इस्लाम एक जामे (व्यापक) और आफ़ाक़ी (वैश्विक) दीन है, जो क़यामत तक आने वाली इंसानियत की तमाम रूहानी, अख़लाक़ी और समाजी ज़रूरतों पर मुहीत (व्याप्त) है।
इस दीन की असास (आधार) दो अज़ीम सरचश्मों (श्रोतों) पर उस्तवार (टिकी) होती है:
क़ुरआन करीम और अहादीस-ए-मुबारका।
क़ुरआन करीम ‘वही-ए-मतलू’ है, जिसके अल्फ़ाज़ व मआनी (शब्द और अर्थ) दोनों अल्लाह तआला की तरफ़ से नाज़िल शुदा हैं। और अहादीस, ‘वही-ए-ग़ैर-मतलू’ हैं—इनका मज़मून (विषय) अल्लाह तआला की तरफ़ से है, मगर अल्फ़ाज़ नबी करीम ﷺ के हैं।
अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:
وَمَا يَنطِقُ عَنِ الْهَوَى إِنْ هُوَ إِلَّا وَحْيٌ يُوحَى (अन्-नज्म: 3)
“नबी करीम ﷺ कोई बात अपनी तबीअत (इच्छा) से नहीं करते, सिर्फ़ वह बातें करते हैं जो उनकी तरफ़ नाज़िल की जाती हैं।”
इसीलिए नबी करीम ﷺ की इताअत (आज्ञाकारी) दरअसल अल्लाह तआला की इताअत है।
इरशाद है:
مَن يُطِعِ الرَّسُولَ فَقَدْ أَطَاعَ اللَّهَ (अन्-निसा: 80)
“जिसने रसूल की इताअत की, उसने अल्लाह तआला की इताअत की।”
एक और आयत से इस मज़मून की ताईद (पुष्टि) होती है।
अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:
وَمَا آتَاكُمُ الرَّسُولُ فَخُذُوهُ وَمَا نَهَاكُمْ عَنْهُ فَانتَهُوا (अल-हश्र: 7)
“जो कुछ रसूल तुम्हें दें उसे ले लो और जिस से रोक दें उस से बाज़ आ जाओ।”
यह सभी आयात इस बात की वाज़ेह (स्पष्ट) दलीलें हैं कि क़ुरआन करीम और सुनन-ए-मुबारका दोनों ही शरीयत के मसादिर (स्रोत) हैं। क़ुरआन करीम उसूल (सिद्धांत) और इजमाल (संक्षेप) बयान करता है, जबकि सुन्नत उसकी तफ़सील (विस्तार) और अमली ताबीर (व्यावहारिक व्याख्या) फ़राहम करती है।
नबी करीम ﷺ ने इसकी मजीद (और अधिक) वज़ाहत फ़रमाई:
आप ﷺ का इरशाद है:
أَلَا إِنِّي أُوتِيتُ الْكِتَابَ وَمِثْلَهُ مَعَهُ، أَلَا يُوشِكُ رَجُلٌ شَبْعَانُ عَلَى أَرِيكَتِهِ يَقُولُ: عَلَيْكُمْ بِهَذَا الْقُرْآنِ، فَمَا وَجَدْتُمْ فِيهِ مِنْ حَلَالٍ فَأَحِلُّوهُ، وَمَا وَجَدْتُمْ فِيهِ مِنْ حَرَامٍ فَحَرِّमُوهُ، أَلَا وَإِنَّ مَا حَرَّمَ رَسُولُ اللَّهِ ﷺ مِثْلُ مَا حَرَّمَ اللَّهُ (अबू दाऊद)
“खबरदार! मुझे क़ुरआन करीम के साथ उस जैसी एक और चीज़ भी अता की गई है यानी सुन्नत।
अनक़रीब एक शख़्स शिकम-सैर (पेट भरा हुआ) अपनी मसनद (सोफ़े) पर बैठकर कहेगा: तुम इस क़ुरआन को लाज़िम पकड़ो, जो चीज़ इसमें हलाल पाओ उसे हलाल समझो, और जो चीज़ इसमें हराम पाओ उसे हराम समझो।
सुन लो! जो चीज़ रसूलुल्लाह ﷺ ने हराम की है वह भी ऐसी ही है जैसी अल्लाह तआला ने हराम की है।”
नीज़ (साथ ही) फ़रमाया:
تَرَكْتُ فِيكُمْ أَمْرَيْنِ لَنْ تَضِلُّوا مَا تَمَسَّكْتُمْ بِهِمَا: كِتَابَ اللَّهِ وَسُنَّتِي (मुअत्ता इमाम मालिक)
“मैं तुम में दो चीज़ें छोड़े जा रहा हूँ, जब तक इनको मज़बूती से थामे रहोगे, कभी गुमराह न होगे: अल्लाह तआला की किताब और मेरी सुन्नत।”
अहादीस की इस क़दर वाज़ेह (स्पष्ट) अहमियत के बावजूद कैसे मुमकिन था कि सहाबा इकराम रिज़वानुल्लाही अलैहिमु अजमईन इसकी तरफ़ तवज्जो न देते।
चुनाँचे सहाबा इकराम रज़ियल्लाहु अन्हुम ने अहादीस को महफ़ूज़ करने के लिए ग़ैर-मामूली मेहनतें कीं।
हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं:
مَا مِنْ أَصْحَابِ النَّبِيِّ ﷺ أَحَدٌ أَكْثَرُ حَدِيثًا عَنْهُ مِنِّي إِلَّا مَا كَانَ مِنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عَمْرٍو، فَإِنَّهُ كَانَ يَكْتُبُ وَلَا أَكْتُبُ. (बुख़ारी)
“नबी करीम ﷺ के सहाबा में से कोई मुझ से ज़्यादा हदीस रिवायत करने वाला नहीं, सिवाय अब्दुल्लाह बिन अमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा के, क्योंकि वह हदीसें लिखते थे और मैं नहीं लिखता था।”
सहाबा इकराम रिज़वानुल्लाही अलैहिमु अजमईन के बाद अइम्मा-ए-मुहद्दिसीन ने लाखों हदीसें जमा कीं और अस्मा-उर-रिजाल, जरह-ओ-तादील और उसूल-ए-हदीस जैसे अज़ीम उलूम (विज्ञान/शास्त्र) की बुनियाद रखी। यह उलूम हर दौर में अहादीस को क़िस्म-क़िस्म की जालसाज़ियों और तहरीर (मिलावट) से महफ़ूज़ रखने का ज़रिया बने।
लफ़्ज़ “हदीस” अरबी ज़बान में “बात, गुफ़्तगू और ख़बर” और ‘नया’ के मानी में इस्तेमाल होता है। क़ुरआन करीम में यह लफ़्ज़ कई जगह आया हुआ है, जैसे:
فَلْيَأْتُوا بِحَدِيثٍ مِثْلِهِ إِنْ كَانُوا صَادِقِينَ (अत-तूर: 34)
“वह इस जैसी कोई एक बात ले आएँ अगर सच्चे हैं।”
इस्तिलाह (परिभाषा) में:
नबी करीम ﷺ के अक़वाल (कथन), अफ़आल (कर्म/कार्य), तक़रीरात (मौन स्वीकृति) और औसाफ़ (गुणों) को हदीस कहा जाता है।
हदीस की कई क़िस्में हैं:
क़ौली हदीस:
नबी करीम ﷺ के वह अल्फ़ाज़ व कलमात जो आपने खुद इरशाद फ़रमाए हैं। मिसाल: “إِنَّمَا ٱلْأَعْمَالُ بِٱلنِّيَّاتِ” (बुख़ारी) “अमाल का दार-ओ-मदार नियतों पर है।”
फ़ेअली हदीस:
नबी करीम ﷺ के वह आमाल जो सहाबा इकराम रिज़वानुल्लाही अलैहिमु अजमईन ने ब-चश्म-ए-खुद (अपनी आँखों से) देखे और रिवायत किए। मिसाल: عَنْ أَنَسٍ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ قَالَ: “رَأَيْتُ رَسُولَ اللَّهِ ﷺ يَرْفَعُ يَدَيْهِ فِي الدُّعَاءِ” (बुख़ारी) हज़रत अनस रज़ियल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं: “मैंने देखा कि रसूलुल्लाह ﷺ दुआ करते वक़्त अपने हाथ उठाते हुए थे।”
तक़रीरी हदीस:
नबी करीम ﷺ के सामने किसी सहाबी ने कोई अमल किया, या किसी के अमल की ख़बर मिली और आप ﷺ ने उस पर ख़ामोशी इख़्तियार की या ताईद (समर्थन) फ़रमाई।
मिसाल: हज़रत सलमान फ़ारसी रज़ियल्लाहु अन्हु हज़रत अबू दरदा रज़ियल्लाहु अन्हु के घर तशरीफ़ ले गए और उन्हें कुछ नसीहतें कीं।
قَالَ سَلْمَانُ لَهُ ( لأبي الدرداء ) إِنَّ لِرَبِّكَ عَلَيْكَ حَقًّا وَلِنَفْسِكَ عَلَيْكَ حَقًّا وَلِأَهْلِكَ عَلَيْكَ حَقًّا فَأَعْطِ كُلَّ ذِي حَقٍّ حَقَّهُ فَأَتَى النَّبِيَّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فَذَكَرَ ذَلِكَ لَهُ فَقَالَ النَّبِيُّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ صَدَقَ سَلْمَانُ” (बुख़ारी)
और कहा: “बेशक तुम पर तुम्हारे रब का भी हक़ है। तुम्हारी जान और तुम्हारी अहलिया (पत्नी) का भी तुम पर हक़ है। लिहाज़ा तुम्हें सबके हक़ूक़ अदा करने चाहिए।” फिर हज़रत अबू दरदा रज़ियल्लाहु अन्हु नबी करीम ﷺ के पास आए और आपसे यह सारा मामला बयान किया तो आप ﷺ ने फ़रमाया: “सलमान ने सच कहा।”
सिफ़ाती हदीस:
नबी ﷺ के अख़लाक़ (आचरण), आदात (आदतें), और जिस्मानी औसाफ़ (शारीरिक विशेषताओं) से मुतअल्लिक़ (संबंधित) रिवायत।
मिसाल: عَنْ أَنَسِ بْنِ مَالِكٍ قَالَ: كَانَ رَسُولُ اللَّهِ ﷺ أَحْسَنَ النَّاسِ خُلُقًا (बुख़ारी, मुस्लिम)
हज़रत अनस बिन मालिक रज़ियल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं: “रसूलुल्लाह ﷺ सब लोगों में सबसे ज़्यादा अच्छे अख़लाक़ वाले थे।”
नबी करीम ﷺ बहैसियत मुअल्लिम व शारेह (शिक्षक और व्याख्याता):
अल्लाह तआला ने क़ुरआन करीम नाज़िल फ़रमाकर, इसकी तालीम व तशरीह और तबलीग़ (प्रचार) की ज़िम्मेदारी नबी करीम ﷺ पर आइद (सौंपना) फ़रमाई है।
इरशाद फ़रमाया:
وَأَنزَلْنَا إِلَيْكَ الذِّكْرَ لِتُبَيِّنَ لِلنَّاسِ مَا نُزِّلَ إِلَيْهِمْ وَلَعَلَّهُمْ يَتَفَكَّرُونَ
(अन्-नहल: 44)
“हमने आप (ﷺ) पर ज़िक्र (क़ुरआन करीम) नाज़िल किया ताकि आप उन आयात की वज़ाहत (स्पष्टीकरण) करें जो लोगों के लिए नाज़िल की गई हैं और ताकि वे इसमें ग़ौर-ओ-तदब्बुर (चिंतन-मनन) करें।”
क़ुरआन करीम एक उसूली किताब है, जो बुनियादी क़वानीन (कानूनों) और कुल्लियात (सामान्य सिद्धांतों) को बयान करती है। जैसे दुनिया में किसी भी क़ानूनी किताब में बुनियादी उसूल दर्ज होते हैं और फिर माहिरिन-ए-क़ानून उनकी तशरीह (व्याख्या) करते हैं, वैसे ही क़ुरआन करीम में दीन के असासी (मौलिक) अहकाम मज़कूर (वर्णित) हैं, उनकी वज़ाहत नबी करीम ﷺ ने अपने अक़वाल व अफ़आल के ज़रिए फ़रमा दी है।
नबी करीम ﷺ की अहादीस और सुन्नतें, दरअसल इन उसूलों की अमली तशरीह हैं, जो दीन को समझने और उस पर अमल करने के लिए नागुज़ीर (अनिवार्य) हैं।
अगर कोई शख़्स अहादीस को नज़रअंदाज़ करके सिर्फ़ क़ुरआन करीम पर अमल करने का दावा करे तो वह कई अहम अहकाम की दुरुस्त तफ़हीम (समझ) से क़ासिर (असमर्थ) रहेगा, क्योंकि बहुत से क़ुरआनी अहकाम इजमाली (संक्षिप्त) नौइयत के हैं, जिन्हें नबी करीम ﷺ की बयान कर्दा तफ़सीलात के बग़ैर समझना मुमकिन नहीं है।
मसलन (उदाहरण के लिए) इबादात के बुनियादी अहकाम क़ुरआन करीम में मौजूद हैं, लेकिन उनके अमली तरीक़े हमें नबी करीम ﷺ की अहादीस और सुन्नतों से मालूम होते हैं।
इसी तरह, ताज़ीरी क़वानीन (दंड संहिता) के उसूल क़ुरआन करीम में मौजूद हैं, लेकिन उनकी तफ़सीलात व शराइत (विवरण और शर्तें) जिनके तहत वे नाफ़िज़-उल-अमल (लागू) होंगे, उनके लिए अहादीस से रुजू (संपर्क) होना लाज़मी होगा।
गोया (मानो) क़ुरआन करीम को समझने के लिए अहादीस व सुनन का किरदार कलीदी (प्रमुख/चाबी जैसा) नौइयत का है। नबी करीम ﷺ का काम सिर्फ़ क़ुरआन करीम को लोगों तक पहुँचा देना नहीं था, बल्कि इसके मआनी (अर्थ), अहकाम और हिदायात की तशरीह व बयान भी था।
दीन-ए-इस्लाम को समझने और उस पर अमल के लिए इंसानियत को क़ुरआन करीम की जितनी वज़ाहत दरकार (आवश्यक) थी, आप ﷺ ने उसे पूरा फ़रमा दिया है।
आप ﷺ के बाद इसे बयान करने या इसकी रोशनी में मजीद (अधिक) तफ़्सीर-ओ-तावील (व्याख्या और विश्लेषण) की ज़िम्मेदारी उलमा-ए-उम्मत पर आइद होती है।
इरशाद-ए-नबवी है:
“إِنَّ الْعُلَمَاءَ وَرَثَةُ الْأَنْبِيَاءِ” (अबू दाऊद)
“उलमा-ए-किराम वारिसीन-ए-अम्बिया (नबियों के वारिस) हैं।”
और नबी करीम ﷺ की विरासत जो आख़िरी उम्मत के उलमा को मुंतक़िल (स्थानांतरित) हुई है, वह क़ुरआन व सुन्नत है।
क़ुरआन करीम में कई आयात व अहकाम मुख़्तसर (संक्षिप्त) और तशरीह तलब (व्याख्या के योग्य) हैं, जिन्हें समझने और उन पर अमल करने के लिए अहादीस की मदद नागुज़ीर (अनिवार्य) है। बिना अहादीस व सुनन के उन्हें समझ पाना न सिर्फ़ मुश्किल बल्कि नामुमकिन है।
मसाल (उदाहरण) के तौर पर: इबादात यानी नमाज़, ज़कात, रोज़ा और हज वग़ैरह के अहकाम।
अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:
أَقِيمُوا الصَّلَاةَ وَآتُوا الزَّكَاةَ
“नमाज़ क़ायम करो, ज़कात अदा करो।”
नमाज़ व ज़कात का ज़िक्र, क़ुरआन करीम में मुतअद्दिद (अनेक) बार आया है, मगर उसकी पूरी तफ़सील और तरीक़े क़ुरआन करीम में मज़कूर (वर्णित) नहीं हैं।
इसीलिए नबी करीम ﷺ ने इरशाद फ़रमाया:
صَلُّوا كَمَا رَأَيْتُمُونِي أُصَلِّي (बुख़ारी)
“नमाज़ इस तरह अदा करो जैसे तुम लोग मुझे अदा करते हुए देखते हो।”
इसी तरह ज़कात की असासियात मसलन अहमियत, फ़र्ज़ियत, मसारिफ़-ए-ज़कात (ज़कात के हकदार) नीज़ अदा न करने पर वईद (चेतावनी) वग़ैरह का तज़किरा क़ुरआन करीम में है मगर अमली तफ़सीलात वहाँ मौजूद नहीं हैं।
मसलन: अमवाल-ए-ज़कात (ज़कात वाले माल) का निसाब क्या होगा, किस माल पर कितनी ज़कात निकालनी है वग़ैरह-वग़ैरह।
इसी तरह हज के मुतअल्लिक़ इरशाद है:
وَلِلَّهِ عَلَى النَّاسِ حِجُّ الْبَيْتِ مَنِ اسْتَطَاعَ إِلَيْهِ سَبِيلًا (आल-ए-इमरान: 97)
“और अल्लाह तआला के लिए लोगों पर इस घर का हज फ़र्ज़ है, जो वहाँ तक पहुँचने की इस्तताअत (सामर्थ्य) रखता हो।”
हज के मसाइल (नियमों) का हाल भी कुछ इसी तरह है।
नबी करीम ﷺ इरशाद फ़रमाते हैं:
“خُذُوا عَنِّي مَنَاسِكَكُمْ” (मुस्लिम)
“मुझसे तुम हज करने के तरीक़े सीखो।”
रोज़ा का ज़िक्र सूरह बक़रह में क़दरे (काफ़ी) तफ़सील से मज़कूर है। मसलन: रोज़े की फ़र्ज़ियत, मुसाफ़िर व मरीज़ के लिए रुख़सतें (छूट), और रोज़े की रूहानी व जिस्मानी फ़वाइद व बरकात वग़ैरह।
अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:
يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا كُتِبَ عَلَيْكُمُ الصِّيَامُ كَمَا كُتِبَ عَلَى الَّذِينَ مِنْ قَبْلِكُمْ لَعَلَّكُمْ تَتَّقُونَ (अल-बक़रह: 183)
“ऐ ईमान वालो! तुम पर रोज़े फ़र्ज़ किए गए हैं जैसे तुम से पहले लोगों पर फ़र्ज़ किए गए थे, ताकि तुम परहेज़गार बन जाओ।”
इसमें आख़िरी उम्मत की हौसला अफ़ज़ाई के लिए साबिक़ा (पिछली) उम्मतों पर रोज़ा की फ़र्ज़ियत, रमज़ान की रातों में खाने-पीने की इजाज़त और दिन में रोज़ा रखने के अहकाम का ज़िक्र है।
अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:
كُلُوا وَاشْرَبُوا حَتَّىٰ يَتَبَيَّنَ لَكُمُ الْخَيْطُ الْأَبْيَضُ مِنَ الْخَيْطِ الْأَسْوَدِ مِنَ الْفَجْرِ ثُمَّ أَتِمُّوا الصِّيَامَ إِلَى اللَّيْلِ (अल-बक़रह: 187)
“और खाओ पियो यहाँ तक कि सुबह की सफ़ेद धारी (रोशनी) सियाह धारी (रात) से वाज़ेह (स्पष्ट) हो जाए, फिर रोज़ा (सुबह-ए-सादिक़ से) रात तक पूरा करो।”
इस आयत में मज़कूर “सफ़ेद धारी और सियाह धारी” दोनों अल्फ़ाज़ तशरीह तलब (व्याख्या के योग्य) हैं।
हज़रत अदी बिन हातिम रज़ियल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं कि:
لَمَّا نَزَلَتْ هَذِهِ الْآيَةُ: (حَتَّى يَتَبَيَّنَ لَكُمُ الْخَيْطُ الْأَبْيَضُ مِنَ الْخَيْطِ الْأَسْوَدِ) عَمَدْتُ إِلَى عِقَالٍ أَبْيَضَ وَعِقَالٍ أَسْوَدَ، فَجَعَلْتُهُمَا تَحْتَ وِسَادَتِي، فَجَعَلْتُ أَنْظُرُ فِي اللَّيْلِ، فَلَا يَسْتَبِينُ لِي، فَغَدَوْتُ عَلَى رَسُولِ اللَّهِ ﷺ فَذَكَرْتُ ذَلِكَ لَهُ، فَقَالَ: إِنَّمَا ذَاكَ سَوَادُ اللَّيْلِ وَبَيَاضُ النَّهَارِ۔
“जब यह आयत (हत्ता यतबैयना लकुमुल खैतुल अबयज़ु मिनल खैतिल अस्वदि) नाज़िल हुई, तो मैंने एक सफ़ेद इक़ाल (रस्सी) और एक सियाह इक़ाल लिया और उन्हें अपने तकिए के नीचे रखा। मैं रात के वक़्त उनको देखता रहा, लेकिन मुझे कुछ समझ में न आया। तो सुबह नबी करीम ﷺ की ख़िदमत में हाज़िर हुआ और इस वाक़िए का ज़िक्र किया, तो आप ﷺ ने फ़रमाया: इससे मुराद रात की तारीकी और दिन की रोशनी है।” (बुख़ारी, मुस्लिम)
इन तमाम तर तफ़सीलात से “लतूबैयिना लिन्नासि मा नुज़िला इलैहिम” का मफ़हूम (अर्थ) अच्छी तरह वाज़ेह हो जाता है कि: क़ुरआन करीम दर हक़ीक़त उसूल की किताब है, इसमें क़ानून और कुल्लियात बयान हुई हैं, जिनकी ज़बानी व अमली तशरीह ज़रूरी है और इस तशरीह की ज़िम्मेदारी अल्लाह तआला ने अपने नबी हज़रत मुहम्मद ﷺ को सौंपी है।
नीज़ यह कि मुतज़किरा बाला (ऊपर ज़िक्र की गई) आयत, अहादीस-ए-मुबारका की हुज्जियत (Authority) की अहम तरीन दलील है।
अब जो लोग यह कहते हैं कि “सिर्फ़ क़ुरआन करीम हमारे लिए काफ़ी है”, उनकी यह बात कैसे दुरुस्त हो सकती है?
यह बात सौ फ़ीसद सच है कि क़ुरआन करीम किताब-ए-ईमान, किताब-ए-हिदायत, किताब-ए-अमल है। मगर इसे अच्छी तरह समझने के लिए मुअल्लिम-ए-हक़ीक़ी (वास्तविक शिक्षक) हज़रत रसूल-ए-करीम ﷺ की तशरीहात (व्याख्याएँ), बहरहाल दरकार (आवश्यक) हैं। और वह तशरीहात नबी करीम ﷺ के इर्शादात व आमाल हैं।
वाज़ेह रहे कि अगर कोई शख़्स अहादीस-ए-मुबारका को छोड़कर सिर्फ़ क़ुरआन करीम को मानने का दावा करे, तो वह क़ुरआन करीम की मुजमल (संक्षिप्त) आयात व अहकाम की तफ़सीलात कहाँ से लाएगा?
ऐसा शख़्स मुकम्मल तौर पर क़ुरआन करीम को भी नहीं मानता है। दरअसल वह:
أَفَتُؤْمِنُونَ بِبَعْضِ الْكِتَابِ وَتَكْفُرُونَ بِبَعْضٍ (बक़रह: 85)
“क्या तुम अल्लाह तआला की किताब के बाज़ (कुछ) हिस्से पर ईमान लाते हो और बाज़ का इंकार करते हो?” का मिस्दाक़ (उदाहरण) है।
क़ुरआन करीम में नबी करीम ﷺ की तफ़्सीर-ओ-तावील की इस अहम ज़िम्मेदारी का तज़किरा और भी कई मक़ामात पर है।
अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:
هُوَ الَّذِي بَعَثَ فِي الْأُمِّيِّينَ رَسُولًا مِّنْهُمْ يَتْلُو عَلَيْهِمْ آيَاتِهِ وَيُزَكِّيهِمْ وَيُعَلِّمُهُمُ الْكِتَابَ وَالْحِكْمَةَ وَإِن كَانُوا مِن قَبْلُ لَفِي ضَلَالٍ مُّبِينٍ (सूरतुल जुमुआ: 2)
“वही (अल्लाह तआला) हैं जिन्होंने उम्मियों में एक रसूल (मुहम्मद ﷺ) को भेजा जो उन्हीं में से हैं, वह उन पर अल्लाह तआला की आयात तिलावत करते हैं, उनका तज़किया (शुद्धिकरण) करते हैं, और उन्हें किताब व हिकमत की तालीम देते हैं हालाँकि वह लोग इस से पहले खुली गुमराही में थे।”
कुछ लोग क़ुरआन करीम में ग़ौर-ओ-तदब्बुर का मतलब ‘तफ़्सीर-बिर-राय’ (अपनी निजी राय से व्याख्या) समझते हैं, जबकि इस से मुराद क़ुरआन करीम की हक़्क़ानियत और अल्लाह तआला की क़ुदरत, तख़्लीक़ व कमालात वग़ैरह पर ग़ौर-ओ-तदब्बुर करना और अल्लाह तआला के बे-पायाँ (असीमित) एहसानात के बारे में सोचना है, ताकि बंदा अपने हक़ीक़ी मोहसिन का सच्चा एहसानमंद बन सके।
ग़ौर-ओ-तदब्बुर का मतलब यह नहीं है कि कोई शख़्स अपनी मर्ज़ी से क़ुरआन करीम की मन-मानी तफ़्सीर करने लगे। नबी करीम ﷺ ने ‘तफ़्सीर-बिर-राय’ करने वालों के लिए सख़्त वईद (चेतावनी) इरशाद फ़रमाई है।
इरशाद है:
مَنْ قَالَ فِي الْقُرْآنِ بِرَأْيِهِ فَأَصَابَ، فَقَدْ أَخْطَأَ۔ (अबू दाऊद, तिर्मिज़ी)
“जो शख़्स क़ुरआन करीम में कोई बात अपने ख़याल से करे, उसने बिल-फ़र्ज़ (मान लीजिए) दुरुस्त बात की तो भी उसने ग़लती की।” यानी उसे ऐसा करने की इजाज़त नहीं है।
एक दूसरी रिवायत में निहायत सख़्त वईद का ज़िक्र है।
नबी करीम ﷺ इरशाद फ़रमाते हैं:
مَنْ تَكَلَّمَ فِي الْقُرْآنِ بِغَيْرِ عِلْمٍ فَلْيَتَبَوَّأْ مَقْعَدَهُ مِنَ النَّارِ (तिर्मिज़ी)
“जो शख़्स बग़ैर इल्म के क़ुरआन करीम के बारे में बात करे, वह अपना ठिकाना जहन्नम की आग में बना ले।”
“जिसने क़ुरआन करीम में कोई बात बग़ैर इल्म (बिना सनद) की, उसे अपना ठिकाना जहन्नम बना लेना चाहिए।”
हाँ, अगर किसी को क़ुरआन करीम की ज़बान व अदब समझने में महारत हासिल हो और वह क़ुरआन करीम के अंदाज़-ए-बयान, उस्लूब-ए-गुफ़्तगू समझने में भी दस्तरस (पकड़) रखता हो, फिर उसे किसी आयत के कलमात से कोई नई बात समझ में आ जाए—बशर्ते कि वह बात क़ुरआन व सुन्नत की रूह से मुतसादिम (टकराव वाली) न हो, बल्कि उससे ताईद (समर्थन) मिलती हो—तो वह ‘तफ़्सीर-बिर-राय’ में शुमार न होगी।
इसलिए हदीस व सुन्नत को छोड़कर सिर्फ़ क़ुरआन करीम पर अमल करने का नज़रिया बे-बुनियाद और ग़लत है। और बिना हदीस व सुन्नत के क़ुरआन करीम के कई अहकाम पर अमल करना मुमकिन भी नहीं है।
मसलन: क़ुरआन करीम चोरी की हद बयान करता है।
अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:
السَّارِقُ وَالسَّارِقَةُ فَاقْطَعُوا أَيْدِيَهُمَا جَزَاءً بِمَا كَسَبَا نَكَالًا مِّنَ اللَّهِ وَاللَّهُ عَزِيزٌ حَكِيمٌ (अल-माइदा: 38)
“चोर मर्द हो या औरत, दोनों के हाथ काट दो, यह उनके किए का बदला है, अल्लाह तआला की तरफ़ से इबरतनाक सज़ा। और अल्लाह तआला ज़बर्दस्त, बड़ी हिकमत वाले हैं।”
यहाँ चंद बातें वज़ाहत तलब हैं।
- इस हुक्म का मुख़ातब (संबोधित) कौन है?
- क्या कोई आम शख़्स भी किसी चोर का हाथ काट सकता है या यह काम हुकूमत-ए-वक़्त और अदलिया (न्यायपालिका) के ज़िम्मे है?
- नीज़ हाथ कहाँ से काटा जाए—पूरा हाथ या हाथ का कुछ हिस्सा?
- और कितनी क़ीमत का माल चोरी करने पर यह सज़ा होगी?
- क्या कोई भूखा आदमी चंद रोटियाँ (ब्रेड वग़ैरह) चुरा ले तो उस पर भी हद जारी करने का हुक्म सादिर (लागू) होगा?
ज़ाहिर है यह सारी तफ़सीलात और हुदूद-ओ-ताज़ीरात का अमली खाका क़ुरआन करीम में मौजूद नहीं है, तो लाज़मन इस आयत पर अमल के लिए अहादीस की तरफ़ रुजू करना होगा कि नबी करीम ﷺ ने इस तरह की हुदूद जारी फ़रमाते हुए दर्ज बाला (उपरोक्त) बातों को किस तरह मल्हूज़-ए-अमल (ध्यान में) रखा था।
इसलिए क़ुरआन करीम को कमा-हक़्क़हु (जैसा कि उसका हक़ है) समझना और उस पर अमल करना, हदीस व सुन्नत के बग़ैर कैसे मुमकिन होगा?
इससे साबित होता है कि क़ुरआन करीम की तरह अहादीस-ए-मुबारका भी इस्लाम का बुनियादी माख़ज़ (स्रोत) हैं। इसीलिए नबी करीम ﷺ की इताअत को हिदायत और ईमान की अलामत (प्रतीक) क़रार दिया गया।
وَإِن تُطِيعُوهُ تَهْتَدُواْ (सूरतुल नूर: 54) “और अगर तुम उस (नबी) की इताअत करोगे तो हिदायत पाओगे।”
فَلَا وَرَبِّكَ لَا يُؤْمِنُونَ حَتَّىٰ يُحَكِّمُوكَ فِيمَا شَجَرَ بَيْنَهُمْ ثُمَّ لَا يَجِدُواْ فِيٓ أَنفُسِهِمْ حَرَجًا مِّمَّا قَضَيْتَ وَيُسَلِّمُواْ تَسْلِيمًا (सूरतुल निसा: 65) “पस (ऐ नबी!) तुम्हारे रब की क़सम! यह लोग मोमिन नहीं हो सकते जब तक कि यह अपने झगड़ों में तुम्हें हकम (न्यायाधीश) न बनाएँ और फिर जो कुछ तुम फ़ैसला करो, उस पर अपने दिल में कोई तंगी महसूस न करें और उसे मुकम्मल तौर पर तस्लीम (स्वीकार) कर लें।”
अबू दाऊद की एक रिवायत में खुलफ़ा-ए-राशुदीन के अमल को भी सुन्नत क़रार दिया गया।
नबी करीम ﷺ इरशाद फ़रमाते हैं:
عَلَيْكُمْ بِسُنَّتِي وَسُنَّةِ الْخُلَفَاءِ الرَّاشِدِينَ الْمَهْدِيِّينَ، تَمَسَّكُوا بِهَا وَعَضُّوا عَلَيْهَا بِالنَّوَاجِذِ (सुनन अबू दाऊद)
“तुम पर मेरी सुन्नत और मेरे हिदायत याफ़्ता (मार्गदर्शन प्राप्त) खुलफ़ा की सुन्नत पर अमल करना लाज़िम है, इसको मज़बूती से पकड़ लो और इस पर दाँत जमा लो (यानी इसे कड़ाई से थामे रखो)।”
एक ग़लतफ़हमी का अज़ाला (निराकरण)
बाज़ लोग कहते हैं कि अहादीस की तदवीन (संकलन) नबी करीम ﷺ से तक़रीबन दो सौ साल के बाद हुई, इसलिए उन पर कैसे एतमाद (विश्वास) किया जा सकता है?
यह सवाल कम-इल्मी पर मबनी (आधारित) है। नबी करीम ﷺ के ज़माने में ही अहादीस को ज़बानी याद करने और लिखकर रिकॉर्ड करने का सिलसिला शुरू हो गया था। कई सहाबा इकराम रिज़वानुल्लाही अलैहिमु अजमईन ने नबी करीम ﷺ की अहादीस को ज़बानी याद रखने के साथ-साथ तहरीरी (लिखित) सूरत में भी महफ़ूज़ किया था।
ज़ैल (नीचे) में चंद ऐसे मारूफ़ सहीफ़ों (तहरीरी मजमुओं) के नाम दिए जा रहे हैं जो सहाबा इकराम रज़ियल्लाहु अन्हुम ने मुरत्तब किए थे:
सहीफ़ा अली बिन अबी तालिब रज़ियल्लाहु अन्हु हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु का यह सहीफ़ा नबी करीम ﷺ के बराह-ए-रास्त (प्रत्यक्ष) इर्शादात पर मुश्तमिल (आधारित) था, जिसमें हुदूद, क़िसास, दियत और दीगर क़ानूनी अहकाम दर्ज थे। इसका ज़िक्र सहीह बुख़ारी और दीगर कुतुब (किताबों) में मिलता है। (आज भी किताबी शक्ल में मौजूद है।)
सहीफ़ा अब्दुल्लाह बिन अमर बिन अल-आस रज़ियल्लाहु अन्हुमा हज़रत अब्दुल्लाह बिन अमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा को नबी करीम ﷺ ने अहादीस लिखने की इजाज़त दी थी। उन्होंने “अस-सहीफ़तुल सादिक़ा” नामी मजमुआ (संग्रह) तैयार किया जिसमें तक़रीबन एक हज़ार अहादीस थीं। (आज भी यह किताबी शक्ल में दस्तयाब है।)
सहीफ़ा जाबिर बिन अब्दुल्लाह रज़ियल्लाहु अन्हुमा हज़रत जाबिर बिन अब्दुल्लाह अंसारी रज़ियल्लाहु अन्हुमा की मरवियात (रिवायतें) भी कसीर (बड़ी) तादाद में हैं। इमाम तहावी रहमतुल्लाह अलैहि उनके शागिर्दों का क़ौल लिखते हैं:
كُنَّا نَأْتِي جَابِرَ بْنَ عَبْدِ اللَّهِ لِنَسْأَلَهُ عَنْ سُنَنِ رَسُولِ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ تَعَالَىٰ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فَنَكْتُبَهَا (शरह मानी अल-आसार)
“हम लोग हज़रत जाबिर बिन अब्दुल्लाह रज़ियल्लाहु तआला अन्हुमा की ख़िदमत में हाज़िर होते ताकि हुज़ूर नबी करीम ﷺ की सुन्नतें मालूम करके क़लमबंद करें।”
इनके अलावा:
- सहीफ़ा हुमाम बिन मुनब्बेह: हुमाम बिन मुनब्बेह हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु के शागिर्द हैं। यह मजमुआ “अस-सहीफ़तुल सहीफ़ा” के नाम से जाना जाता है। यह 50 हिजरी में लिखा गया था जिसमें 138 हदीसें दर्ज हैं।
- सहीफ़ा साद बिन उबादा रज़ियल्लाहु अन्हु और सहीफ़ा समुरा बिन जुंदुब रज़ियल्लाहु अन्हु वग़ैरह भी अहादीस के मजमुए हैं जिन्हें सहाबा इकराम रिज़वानुल्लाही अलैहिमु अजमईन ने क़लमबंद किए थे।
यह इब्तिदाई (शुरुआती) तहरीरी मजमुए बाद के दौर में मसानिद, सुनन और सहाह जैसी हदीस की मशहूर किताबों की बुनियाद बने। और मुहद्दिसीन ने इन्हें हदीस की बड़ी कुतुब में शामिल कर दिया, जैसे सहीह बुख़ारी, सहीह मुस्लिम, सुनन अबी दाऊद वग़ैरह।
अल्लाह तआला हमें क़ुरआन करीम व अहादीस-ए-मुबारका की अहमियत समझने और इन पर अमल की तौफ़ीक़ अता फ़रमाएँ।
आमीन।





