दुनिया के मुहज़्ज़ब (सभ्य) मुआशरों और तमाम आसमानी मज़ाहिब की समाजी तालीमात का ख़ुलासा, अगर एक लफ़्ज़ में बयान किया जाए तो वह है: इन्सानियत।
और इन्सानियत की बुनियाद, दो अज़ीम उसूलों पर उस्तवार (टिकी) होती है:
▪️ मसावात (समानता)
▪️ एहतराम-ए-इन्सानियत (मानवता का सम्मान)
यह वह सुनहरे उसूल हैं जो मुआशरे को अमन-ओ-सुकून, अदल-ओ-इन्साफ़ और ख़ुशी-ओ-मसर्रत का गहवारा बना सकते हैं।
अगर इन्सानों के दरमियान से तफ़रीक़ (भेदभाव), तअस्सुब (पक्षपात), नस्ली व तबक़ाती भेद-भाव, और इस्तहसाल (शोषण) का ख़ात्मा…
मक़सूद है तो उनके लिए मसावात व एहतराम-ए-इन्सानियत बुनियादी अनासिर (तत्व) हैं।
नबी करीम ﷺ ने जब इन्सानी समाज में इस्लामी नक़ूश (निशान) सब्त (अंकित) करने का आग़ाज़ फ़रमाया, उस वक़्त दुनिया ज़ुल्म, जेहालत, तबक़ाती तक़्सीम (वर्ग विभाजन), और नस्ली तफ़ाख़ुर (जातीय अहंकार) में डूबी हुई थी।
इस पुर-आशूब (अशांत) दौर में इन्सानों का एक तबक़ा ख़ुद को सुपीरियर और नस्ली तौर पर फ़ाइक़ (श्रेष्ठ) और बाक़ी इन्सानों को रज़ील व कमतर तसव्वुर करता था।
और इसके, नस्ली बरतरी के इस तसव्वुर की वजह से इन्सानियत पर ज़ुल्म व नाइन्साफ़ी का एक मुहीब (डरावना) व ला-मुतनाही (अनंत) सिलसिला जारी था।
इसी वक़्त अरब के रेगज़ारों में इस्लाम की…
यह आवाज़ गूँजी:
يَا أَيُّهَا النَّاسُ إِنَّا خَلَقْنَاكُم مِّن ذَكَرٍ وَأُنثَىٰ وَجَعَلْنَاكُمْ شُعُوبًا وَقَبَائِلَ لِتَعَارَفُوا، إِنَّ أَكْرَمَكُمْ عِندَ اللَّهِ أَتْقَاكُمْ (अल-हुजुरात: 13)
“ऐ लोगो! हमने तुम्हें एक मर्द और एक औरत से पैदा किया और तुम में क़ौम और क़बीले इसलिए बनाए ताकि तुम एक दूसरे को पहचानो। बेशक अल्लाह तआला के नज़दीक सबसे ज़्यादा इज़्ज़त वाला वह है जो तुम में सबसे ज़्यादा परहेज़गार है।”
यह एलान दर असल एक रब्बानी एलामिया (ईश्वरीय घोषणापत्र) था कि इंसानों के ख़ालिक़ की निगाह में रंग, नस्ल, ज़बान, वतन, माल-ओ-दौलत की बुनियाद पर कोई बरतरी (श्रेष्ठता) नहीं, फ़ज़ीलत का मेआर (मानक) तक़वा और नेकी है।
रआया (प्रजा) हो या हुक्मराँ, काला हो या गोरा, अजमी हो या अरबी—मालिक हक़ीक़ी की नज़र में सब बराबर हैं।
नबी करीम ﷺ ने इसका एलान हुज्जतुल विदा के मौक़े पर, इन अल्फ़ाज़ में किया:
يَا أَيُّهَا النَّاسُ إِنَّ رَبَّكُمْ وَاحِدٌ أَلَا لَا فَضْلَ لِعَرَبِيٍّ عَلَى عَجَمِيٍّ وَلَا لِعَجَمِيٍّ عَلَى عَرَبِيٍّ وَلَا لِأَحْمَرَ عَلَى أَسْوَدَ وَلَا لِأَسْوَدَ عَلَى أَحْمَرَ إِلَّا بِالتَّقْوَى إِنَّ أَكْرَمَكُمْ عِنْدَ اللَّهِ أَتْقَاكُمْ (शुअबुल ईमान लिल-बैहक़ी)
“ऐ लोगो! तुम सबका रब एक है। किसी अरबी को अजमी पर, या किसी अजमी को अरबी पर, और किसी गोरे को काले पर, और काले को गोरे पर कोई फ़ज़ीलत (श्रेष्ठता) नहीं, बरतरी का मेआर सिर्फ़ तक़वा है। तुम में सबसे ज़्यादा मुअज़्ज़ज़ (सम्मानित) वह है जिसमें सबसे ज़्यादा तक़वा हो।”
मसावात व एहतराम: लाज़िम व मल्सूम
मसावात उस वक़्त तक अपनी असल हालत में जल्वा-गर नहीं हो सकती जब तक इन्सानियत की इज़्ज़त, समाज का लाज़मी हिस्सा न बन जाए।
इंसान चाहे किसी भी मज़हब, नस्ल या नज़रिया से ताल्लुक़ रखता हो, बहैसियत-ए-इन्सान, उसका एहतराम फ़र्ज़ है। क़ुरआन करीम ने एक आम इंसान की जान की हुरमत को पूरी इन्सानियत की जान के बराबर क़रार दिया।
इरशाद फ़रमाया:
مَنْ قَتَلَ نَفْسًا بِغَيْرِ نَفْسٍ أَوْ فَسَادٍ فِي الْأَرْضِ فَكَأَنَّمَا قَتَلَ النَّاسَ جَمِيعًا، وَمَنْ أَحْيَاهَا فَكَأَنَّمَا أَحْيَا النَّاسَ جَمِيعًا (अल-माइदा: 32)
“जिसने किसी को… नाहक़ क़त्ल किया गोया उसने पूरी इंसानियत का ख़ून किया। और जिसने किसी की ज़िंदगी बचाई, गोया उसने पूरी इंसानियत को बचाया।”
इस्लाम ने बिना तफ़रीक़ (भेदभाव) मज़हब-ओ-मिल्लत—बीमार, कमज़ोर, यतीम, फ़क़ीर, बच्चे और बूढ़े—सभी के हुक़ूक़ (अधिकार) बयान फ़रमाए हैं।
एक मौक़े पर:
مَرَّتْ بِهِ جَنَازَةٌ، فَقَامَ لَهَا النَّبِيُّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ، فَقِيلَ: إِنَّهَا يَهُودِيَّةٌ، فَقَالَ: أَلَيْسَتْ نَفْسًا؟ (बुख़ारी)
नबी करीम ﷺ ने एक जनाज़े को गुज़रते देखा, आप ﷺ खड़े हो गए। सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम ने अर्ज़ किया: “या रसूल अल्लाह! यह तो यहूदी का जनाज़ा था।”
आप ﷺ ने फ़रमाया: “क्या वह इंसान न था?”
नबी करीम ﷺ के इस सवाल से वाज़ेह (स्पष्ट) होता है कि इंसानियत की इज़्ज़त किसी मज़हब या शनाख़्त (पहचान) की मोहताज नहीं, वह फ़ितरी (प्राकृतिक) तौर पर क़ाबिल-ए-एहतराम है।
मौजूदा मुआशरा और हम
आज का इंसान, बज़ाहिर तरक़्क़ी-याफ़्ता सोसाइटी में जी रहा है, लेकिन नस्ली इम्तियाज़ (भेदभाव), मज़हबी तअस्सुब (कट्टरता), माशी (आर्थिक) नाइन्साफ़ी और समाजी इस्तहसाल (शोषण) इसमें बदस्तूर क़ायम है।
कहीं कालों को कमतर समझा जा रहा है, कहीं अक़ल्लियतों (अल्पसंख्यकों) को दबाया जा रहा है, कहीं औरतों को इज़्ज़त व सुकून के हक़ से महरूम किया जा रहा है और कहीं जात-बिरादरी की बुनियाद पर इन्सानों को हक़ीर व कमतर समझा जा रहा है। बल्कि हैरत इस पर है कि दुनिया के बाज़ हिस्सों में इस नाइन्साफ़ी को नेकी का दर्जा हासिल है।
ऐसे हालात में इस्लाम का मसावात पर मबनी (आधारित) निज़ाम-ए-हयात ही दुनिया को असल अमन व अदल दे सकता है। जहाँ इंसान को सिर्फ़ “इंसान” होने की बिना पर इज़्ज़त हासिल होती है।
इस्लाम में मसावात व एहतराम-ए-इन्सानियत के नारे सिर्फ़ नज़रियाती (सैद्धांतिक) नहीं बल्कि अमली हैं। कोई भी मुआशरा जब तक इन उसूलों को अमली तौर पर इख़्तियार नहीं करेगा, अमन, अदल और भाईचारे का ख़्वाब अधूरा रहेगा।
निश्चित रूप से, आपके इस पैराग्राफ का देवनागरी रूप यहाँ है:
हमें चाहिए कि हम दीन-ए-इस्लाम के इन रोशन उसूलों को अपनाएँ, मुआशरे में हर इंसान को इज़्ज़त दें, और इन्साफ़ को आम करें। यही कामयाबी का रास्ता है, यही इन्सानियत की मेराज (शिखर) है।
कारोबार और पेशे, हैसियत का पैमाना नहीं
रहा मामला पेशों का, इस्लाम में पेशे कभी भी इज़्ज़त व ज़िल्लत का मेआर (मानक) नहीं रहे हैं और न ही पेशों की बुनियाद पर कभी जात-बिरादरी का तअय्युन (निर्धारण) या तक़्सीम (विभाजन) हुई है।
कोई भी पेशा, अगर वह जायज़ व हलाल और सच्चाई व दयानतदारी पर मबनी (आधारित) है तो मुअज़्ज़ज़ (सम्मानित) है, ख़्वाह वह छोटा हो या बड़ा।
अल्लाह सुब्हानहु व तआला ने क़ुरआन करीम में दस्तकारी (शिल्प कौशल) की हौसला-अफ़ज़ाई फ़रमाई है।
चुनाँचे इरशाद है:
وَعَلَّمْنَاهُ صَنْعَةَ لَبُوسٍ لَّكُمْ لِتُحْصِنَكُم مِّن بَأْسِكُمْ ۖ فَهَلْ أَنتُمْ شَاكِرُونَ (الانبیاء: 80)
“और हमने दाऊद (अलैहिस्सलाम) को जिरह (कवच) बनाने की सनअत (हुनर) सिखाया था ताकि तुम जंगों में अपनी हिफ़ाज़त कर सको, तो क्या तुम शुक्रगुज़ार हो?”
सहीह बुख़ारी में है:
عَنِ الْمِقْدَامِ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ عَن رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ: مَا أَكَلَ أَحَدٌ طَعَامًا قَطُّ خَيْرًا مِنْ أَنْ يَأْكُلَ مِنْ عَمَلِ يَدِهِ وَإِنَّ نَبِيَّ اللَّهِ دَاوُدَ عَلَيْهِ السَّلَامُ كَانَ يَأْكُلُ مِنْ عَمَلِ يَدِهِ
नबी करीम ﷺ ने फ़रमाया कि किसी के लिए भी उसके हाथ की कमाई के खाने से बेहतर कोई खाना नहीं है। और यह कि अल्लाह तआला के नबी दाऊद अलैहिस्सलाम अपने हाथ की कमाई खाते थे।
इसी तरह आप ﷺ ने इरशाद फ़रमाया:
كَانَ زَكَرِيَّا نَجَّارًا
“ज़करिया अलैहिस्सलाम बढ़ई (Carpenter) थे।” (मुस्लिम, मुसनद अहमद, इब्ने माजह)
हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु बयान करते हैं कि आँहज़ूर ﷺ ने फ़रमाया:
مَا بَعَثَ اللَّهُ نَبِيًّا إِلَّا رَعَى الْغَنَمَ، فَقَالَ أَصْحَابُهُ وَأَنْتَ؟ فَقَالَ: نَعَمْ، كُنْتُ أَرْعَاهَا عَلَىٰ قَرَارِيطَ لِأَهْلِ مَكَّةَ (बुख़ारी)
“हर नबी ने क़ब्ल-अज़-बेअसत (नबुव्वत से पहले) बकरियाँ चराई हैं।”
सहाबा-ए-किराम रिज़वानुल्लाहि अलैहिम ने अर्ज़ किया कि: “या रसूल अल्लाह, आपने भी?”
आप ﷺ ने फ़रमाया: “हाँ, चंद क़ीरात के मुआवज़े (पारिश्रमिक) पर मैं, मक्के वालों की बकरियाँ चराया करता था।”
हज़रत आदम अलैहिस्सलाम खेती-बाड़ी, हज़रत इदरीस अलैहिस्सलाम दर्ज़ी का काम और हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम बकरियाँ चराने का काम करते थे।
हमारे नबी हज़रत मुहम्मद ﷺ ने भी तिजारत (व्यापार) का पेशा इख़्तियार फ़रमाया था।
पेशा कोई भी हो अगर हलाल व जायज़ है तो मुअज़्ज़ज़ (सम्मानित) है। पेशा की बुनियाद पर कोई अज़ीज़ (बड़ा) या रज़ील (छोटा) नहीं होता।
रहा मामला जात व बिरादरी का, तो इस्लाम में इसका कभी कोई तसव्वुर नहीं रहा है—न ख़ानदान की बुनियाद पर और न ही पेशे की बुनियाद पर।
(अरबों) में क़बीला व ख़ानदान का निज़ाम रायज (प्रचलित) था जैसे बनू हाशिम, बनू उमैया, बनू इसराइल वग़ैरा।
एक ही ख़ानदान में मुख़्तलिफ़ (विभिन्न) पेशे हुआ करते थे। बसा-औक़ात वालिद का पेशा कुछ और औलाद का पेशा कुछ हुआ करता था। और पेशों की तरफ़ निस्बत (जुड़ाव) में किसी तरह का कोई आर (शर्म) नहीं समझा जाता था।
तारीख़ शाहिद (गवाह) है कि बहुत से अकाबिर उलमा, किसी न किसी पेशे से अपनी वाबस्तगी (संबंध) ज़ाहिर करते नज़र आते हैं।
- इमाम ग़ज़ाली रहमतुल्लाह अलैहि अपने नाम के साथ ‘ग़ज़ाली’ (जुलाहा) लगाते थे, उनका आबाई (पैतृक) पेशा सूत कातना था।
- साहिब-ए-जरह-ओ-तादील अल्लामा शम्सुद्दीन ज़हबी रहमतुल्लाह अलैहि सोनार थे, ‘ज़हबी’ का मतलब सोनार होता है।
- इमाम मुस्लिम कपड़े की तिजारत करते थे, फ़र्रा लिखते हैं: وَ كَانَ رَحِمَهُ اللهُ بَزَّازًا
मशहूर हनफ़ी फ़क़ीह अबू बक्र बिन अली हद्दाद यमनी ख़ुद को आबाई पेशे से मंसूब (जोड़ते) करते हुए ‘हद्दाद’ (लोहार) लिखते थे, जबकि आपका सिलसिला-ए-नसब (वंश) हज़रत अली व फ़ातिमा रज़ियल्लाहु तआला अन्हुमा से मिलता है।
इसी तरह इमाम अबू बक्र जस्सास राजी रहमतुल्लाह अलैहि का आबाई पेशा दीवार पर चूने की रंगाई करना था, इसी वजह से उन्हें ‘जस्सास’ कहा जाता है।
الجَصَّاص: نسبة إلى العمل بالجص وتبييض الجدران، وهو النورة البيضاء. وهذا قد يدل على اشتغاله به. وقد يكون عمله هذا للارتزاق به وكسب معيشته من عمل يده
(याक़ूत अल-हमावी, मोअजमुल बुलदान)
सन् 80 में पैदा होने वाले क़ुरआन करीम के बड़े आलिम व क़ारी, जिनको सहाबा-ए-किराम रिज़वानुल्लाहि अलैहिम का ज़माना भी हासिल हुआ है, हमज़ा बिन हबीब ज़य्यात रहमतुल्लाह अलैहि, तेल का कारोबार करते थे। इसी वजह से उनके नाम के साथ ‘ज़य्यात’ (तेली) जुड़ा हुआ है।
كان يجلب الزيت من العراق إلى حُلْوان
ويجلب من حلوان الجوز والجبن إلى الكوفة
(मआरिफ़तुल क़ुर्रा)
और बहुत से अकाबिर उलमा, खुद के या आबाई पेशे को अपने नाम के साथ लगाने में कोई आर (शर्म) महसूस नहीं करते थे।
बाज़ अपने नाम के साथ क़ुदूरी (कुम्हार) और बाज़ दबबाग़ (चमड़ा रंगने वाला/मोची) वग़ैरा लगाते थे और इस निस्बत में उन्हें किसी तरह की कोई झिझक नहीं होती थी, क्योंकि मुसलमानों के यहाँ किसी पेशे या ख़ानदान की बुनियाद पर कभी किसी को हक़ीर (छोटा) नहीं समझा गया।
ईमान की दावत के बाद, नबी करीम ﷺ की सबसे ज़्यादा तवज्जो (ध्यान), दबी-कुचلی इंसानियत का वक़ार (गरिमा) बहाल करने और उनकी इज़्ज़त-ए-नफ़्स (आत्म-सम्मान) की बाज़-याफ़्त (पुनर्प्राप्ति) के लिए थी।
मगर!
आदा-ए-इस्लाम (इस्लाम के दुश्मनों) ने जिस तरह इस्लामी निज़ाम-ए-अदल व अमन को बदनाम करने के लिए ख़ुद-साख़्ता (स्व-निर्मित) दहशतगर्दी को इस्लाम से जोड़ा, उसी तरह इस्लाम के तसव्वुर-ए-मसावात व एहतराम-ए-इन्सानियत को मुतज़लज़ल (अस्थिर) करने और इस्लाम की इमेज ख़राब करने की साज़िशें करते रहे हैं। यह अलग बात है कि उनकी इन साज़िशों में हमारे कुछ लोगों का भी तआवुन (सहयोग) शामिल है।
भला किसी फ़ैमिली में पैदा होने से कोई रज़ील (नीच) हो सकता है? आख़िर इसमें पैदा होने वाले का क्या क़सूर है? किसी को पैदाइशी तौर पर हक़ीर (छोटा) समझने का हक़ कहाँ से मिलता है?
अल्लाह तआला ने अपने हर बंदे को इंसान होने की हैसियत से क़ाबिल-ए-एहतराम बनाया है।
وَلَقَدْ كَرَّمْنَا بَنِي آدَمَ (अल-इसरा: 70)
“और हमने औलाद-ए-आदम को क़ाबिल-ए-एहतराम बनाया है।”
यह अलग बात है कि मुआशरे (समाज) में फ़ज़ीलत (श्रेष्ठता) का मेआर (मानक) अच्छा अख़्लाक़ (आचरण), इन्सानियत की ख़िदमत और हुस्न-ए-सुलूक (अच्छा व्यवहार) है। जो जिस क़दर ख़िदमत-ए-ख़ल्क़ (लोक सेवा) करता है उसे उसी क़दर इज़्ज़त मिलती है।
और अपने इस अमल में कौन कितना मुख़लिस (ईमानदार) है यानी किसमें कितना तक़वा व परहेज़गारी है? इसका फ़ैसला दुनिया में होना मुश्किल है। टेक्नोलॉजी के इस जदीद (आधुनिक) दौर में भी अभी तक इसका कोई थर्मामीटर ईजाद नहीं हो सका है जिससे तक़वे की कमी-बेशी का अंदाज़ा लगाया जा सके।
अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाते हैं:
هُوَ أَعْلَمُ بِكُمْ إِذْ أَنْشَأَكُمْ مِنَ الْأَرْضِ وَإِذْ أَنْتُمْ أَجِنَّةٌ فِي بُطُونِ أُمَّهَاتِكُمْ ۖ فَلَا تُزَكُّوا أَنْفُسَكُمْ ۖ هُوَ أَعْلَمُ بِمَنِ اتَّقَىٰ (अन्-नज्म: 32)
“अल्लाह तआला तुमसे (तुम्हारे वजूद से पहले से ही) अच्छी तरह वाक़िफ़ हैं, जिस वक़्त उन्होंने तुम्हें मिट्टी से पैदा किया और जब तुम अपनी माओं के पेट में थे। इसलिए अपनी पारसाई मत ज़ाहिर करो, अल्लाह को अच्छी तरह मालूम है कि तुम में कौन मुत्तक़ी (परहेज़गार) है।”
अल्लामा ज़मख़्शरी और अल्लामा क़ुरतुबी रहमतुल्लाहि अलैहिमा लिखते हैं कि कुछ मुसलमान अपनी नमाज़, रोज़ा और हज का तज़किरा कर रहे थे, इसी मौक़े पर यह आयत नाज़िल हुई कि यह इबादतें मुत्तक़ी होने की दलील नहीं हैं।
तक़वा का तअल्लुक़ दिल की कैफ़ियत से है और इसका इल्म अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त को ज़्यादा है।
जब इबादतें, इंसान की बेहतरी व कमतरी का पैमाना नहीं हैं तो महज़ किसी ख़ानदान में पैदा हो जाना किसी की बेहतरी या कमतरी का पैमाना कैसे हो सकता है?
नबी करीम ﷺ इरशाद फ़रमाते हैं:
بِحَسْبِ امْرِئٍ مِنَ الشَّرِّ أَنْ يَحْقِرَ أَخَاهُ الْمُسْلِمَ، كُلُّ الْمُسْلِمِ عَلَى الْمُسْلِمِ حَرَامٌ، دَمُهُ، وَمَالُهُ، وَعِرْضُهُ [मुस्लिम]
“किसी आदमी के बुरे होने के लिए यही काफ़ी है कि वह अपने मुसलमान भाई को हक़ीर (छोटा) समझे। हर मुसलमान पर मुसलमान का ख़ून, माल और इज़्ज़त हराम है।”
इसलिए ख़ुदारा मुसलमानों में जात-बिरादरी को ऊँच-नीच और शराफ़त व रज़ालत (नीचता) की बुनियाद मत बनाइए, इसे सिर्फ़ तआरुफ़ (पहचान) तक ही महदूद रहने दीजिए।
और ख़बरदार! मुल्क के मौजूदा हालात में बिरादरियत की बुनियाद पर ऐसा कोई क़दम हरगिज़ मत उठाइए जिससे आपकी इस्लामी शनाख़्त (पहचान) मुतास्सिर (प्रभावित) हो।





