्लाम से दूर है, तो उसकी ईमान से महरूमी के ज़िम्मेदार वह लोग भी होंगे, जो इस ब्राह्मणी सोच के हामिल (धारक) हैं।
इसी तरह बद-अहदी करना, बेवफ़ाई करना, वादा करके मुकर जाना भी ग़ैर-मुस्लिमों की सिफ़ात हैं। अगर कोई मुसलमान इस तरह की ग़ैर-अख़लाक़ी हरकतों में मुलव्विस (लिप्त) है, तो वह कुफ़्फ़ार की अख़लाक़ियात को अपनाने का मुर्तकिब (दोषी) है।
अल्लाह सुब्हानहू व तआला इरशाद फ़रमाते हैं:
وَلَا تَكُونُوا كَالَّذِينَ قَالُوا سَمِعْنَا وَهُمْ لَا يَسْمَعُونَ (अल-अनफ़ाल: 21)
“और उन लोगों की तरह मत हो जाना जो बात मानने का इक़रार करने के बाद, उसे अनसुनी कर देते हैं।” यानी अपने वादे से मुकर जाते हैं।
▪ तहज़ीब-ओ-रिवायत में तशब्बोह ▪
यानी ग़ैर-मुस्लिमों की मख़सूस (विशिष्ट) आदात, तहज़ीब और रिवायत को अपनाना। जैसे जहेज़ का मुतालबा (मांग) करना, लड़कियों को मीरास (विरासत) से महरूम रखना वग़ैरा।
अल्लाह तआला ने विरासत की तफ़्सील बयान करने के बाद इरशाद फ़रमाया:
وَمَنْ يَعْصِ اللَّهَ وَرَسُولَهُ وَيَتَعَدَّ حُدُودَهُ يُدْخِلْهُ نَارًا خَالِدًا فِيهَا وَلَهُ عَذَابٌ مُهِينٌ (अन्-निसा: 14)
“और जो (तक़सीम-ए-मीरास में) अल्लाह और उसके रसूल की नाफ़रमानी करेगा और उसकी हुदूद (सीमाओं) से तजावुज़ (उल्लंघन) करेगा, अल्लाह तआला उसको दोज़ख़ में दाख़िल करेंगे, जिसमें वह हमेशा रहेगा और उसके लिए ज़िल्लत-आमेज़ अज़ाब है।”
भारत के मुसलमानों में आम तौर पर लड़कियों (बहनों) को मीरास (विरासत) से महरूम रखने का रिवाज है, यह भी एक हिंदू रिवायत के ज़ेर-ए-असर (प्रभाव में) है।
हिंदुओं के यहाँ लड़कियों के ‘कन्यादान’ करने की रस्म है जिसके बाद, मायके से उनके सारे हुक़ूक़ ख़त्म हो जाते हैं; शादी के बाद उनका रिश्ता महज़ अख़लाक़ी (नैतिक) रह जाता है।
इसी तरह बाज़ मुसलमान भी, वालिदैन की जायदाद में बहनों का हक़ नहीं देते हैं; कुछ तो उनकी विरासत के एवज़ (बदले) ही अख़लाक़ का मुज़ाहिरा फ़रमाते हैं। लड़कियों को विरासत के हक़ से महरूम रखना, दरअस्ल हिंदुओं की मज़हबी रिवायत की नक़्क़ाली है।
मगर हैरत इस बात पर है कि क़ुरआन करीम की सख़्त तन्बीह (चेतावनी) और वईद (सज़ा की धमकी) के बावजूद लड़कियों को उनके हक़-ए-विरासत से महरूम रखा जाता है, यह किस क़दर जुर्अत की बात है?
▪ अमली तशब्बोह ▪
मुसलमानों के दरम्यान ग्रुप-बंदी करना, ख़ुद को बरहक़ और जन्नती तसव्वुर करना और दूसरों को गुमराह समझना भी यहूद-ओ-नसारा का शेवा (तरीका) रहा है।
अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाते हैं:
وَقَالَتِ الْيَهُودُ لَيْسَتِ النَّصَارَىٰ عَلَىٰ شَيْءٍ وَقَالَتِ النَّصَارَىٰ لَيْسَتِ الْيَهُودُ عَلَىٰ شَيْءٍ وَهُمْ يَتْلُونَ الْكِتَابَ ۗ كَذَٰلِكَ قَالَ الَّذِينَ لَا يَعْلَمُونَ مِثْلَ قَوْلِهِمْ ۚ فَاللَّهُ يَحْكُمُ بَيْنَهُمْ يَوْمَ الْقِيَامَةِ فِيمَا كَانُوا فِيهِ يَخْتَلِفُونَ (अल-बक़रह: 113)
“और यहूदी कहते हैं कि नसरानी (ईसाई) सही रास्ते पर नहीं और नसरानी बोलते हैं कि यहूदी सही रास्ते पर नहीं हैं, हालाँकि वे दोनों किताब पढ़ते हैं। इसी तरह जाहिलों ने भी उनकी सी बात कही। अल्लाह तआला क़यामत के दिन उनके माबैन (बीच) फ़ैसला करेंगे जिस बात में वे झगड़ रहे हैं।”
बर-ए-सग़ीर के मुसलमानों में मौजूद कुछ जमातें, बाज़ फ़रूरी (गौण) इख़्तिलाफ़ात की बुनियाद पर एक दूसरे को गुमराह समझती हैं, जबकि इन सबकी बुनियाद क़ुरआन-ओ-सुन्नत है, और सभी इनको मानने का दावा भी करते हैं।
ऐसे मुसलमान, फ़िक्री व अमली तौर पर उन बनी इसराईल की तरह हैं, जिनका ज़िक्र अल्लाह तआला ने इस आयत में फ़रमाया है।
नीज़ यह कि बनी इसराईल ने जिस तरह अल्लाह तआला की किताब के होते हुए, दूसरी किताबों को मस्तर-ए-हिदायत (मार्गदर्शन का स्रोत) बना लिया था; इसी तरह अगर कोई मुसलमान यह समझता है कि क़ुरआन करीम का मुतबादिल या नेमल-बदल (विकल्प) दूसरी किताबें भी हैं, जो उसकी हिदायत के लिए काफ़ी हैं, और अब उन्हें क़ुरआन करीम की ज़रूरत नहीं है, तो वह भी यहूद-ओ-नसारा के साथ तशब्बोह का मुर्तकिब (दोषी) है।
अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाते हैं:
وَلَا تَكُونُوا كَالَّذِينَ تَفَرَّقُوا وَاخْتَلَفُوا مِن بَعْدِ مَا جَاءَهُمُ الْبَيِّنَاتُ ۚ وَأُولَٰئِكَ لَهُمْ عَذَابٌ عَظِيمٌ (आल इमरान: 105)
“उन लोगों की तरह मत हो जाना जो अल्लाह तआला की वाज़ेह (स्पष्ट) आयात के नाज़िल होने के बाद फ़िरक़ों में तक़सीम (विभाजित) होकर इख़्तिलाफ़ात (मतभेदों) में पड़ गए, उन लोगों के लिए बड़ा अज़ाब है।”
फ़िरक़ों में पड़ना और अल्लाह तआला की किताब को छोड़कर दूसरी किताबों को सरचश्मा-ए-हिदायत (मार्गदर्शन का स्रोत) समझना, बनी इसराईल का शेवा (तरीका/स्वभाव) रहा है।
सूरी तशब्बोह (ज़ाहिरी मुशाबहत)
वज़अ-क़तअ और शक्ल-ओ-शबाहत ऐसी बना लेना कि ग़ैर-मुस्लिम होने का शाइबा (संदेह/अंदेशा) होने लगे, यह सूरी तशब्बोह है।
अल्लाह के रसूल ﷺ ने ग़ैर-मुस्लिमों की वज़अ-ओ-क़तअ और शबाहत बनाने से मना फ़रमाया।
हज़रत अब्दुल्लाह बिन अम्र बिन अल-आस रज़ियल्लाहु अन्हु रिवायत करते हैं कि:
हज़रत अब्दुल्लाह बिन अम्र बिन अल-आस रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है, उन्होंने कहा:
رَأَى رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ عَلَيَّ ثَوْبَيْنِ مُعَصْفَرَيْنِ
فَقَالَ: إِنَّ هَذِهِ مِنْ ثِيَابِ الْكُفَّارِ فَلَا تَلْبَسْهَا
(मुस्लिम)
“नबी करीम ﷺ ने मुझे दो ज़ाफ़रानी (गहरे पीले/नारंगी) रंग के कपड़ों में देखा, तो फ़रमाया: यक़ीनन यह कुफ़्फ़ार के लिबास में से है, तुम इसे मत पहनो।”
आपने इरशाद फ़रमाया:
“यह कुफ़्फ़ार का लिबास है, इसे मत पहनो।”
गोया, साधुओं, पादरियों, रब्बियों जैसा लिबास पहनना और क्रॉस लगाना इस्लाम में ममनू (वर्जित) है।
सवाल पैदा होता है कि नबी करीम ﷺ ने बाज़ जुज़्वी उमूर (आंशिक मामलों) में भी यहूद-ओ-नसारा और मुशरिकीन की मुख़ालफ़त का हुक्म दिया है, जिससे उनकी ऐसी मुशाबहत नहीं होती कि शनाख़्त (पहचान) मुश्किल हो।
मसलन आप ﷺ ने इरशाद फ़रमाया:
(1) غَيِّرُوا الشَّيْبَ وَلَا تَشَبَّهُوا بِالْيَهُودِ [नसई] “बुढ़ापे (सफेद बालों) को तब्दील करो और यहूद की मुशाबहत मत अपनाओ।” यानी बालों को रंगीन (खिजाब) बनाओ।
(2) إِنَّ الْيَهُودَ وَالنَّصَارَى لَا يَصْبُغُونَ فَخَالِفُوهُمْ [बुखारी, मुस्लिम] “यहूद-ओ-नसारा (अपने बालों को) रंगीन नहीं करते हैं, तुम उनकी मुख़ालफ़त करो यानी (बालों को) रंगीन करो।”
क़ाल अल-इमाम अन-नववी रहमतुल्लाह अलैहि (قال الإمام النووي رحمه الله):
وَمَذْهَبُنَا اسْتِحْبَابُ خِضَابِ الشَّيْبِ لِلرَّجُلِ وَالْمَرْأَةِ بِصُفْرَةٍ أَوْ حُمْرَةٍ
इमाम नववी रहमतुल्लाह अलैहि फ़रमाते हैं: “मर्दों और औरतों दोनों के लिए सफ़ेद बालों को पीले या लाल खिज़ाब से रंगना मुस्तहब (पसंदीदा) है।”
(3) خَالِفُوا الْيَهُودَ وَالنَّصَارَىٰ فَإِنَّهُمْ لَا يُصَلُّونَ فِي نِعَالِهِمْ وَلَا خِفَافِهِمْ (सुनन अबू दाऊद)
“यहूद-ओ-नसारा की मुख़ालफ़त करो (यानी जूतों और मौज़ों में नमाज़ पढ़ो), क्योंकि वे अपने जूतों और ख़फ़्फ़ैन (चमड़े के मौज़ों) में नमाज़ नहीं पढ़ते।”
जबकि अल्लाह के रसूल ﷺ नंगे पाँव और जूते पहनकर, दोनों हालतों में नमाज़ अदा करते थे।
हज़रत अम्र बिन शुऐब अपने वालिद और वह अपने दादा से रिवायत करते हैं कि उन्होंने कहा: मैंने रसूलुल्लाह ﷺ को नंगे पाँव और जूते पहने हुए, दोनों हालतों में नमाज़ पढ़ते देखा। (अहमद, अबू दाऊद, इब्न माजा)
अल्लामा इब्न तैमिया रहमतुल्लाह अलैहि इस हदीस की वज़ाहत करते हुए कहते हैं: فَفِي هَذَا بَيَانُ أَنَّ صَلَاتَهُمْ فِي نِعَالِهِمْ، وَأَنَّ ذَلِكَ كَانَ يُفْعَلُ فِي الْمَسْجِدِ إِذَا لَمْ يَكُنْ يُوطَأُ بِهِمَا عَلَى مَفَارِشَ (अल-फ़तवा अल-कुबरा) नमाज़ जूते पहनकर हो जाएगी बशर्ते कि जूते साफ़-शफ़्फ़ाफ़ हों और उससे फ़र्श आलूदा (गंदा) न हो। यानी मौजूद ज़माने में नंगे पाँव ही पढ़ना चाहिए।
इस तरह की मुख़ालफ़त के अहकाम को उलमा-ए-किराम ने महज़ इस्तेहबाब (पसंदीदा होने) के दर्जे में रखा है। ज़ाहिर है कि अगर इस तरह की मुख़ालफ़त महज़ इस्तेहबाबी है, तो यह “मन तशब्बहा बि-क़ौमिन फ़हुवा मिन्हुम” (जो जिसकी नक़ल करेगा वह उन्हीं में से है) के दायरे में नहीं आएगी।
नीज़ तशब्बोह के अहकाम का तअल्लुक़ उन ममालिक (देशों) और रियासतों से है, जहाँ इस्लाम ग़ालिब आ चुका हो। चुनाँचे इस तरह के सारे इर्शादात मदीना से तअल्लुक़ रखते हैं। और इन इर्शादात से जहाँ आप ﷺ के पेश-ए-नज़र एक मुम्ताज़ व ग़ालिब उम्मत की तशकील (गठन) थी, वहीं पर यह (तशब्बोह बिल-कुफ़्फ़ार की मुख़ालफ़त) जंगी ज़रूरत भी थी। तलवारों के ज़माने में अस्ना-ए-जंग (युद्ध के दौरान) दोस्त व दुश्मन की शनाख़्त एक बड़ा मसला था।
अल्लामा इब्न तैमिया रहमतुल्लाह अलैहि फ़रमाते हैं: إِنَّ الْمُخَالَفَةَ لَهُمْ لَا تَكُونُ إِلَّا مَعَ ظُهُورِ الدِّينِ وَعُلُوِّهِ كَالْجِهَادِ وَإِلْزَامِهِمْ بِالْجِزْيَةِ وَالصَّغَارِ فَلَمَّا كَانَ الْمُسْلِمُونَ فِي أَوَّلِ الْأَمْرِ ضُعَفَاءَ لَمْ تُشْرَعِ الْمُخَالَفَةُ لَهُمْ فَلَمَّا كَمَلَ الدِّينُ وَظَهَرَ وَعَلَا شُرِعَ ذَلِكَ (इक़्तिज़ा-उस्-सिरातुल मुस्तक़ीम)
काफ़िरों की मुशाबहत की मुख़ालफ़त उस वक़्त वाजिब और ज़रूरी क़रार दी गई, जब इस्लाम को ग़लबा हासिल हो गया। और इब्तिदाई दौर में जब मुसलमान कमज़ोर थे, उस वक़्त तशब्बोह की खुली मुख़ालफ़त का हुक्म नहीं दिया गया। फिर जब दीन मुकम्मल हुआ और पूरी तरह ग़ालिब आ गया तो मुख़ालफ़त का बाक़ायदा हुक्म दिया गया।
इसलिए मुसलमानों को ज़ाहिरी और इम्तियाज़ी शनाख़्त (पहचान) बनाने और तशब्बोह बिल-कुफ़्फ़ार की मुख़ालफ़त का हुक्म उस जगह है जहाँ इस्लाम ग़ालिब हो, मगर जहाँ मुसलमान कमज़ोर हैं वहाँ हिकमत के पेश-ए-नज़र इस तरह के ज़ाहिरी तशब्बोह में कोई हरज नहीं है।
अलबत्ता ग़ैर-मुस्लिमों के अक़ाइद, इबादात, शआर (प्रतीक) और मज़हबी उमूर में तशब्बोह कहीं भी दुरुस्त नहीं है।
वल्लाहु तआला आलम व इल्मुहू अतम्म व अहकम।





