ज़िंदगी ख़ुशी और ग़म, कामयाबी और नाकामी, उम्मीद और मायूसी का मजमुआ (संग्रह) है। बाज़ औक़ात हम अपनी मेहनत के बावजूद नताइज (परिणाम) वैसे नहीं पाते जैसे चाहते हैं, और कभी बग़ैर किसी तवक़्क़ो (उम्मीद) के नेमतें मिल जाती हैं। ऐसे में एक सच्चा मोमिन दिल से यक़ीन रखता है कि हर चीज़ अल्लाह तआला के हुक्म, इल्म और इरादे के मुताबिक़ होती है, चाहे वह हमारे लिए बज़ाहिर (ज़ाहिरी तौर पर) अच्छी हो या बुरी।
यही यक़ीन “तक़दीर पर ईमान” कहलाता है, जो ईमान के छह बुनियादी अरकान (स्तंभों) में से एक है।
तक़दीर पर ईमान रखना न सिर्फ़ इस्लामी अक़ीदा है, बल्कि एक अक़्ली (तार्किक) हक़ीक़त भी है। इंसान अपनी ज़िंदगी में बहुत से इरादे बनाता है, मंसूबा बंदी (प्लानिंग) करता है मगर हमेशा वही नहीं होता जो वह चाहता है।
ज़रा ग़ौर करें कि इंसान जो इब्तिदा (शुरुआत) में एक मामूली क़तरा होता है, मगर जब अल्लाह तआला की तख़्लीक़ी क़ुदरत उस पर जलवा-गर होती है तो वह एक जीता-जागता शाहकार (masterpiece) बन जाता है।
अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:
هُوَ الَّذِیْ یُصَوِّرُكُمْ فِی الْاَرْحَامِ كَیْفَ یَشَآءُؕ۔ لَاۤ اِلٰهَ اِلَّا هُوَ الْعَزِیْزُ الْحَكِیْمُ (आल इमरान: 6)
वह तुम्हें, रहम-ए-मादर (माँ के गर्भ) में जिस तरह चाहते हैं तख़्लीक़ (निर्माण) करते हैं। उनके सिवा कोई माबूद नहीं, वह ज़बरदस्त हिकमत वाले हैं।
एक मामूली नुत्फ़ा, जो पानी की एक बूंद से ज़्यादा कुछ नहीं, अल्लाह तआला के हुक्म से गोश्त-ओ-पोस्त का हसीन पैकर (शरीर) बन जाता है। उसकी आँखों में बीनाई (रोशनी), उसके दिल में ज़िंदगी की हरारत, उसके लबों पर मुस्कुराहट और उसके दिमाग़ में फ़िक्र-ओ-शऊर के चिराग़ रोशन हो जाते हैं।
इंसान अभी दुनिया में नहीं आया होता, मगर उसकी सूरत-गरी हो रही होती है। कहीं उसके हाथों की लकीरें बन रही होती हैं, तो कहीं उसकी आँखों का रंग मुतअय्यन (तय) हो रहा होता है। उसका क़द, उसकी जिस्मानी साख़्त (बनावट)…
उसकी ज़हानत, उसकी सलाहियतें (क्षमताएं), सब कुछ एक ग़ैर-मरई (अदृश्य) दस्तकारी के तहत तख़्लीक़ हो रही होती हैं।
यह कैसा हैरतअंगेज़ निज़ाम है कि माँ के पेट में पलने वाले एक नातवां (कमज़ोर) वजूद के हर पहलू को पहले से तय कर दिया गया है कि किसके चेहरे पर ख़ुशी की रौनक़ होगी और किसकी पेशानी पर ग़म-ओ-अंदोह (दुख-दर्द) की शिकनें।
मगर दोनों सूरतों में उसकी आज़माइश होती है कि वह सब्र-ओ-सबात और शुक्र-ओ-सिपास (कृतज्ञता) के साथ कब तक खड़ा रहता है?
यहाँ (كَيْفَ يَشَاءُ)—तुम्हारी सूरत-गरी “जिस तरह चाहता है” करता है—में जो वुसअत (विस्तार) और इख़्तियार का एलान है, वह इंसान को उसकी बेबसी का एहसास दिलाता है।
न कोई अपनी आँखों की रंगत बदल सकता है न अपनी पैदाइशी साख़्त (बनावट)। कोई खुद को तवील-उल-क़ामत (लंबा) नहीं बना सकता, न कोई अपनी जिल्द (त्वचा) की रंगत का फ़ैसला खुद कर सकता है, और न लड़का या लड़की बनने में किसी का कोई इख़्तियार है।
जो कुछ भी वह है, जैसा भी वह है, वह अल्लाह तआला की मशिय्यत (इच्छा) के ताबे (अधीन) है।
इसलिए अगर जिस्म में कोई कमी है तो अपने रब के फ़ैसले पर राज़ी रहते हुए सब्र करना चाहिए। और अगर खूबी है तो समझना चाहिए कि यह सब उसका अपना इंतख़ाब (चुनाव) नहीं, बल्कि अल्लाह तआला का अतिया (उपहार) है।
क्योंकि जो भी शक्ल-ओ-सूरत, जो भी सलाहियतें उसे अता की गई हैं, वह उसके लिए अल्लाह तआला का मुनासिब इंतख़ाब हैं और उसके लिए वही बेहतर हैं।
وَصَوَّرَكُمْ فَأَحْسَنَ صُوَرَكُمْ (अत-तग़ाबुन: 3)
“और उसने तुम्हारी सूरत बनाई, फिर उसे बेहतरीन बनाया।”
हर इंसान अल्लाह तआला की नज़र में मुकम्मल और खूबसूरत है, क्योंकि उसे उसी हिकमत के मुताबिक़ तख़्लीक़ (पैदा) किया गया है, जो उसके लिए सबसे बेहतर थी।
यह आयत महज़ एक हक़ीक़त नहीं, बल्कि एक पैग़ाम है, एक दर्स (सबक) है, एक ज़िंदगी गुज़ारने का उसूल है। इसमें अल्लाह तआला के इख़्तियार, उनकी मोहब्बत, और उनके फ़ैसले पर यक़ीन रखने का दर्स है।
इंसान को चाहिए कि वह खुद को किसी और के पैमाने पर न तोले, बल्कि यह समझे कि उसकी तख़्लीक़ (रचना) में जो कुछ भी है, वह बेहतरीन है।
अल्लाह तआला की तक़दीर में कभी भूल नहीं, उसकी सन्नत (कारीगरी) में कोई कमी नहीं, और उसके फ़ैसलों में कभी नाइंसाफ़ी नहीं।
जो कुछ भी हमें मिला, वह अल्लाह तआला की बेहतरीन मशिय्यत (इच्छा) के ताबे है। जिस्मानी निज़ाम का एक-एक हिस्सा मसलन: दिल की धड़कन, साँस लेने का अमल, डी.एन.ए. का प्रोग्राम, और दिमाग़ की कारकर्दगी (performance), सब एक मुक़र्ररा तक़दीर के तहत काम कर रहे हैं।
हम अपनी मर्जी से दिल की धड़कन को नहीं रोक सकते, न ही खुद से डी.एन.ए. का कोड तब्दील कर सकते हैं। यह सब अल्लाह तआला की तय करदा तक़दीर के मुताबिक़ चलते हैं।
इन्हें तक्वीनी उमूर (तक्वीनी मामले) कहा जाता है।
हम तक़दीर को इजमाली (मोटे) तौर पर दो बड़े दायरों में तक़सीम (विभाजित) कर सकते हैं:
- तक्वीनी उमूर
- तशरीई उमूर
तक्वीनी उमूर में इंसान का कोई इख़्तियार नहीं होता, मसलन: इंसान की पैदाइश, जिन्स (लिंग), रंग-ओ-नस्ल, सेहत-ओ-बीमारी, तकलीफ़-ओ-आराम, ज़िंदगी और मौत वग़ैरह।
ये सब अल्लाह तआला के क़तई (अंतिम) फ़ैसले हैं, जिन पर इंसान का न कोई इख़्तियार है और न ही इन पर उससे कोई मुआख़ज़ा (पूछताछ) होगा।
तशरीई उमूर
ये वो उमूर (मामले) हैं जो इंसान के इरादे, इख़्तियार और कोशिश से मुतअल्लिक़ (संबंधित) हैं, मसलन:
- हिदायत या गुमराही का रास्ता इख़्तियार करना।
- अच्छे या बुरे आमाल का इंतख़ाब (चुनाव)।
- अल्लाह तआला की इताअत (आज्ञाकारी) या नाफ़रमानी।
इन उमूर में अल्लाह तआला ने इंसान को अक़्ल, इरादा और इख़्तियार अता फ़रमाया है, इसीलिए इन पर इंसान से बाज़-पुर्स (पूछताछ) होगी।
गोया जहाँ इंसान मजबूर है वहाँ वह ज़िम्मेदार नहीं, और जहाँ उसे इख़्तियार दिया गया है, उसी से मुतअल्लिक़ उसकी जवाबदेही तय की गई है।
तक़दीर पर ईमान
इंसान अपनी ज़िंदगी में कई मर्तबा ऐसे हालात का सामना करता है जो उसके इख़्तियार में नहीं होते। जैसे: ग़ैर-मुतवक़्क़ो (अचानक/अनपेक्षित) हादसात और कामयाबी व नाकामी वग़ैरह।
अगर इंसान अपनी तक़दीर का मालिक होता, तो वह हमेशा अपने हक़ में बेहतर चीज़ों का इंतख़ाब (चुनाव) करता, लेकिन हक़ीक़त में ऐसा नहीं है।
रसूलुल्लाह ﷺ इरशाद फ़रमाते हैं:
“لَا يُؤْمِنُ عَبْدٌ حَتَّىٰ يُؤْمِنَ بِالْقَدَرِ، خَيْرِهِ وَشَرِّهِ.” (सहीह मुस्लिम)
“कोई शख़्स उस वक़्त तक मोमिन नहीं हो सकता जब तक वह तक़दीर पर ईमान न ले आए, चाहे वह खैर (भलाई) हो या शर (बुराई)।”
यह अक़ीदा इंसान को बे-यक़ीनी की कैफ़ियत से निकाल कर इत्मीनान की रोशनी अता करता है।
मसला-ए-तक़दीर को क़दरे तफ़सील (थोड़ी विस्तार) से समझने के लिए इसके चार बुनियादी अनासिर (तत्वों) को पेश-ए-नज़र रखना ज़रूरी है:
अल्लाह तआला का इल्म
अल्लाह तआला हर चीज़ को जानते हैं, जो कुछ हो चुका, जो हो रहा है, और जो होने वाला है। अल्लाह तआला का इल्म कामिल (पूर्ण) और बे-ऐब है।
अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:
أَلَمْ تَعْلَمْ أَنَّ اللَّهَ يَعْلَمُ مَا فِي السَّمَاءِ وَالْأَرْضِ؟ (अल-हज: 70)
“क्या तुम नहीं जानते कि अल्लाह तआला आसमान व ज़मीन की हर चीज़ को जानते हैं?”
وَعِندَهُ مَفَاتِحُ الْغَيْبِ لَا يَعْلَمُهَا إِلَّا هُوَ ۖ وَيَعْلَمُ مَا فِي الْبَرِّ وَالْبَحْرِ ۚ وَمَا تَسْقُطُ مِن وَرَقَةٍ إِلَّا يَعْلَمُهَا ۚ وَلَا حَبَّةٍ فِي ظُلُمَاتِ الْأَرْضِ وَلَا رَطْبٍ وَلَا يَابِسٍ إِلَّا فِي كِتَابٍ مُّبِينٍ (अल-अनआम: 59)
“और उन्हीं के पास ग़ैब की चाबियाँ हैं, उन्हें अल्लाह तआला के सिवा कोई नहीं जानता। और वह जानते हैं जो कुछ खुश्की और समंदर में है और कोई पत्ता नहीं गिरता मगर वह उसे जानते हैं और कोई दाना ज़मीन के अंधेरों में नहीं और न कोई तरी में और न खुश्की में, मगर वह सब कुछ एक वाज़ेह (स्पष्ट) किताब में (लिखा हुआ) है।”
सब कुछ लौह-ए-महफ़ूज़ में लिखा हुआ है।
أَلَمْ تَعْلَمْ أَنَّ اللَّهَ يَعْلَمُ مَا فِي السَّمَاءِ وَالْأَرْضِ ۗ إِنَّ ذَٰلِكَ فِي كِتَابٍ ۚ إِنَّ ذَٰلِكَ عَلَى اللَّهِ يَسِيرٌ (सूरह अल-हज: 70)
“क्या तुम नहीं जानते कि अल्लाह तआला आसमान व ज़मीन की हर चीज़ का इल्म रखते हैं? बेशक यह सब कुछ एक किताब में (लिखा हुआ) है, और बेशक यह अल्लाह तआला के लिए बिल्कुल आसान है।”
यह यक़ीन इंसान के दिल से बे-चैनी ख़त्म कर देता है क्योंकि वह जानता है कि उसकी ज़िंदगी का हर लम्हा मेरे रब और सबसे बड़े मोहसिन (भलाई करने वाले) के इल्म में है।
अल्लाह तआला की मशिय्यत
अल्लाह तआला की मर्जी के बग़ैर कोई चीज़ नहीं हो सकती। हर अमल, हर तब्दीली, हर फ़ैसला अल्लाह तआला की मशिय्यत (इच्छा) से मुमकिन होता है।
अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:
وَمَا هُم بِضَآرِّينَ بِهِ مِنْ أَحَدٍ إِلَّا بِإِذْنِ اللَّهِ (बक़रह: 102)
“और वे किसी को नुक़सान नहीं पहुँचा सकते, मगर अल्लाह तआला के इज़्न (ढील/अनुमति) से।”
قُل لَّن يُصِيبَنَآ إِلَّا مَا كَتَبَ ٱللَّهُ لَنَا (तौबा: 51)
“कह दो! हमें कोई नुक़सान नहीं पहुँच सकता मगर वही जो अल्लाह तआला ने हमारे हक़ में लिख दिया है।”
مَا أَصَابَ مِن مُّصِيبَةٍ فِي ٱلْأَرْضِ وَلَا فِيٓ أَنفُسِكُمْ إِلَّا فِي كِतَـٰبٍۢ مِّन قَبْلِ أَن نَّبْرَأَهَآ (हदीद: 22)
“ज़मीन में या तुम्हारी जानों पर जो मुसीबत आती है, वह एक किताब में लिखी जा चुकी है, इससे पहले कि हम उसे वुक़ूअ (अस्तित्व) में लाएँ।”
अल्लाह तआला की तख़्लीक़
अल्लाह तआला हर चीज़ के ख़ालिक़ (पैदा करने वाले) हैं, ख़्वाह (चाहे) वह हमारे आमाल हों या हमारी ज़िंदगी के हालात।
अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:
“إِنَّا كُلَّ شَيْءٍ خَلَقْنَاهُ بِقَدَرٍ” (क़मर: 49)
“बेशक हमने हर चीज़ को एक मुक़र्ररा तक़दीर के मुताबिक़ पैदा किया है।”
وَرَبُّكَ يَخْلُقُ مَا يَشَاءُ وَيَخْتَارُ (अल-क़सस: 68)
“और तेरा रब जो चाहता है पैदा करता है और (जिसे चाहता है) चुन लेता है।”
यह सवाल हमेशा से इंसानी ज़हन को मुतहैय्यर (हैरान) किए हुए है कि क्या इंसान मजबूर है?
अगर उसकी क़िस्मत का हर हर्फ़ पहले ही लौह-ए-तक़दीर पर रक़म (लिखा) हो चुका है, अगर उसके फ़ैसले किसी अन-देखे क़लम से तहरीर कर दिए गए हैं, तो फिर जज़ा-ओ-सज़ा का फ़लसफ़ा क्यों? अगर वह अपनी राहों का खुद मेमार (बनाने वाला) नहीं, तो फिर उसके अच्छे और बुरे आमाल का हिसाब क्यों?
यही वह नुक़्ता है जहाँ तक़दीर और इख़्तियार के दरमियान नाज़ुक तवाज़ुन (संतुलन) को समझना लाज़िम हो जाता है।
इस तवाज़ुन को समझने के लिए ज़रूरी है कि हम दुनियावी ज़िंदगी के मक़सद से वाक़िफ़ हों। याद रखें कि यह दुनिया आज़माइश की जगह है जहाँ हर फ़र्द को ख़ैर-ओ-शर (भलाई और बुराई) के दरमियान चुनाव का इख़्तियार दिया गया है।
अल्लाह तआला का इल्म हर चीज़ पर हावी है, मगर यह इल्म इंसान की राह में क़ैद-ओ-ज़ंजीर नहीं बनता। कामयाब वही है जो अपनी तक़दीर को तदबीर, दुआ और नेक आमाल के ज़रिए सँवारने की कोशिश करता है।
नबी करीम ﷺ इरशाद फ़रमाते हैं:
“لَا يَرُدُّ الْقَدَرَ إِلَّا الدُّعَاءُ” (सुनन तिर्मिज़ी)
“तक़दीर को सिवाय दुआ के कुछ नहीं बदल सकता।”
यह हदीस इस हक़ीक़त को वाज़ेह (स्पष्ट) करती है कि दुआ वह हाथ है जो तक़दीर के दरीचों पर दस्तक देता है। यह वह रोशनी है जो लिखी हुई सतरों (lines) में नया रंग भर देती है। दुआ महज़ अल्फ़ाज़ नहीं, बल्कि बंदे का अपने रब से वह तअल्लुक़ (रिश्ता) है जो लिखी हुई खुश्क क़िस्मत को भी नमी अता कर सकता है।
एक अहम वज़ाहत (स्पष्टीकरण)
अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:
وَلَـكِن يُضِلُّ مَن يَشَاءُ وَيَهْدِي مَن يَشَاءُ وَلَتُسْأَلُنَّ عَمَّا كُنتُمْ تَعْمَلُونَ (अन-नहल: 93)
“अल्लाह तआला जिसे चाहें गुमराह कर दें और जिसे चाहें हिदायत अता करें। और ज़रूर बर-ज़रूर तुम सबसे तुम्हारे आमाल की बाज़-पुर्स (पूछताछ) होगी।”
इस आयत को समझने के लिए यह जानना ज़रूरी है कि अल्लाह तआला की मशिय्यत (चाहना) उसके अपने बनाए हुए उसूलों के तहत काम करती है। अल्लाह तआला ने हिदायत और गुमराही के लिए कुछ पैमाने मुक़र्रर कर रखे हैं।
आयत-ए-करीमा का पहला हिस्सा:
يُضِلُّ مَن يَشَاءُ
“अल्लाह तआला जिसे चाहते हैं गुमराह करते हैं”—इसकी तशरीह (व्याख्या) क़ुरआन करीम ने खुद ही कर दी है कि अल्लाह तआला किन लोगों को गुमराह करते हैं और गुमराह करने का मतलब क्या है?
इरशाद है:
وَمَا يُضِلُّ بِهِ إِلَّا الْفَاسِقِينَ (अल-बक़रह: 26)
“और वह इस (मिसाल) से सिर्फ़ फ़ासिक़ों (नाफ़रमानों) ही को गुमराही में रहने देते हैं।”
وَيُضِلُّ اللَّهُ الظَّالِمِينَ ۚ وَيَفْعَلُ اللَّهُ مَا يَشَاءُ (इब्राहिम: 27)
“और अल्लाह तआला ज़ालिमों को गुमराही में छोड़ देते हैं, और अल्लाह तआला जो चाहते हैं करते हैं।”
سَأَصْرِفُ عَنْ آيَاتِيَ الَّذِينَ يَتَكَبَّرُونَ فِي الْأَرْضِ بِغَيْرِ الْحَقِّ (अल-अअराफ़: 146)
“मैं अपनी निशानियों से उन लोगों के दिलों को फेर दूँगा जो ज़मीन में नाहक़ तकब्बुर (घमंड) करते हैं।”
आयत-ए-करीमा का दूसरा हिस्सा:
وَيَهْدِي مَن يَشَاءُ
“और अल्लाह तआला जिसे चाहें हिदायत से नवाज़ें।”
यानी अल्लाह तआला सिर्फ़ उन लोगों को हिदायत के लिए चुनते हैं जिनमें उसकी तलब (चाहत) होती है।
चुनाँचे इरशाद है:
وَيَهْدِي إِلَيْهِ مَنْ أَنَابَ (अर-रअद: 27)
“और वह (अल्लाह तआला) अपनी तरफ़ आने वाले को हिदायत से सरफ़राज़ (नवाज़ते) करते हैं।”
وَالَّذِينَ جَاهَدُوا فِينَا لَنَهْدِيَنَّهُمْ سُبُلَنَا (अल-अनकबूत: 69)
“और जो लोग हमारी राह में कोशिश करते हैं हम उन्हें ज़रूर अपने रास्ते दिखाते हैं।”
يَهْدِي بِهِ اللَّهُ مَنِ اتَّبَعَ رِضْوَانَهُ سُبُلَ السَّلَامِ (अल-माइदा: 16)
“अल्लाह तआला इस (किताब) के ज़रिए उन लोगों को सलामती की राहें दिखाते हैं जो उसकी रज़ा (खुशी) के पीछे चलते हैं।”
ख़ुलासा (निष्कर्ष) यह है कि:
- अल्लाह तआला की मशिय्यत हाकिम-ए-आला है, लेकिन वह ज़ालिमाना नहीं बल्कि आदिलाना (न्यायपूर्ण) है।
- इंसान को अल्लाह तआला ने “इख़्तियार” देकर आज़माया है। जब इंसान बार-बार Free Will का इस्तेमाल करते हुए हक़ को ठुकराता है, तो अल्लाह तआला की मशिय्यत उस पर गुमराही की मोहर लगा देती है।
- “जिसे चाहते हैं” का मतलब यह नहीं कि बग़ैर किसी वजह के, बल्कि इसका मतलब यह है कि जो हिदायत या गुमराही के मुरव्वजा (स्थापित) क़ानून पर पूरा उतरता है, अल्लाह तआला उसे वही देते हैं।
आसान लफ़्ज़ों में यूँ कहा जा सकता है कि अल्लाह तआला ने इंसान को इरादा और इख़्तियार दिया है। जब इंसान खुद जान-बूझकर बुराई का रास्ता चुनता है और बार-बार हक़ को झुठलाता है, तो अल्लाह तआला उसके दिल पर मोहर लगा देते हैं। यह अल्लाह तआला की तरफ़ से “गुमराह करना” दरअसल इंसान के अपने फ़ैसले का नतीजा होता है।
जिस तरह एक उस्ताद क्लास में अपने तमाम शागिर्दों को एक साथ पढ़ाता है और निसाब-ए-तअलीम (पाठ्यक्रम) भी सबके लिए यकसाँ (एक जैसा) होता है। अब उनमें बाज़ तलबा (छात्र) तवज्जो से पढ़ाई करें और मेहनत करके इम्तिहानात के पेपर्स पूरा सही-सही हल करें, और फिर उस्ताद उन्हें पास कर दे। और उन्हीं शागिर्दों में कोई पढ़ाई पर तवज्जो न दे, और इम्तिहानात के पेपर्स भी खाली छोड़ दे, तो उस्ताद उसे फेल कर दे।
अब यह कहना कि “उस्ताद ने उसे फेल कर दिया” गलत नहीं है, क्योंकि इख़्तियार उस्ताद का था, लेकिन फेल होने की वजह खुद तालिब-ए-इल्म (छात्र) का अपना अमल था।
इसी तरह अल्लाह तआला किसी को ज़बरदस्ती गुमराह नहीं करते। इंसान जब खुद गुमराही का इंतख़ाब (चुनाव) कर लेता है, तो अल्लाह तआला उसे उसके हाल पर छोड़ देते हैं, और इसी को “युज़िल्लु मंय्यशाअ” (جسے چاہے گمراہ کر دے) कहा गया है।
अल्लाह तआला की ज़ात क़ादिर-ए-मुतलक़ (सर्वशक्तिमान) है, वही कायनात के ख़ालिक़, मौत-ओ-हयात के मालिक, और जज़ा-ओ-सज़ा का फ़ैसला फ़रमाने वाले हैं। उनकी बादशाहत में कोई उनका शरीक नहीं, उनके फ़ैसले हतमी (अंतिम) हैं, कोई उन्हें टाल नहीं सकता। जन्नत व जहन्नम, मग्फ़िरत व अज़ाब सब उन्हीं के इख़्तियार में हैं, मगर वह ऐसे हाकिम नहीं जो किसी पर नाहक़ ज़ुल्म करें, वह सरापा अद्ल-ओ-रहमत (न्याय और दया) हैं।
उनकी रहमत और इंसाफ़ के पैमाने कामिल हिकमत (पूर्ण बुद्धिमत्ता) पर मबनी (आधारित) हैं। वह अपने बंदों की अदना (छोटी) नेकी को भी नज़रअंदाज़ नहीं करते, बल्कि अज्र-ओ-सवाब में कई गुना इज़ाफ़ा फ़रमाते हैं। उनके अद्ल का तक़ाज़ा है कि जो उनके हुक्म के मुताबिक़ ज़िंदगी बसर करे, उसे बेहतरीन जज़ा दें और जो सरकशी व नाफ़रमानी का रास्ता अपनाए, उसे उसके बुरे अंजाम तक पहुँचाएँ।
इरशाद है:
إِنَّ اللَّهَ لَا يَغْفِرُ أَنْ يُشْرَكَ بِهِ وَيَغْفِرُ مَا دُونَ ذَلِكَ لِمَنْ يَشَاءُ (अन्-निसा: 48)
“बेशक अल्लाह तआला शिर्क को माफ़ नहीं करते और इसके अलावा जिसे चाहें बख़्श देते हैं।”
यहाँ “लि-मंय्यशाअ” (لِمَنْ يَشَاءُ) की वज़ाहत इस हक़ीक़त को वाज़ेह करती है कि मग़्फ़िरत (क्षमा) महज़ एक ग़ैर-मशरुत (बिना शर्त) बख़्शिश नहीं, बल्कि अल्लाह तआला के इल्म, हिकमत और बंदे के आमाल के मुताबिक़ है।
वह चाहें तो एक मामूली नेकी पर भी रहमत के दरवाज़े खोल दें और चाहें तो किसी की सरकशी पर उसे अज़ाब में मुब्तला कर दें, मगर उनका हर फ़ैसला सरासर अद्ल-ओ-इंसाफ़ पर मबनी होता है।
नबी करीम ﷺ ने हदीस-ए-क़ुदसी में अल्लाह तआला का इरशाद नक़्ल किया है:
“إِنَّ رَحْمَتِي غَلَبَتْ غَضَبِي” (बुख़ारी, मुस्लिम)
“बेशक मेरी रहमत मेरे ग़ज़ब (क्रोध) पर ग़ालिब है।”
यही वजह है कि अल्लाह तआला किसी को बिला-वजह अज़ाब में मुब्तला नहीं करते, बल्कि वह अपने बंदों को बार-बार तौबा और रुजू (वापसी) का मौक़ा फ़राहम (प्रदान) करते हैं, ताकि वे अपने आमाल की इस्लाह (सुधार) कर सकें और अपनी आख़िरत सँवार सकें।
एक दूसरी आयत में इरशाद है:
يَغْفِرُ لِمَن يَشَاءُ وَيُعَذِّبُ مَن يَشَاءُ ۚ وَاللَّهُ غَفُورٌ رَّحِيمٌ (अल-बक़रह: 284)
“जिसे चाहते हैं बख़्श देते हैं और जिसे चाहते हैं अज़ाब देते हैं और अल्लाह तआला बड़ी मग़्फ़िरत फ़रमाने वाले, रहम करने वाले हैं।”
मुस्तहिक़ीन-ए-अज़ाब (अज़ाब के हकदार) को अज़ाब देना अल्लाह तआला के अद्ल (न्याय) की बुनियाद पर होगा। जिसके जिस तरह के आमाल होंगे, उसी तरह का उसे बदला मिलेगा। अल्लाह तआला किसी पर जब्र (ज़बरदस्ती) नहीं फ़रमाते, बल्कि नतीजा ऐन मुताबिक़-ए-अद्ल होगा।
नबी करीम ﷺ इरशाद फ़रमाते हैं:
كُلُّكُمْ تَدْخُلُونَ الْجَنَّةَ إِلَّا مَنْ أَبَى، قَالُوا: يَا رَسُولَ اللَّهِ، وَمَنْ يَأْبَى؟ قَالَ: مَنْ أَطَاعَنِي دَخَلَ الْجَنَّةَ وَمَنْ عَصَانِي فَقَدْ أَبَى. (बुख़ारी)
“तुम सब जन्नत में दाख़िल होगे, सिवाय उसके जो इंकार करे। सहाबा ने अर्ज़ किया: या रसूल अल्लाह! कौन इंकार करेगा? फ़रमाया: जिसने मेरी इताअत (आज्ञाकारी) की, वह जन्नत में दाख़िल होगा, और जिसने नाफ़रमानी की, वही इंकार करने वाला है।”
إِنَّ اللَّهَ لَا يَظْلِمُ النَّاسَ شَيْئًا، وَلَكِنَّ النَّاسَ أَنفُسَهُمْ يَظْلِمُونَ (मुस्लिम)
“बेशक अल्लाह तआला लोगों पर ज़र्रा बराबर भी ज़ुल्म नहीं करते, बल्कि लोग खुद अपने ऊपर ज़ुल्म करते हैं।”
إِنَّ اللَّهَ لَا يَظْلِمُ النَّاسَ شَيْئًا، وَلَكِنَّ النَّاسَ أَنفُسَهُمْ يَظْلِمُونَ (मुस्लिम)
“बेशक अल्लाह तआला लोगों पर ज़र्रा बराबर भी ज़ुल्म नहीं करते, बल्कि लोग खुद अपने ऊपर ज़ुल्म करते हैं।”
एक शख़्स यह जानते हुए कि क़त्ल का अंजाम फाँसी या उम्र क़ैद है, फिर भी इस जुर्म का इर्तिकाब (Commit) करता है, तो ज़ाहिर है उसने अपने लिए सज़ा का फ़ैसला खुद किया हुआ है।
अल्लाह तआला ने ख़ैर-ओ-शर (भलाई और बुराई), हिदायत और ज़लालत (गुमराही) के रास्ते और उनके अंजाम वाज़ेह (स्पष्ट) कर दिए हैं। उनके ख़ालिक़ (बनाने वाले) अल्लाह तआला हैं, फ़ाइल (करने वाले) नहीं। फ़ाइल बंदा है, बंदा खुद इंतख़ाब (चुनाव) करता है कि उसे किस राह पर चलना है।
जैसे कोई मुमतहिन (Examiner) सवालनामा (Question paper) तैयार करता है, तो वह सवाल के एक दुरुस्त जवाब के साथ कई ग़लत मुतबादिल (Options) भी दर्ज कर देता है। इसका हरगिज़ यह मतलब नहीं होता कि वह तालिब-ए-इल्म को सही या ग़लत जवाब चुनने पर मजबूर कर रहा है।
सवालनामा महज़ इम्तिहान का मैदान फ़राहम करता है, इंतख़ाब की ज़िम्मेदारी तालिब-ए-इल्म की अपनी होती है। जो तालिब-ए-इल्म मेहनत और फ़हम-ओ-तवज्जो (समझ और ध्यान) से काम लेता है, वह दुरुस्त जवाब तक पहुँच जाता है, और जो ग़फ़लत या लापरवाही का शिकार होता है, वह ग़लती का रास्ता इख़्तियार कर लेता है।
इसलिए दुरुस्त और ग़लत दोनों रास्तों का सामने होना जब्र (मजबूरी) नहीं, बल्कि इख़्तियार के साथ आज़माइश है। और यही आज़माइश कामयाबी और नाकामी के दरमियान असल फ़र्क़ को नुमाया (साफ़) करती है।
निश्चित रूप से, आपके इस पैराग्राफ का देवनागरी रूप यहाँ है:
हक़ को मानने न मानने
अपने मोहसिन (उपकार करने वाले) का शुक्र और नाशुक्रगुज़ारी, और इताअत व नाफ़रमानी में इंसान को मुकम्मल आज़ादी हासिल है।
अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:
وَقُلِ الْحَقُّ مِنْ رَبِّكُمْ ۖ فَمَنْ شَاءَ فَلْيُؤْمِنْ وَمَنْ شَاءَ فَلْيَكْفُرْ ۚ (अल-कहफ़: 29)
“और आप कह दीजिए कि यह हक़ है आपके रब की तरफ़ से, फिर जो चाहे ईमान ले आए और जो चाहे इंकार कर दे।”
यह एलान इस हक़ीक़त की तरफ़ इशारा है कि ईमान का तअल्लुक़ तस्लीम-ए-ख़ातिर (मन की स्वीकृति) व तस्दीक़-ए-क़ल्ब (दिल की गवाही) से है; यह कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिसे ज़बरदस्ती किसी के दिल में बिठाया जा सके, बल्कि यह बंदे के इख़्तियार पर मुनहसिर (निर्भर) है।
इसी तरह फ़रमाया: إِنَّا هَدَيْنَاهُ السَّبِيلَ إِمَّا شَاكِرًا وَإِمَّا كَفُورًا (अद-दहर: 3)
“हमने उसे रास्ता दिखा दिया, अब चाहे शुक्रगुज़ार बने या नाशुक्रा।”
यहाँ “इम्मा शाकिरंव-व-इम्मा कफ़ूरा” के अल्फ़ाज़ इंसान के इख़्तियार की भरपूर वज़ाहत करते हैं कि अल्लाह तआला ने उसे आज़ाद पैदा किया है, उसके आमाल के नतीजे उसी पर मुरत्तब (लागू) होंगे।
जो बुराई करेगा, वह उसकी सज़ा पाएगा: مَن يَعْمَلْ سُوءًا يُجْزَ بِهِ وَلَا يَجِدْ لَهُ مِن دُونِ اللَّهِ وَلِيًّا وَلَا نَصِيرًا (निसा: 123)
“जो भी बुराई करेगा, उसे उसकी सज़ा दी जाएगी और वह अल्लाह तआला के सिवा न कोई हिमायती पाएगा और न कोई मददगार।”
आगे की आयत में अल्लाह तआला ने जज़ा-ओ-सज़ा के उसूल भी बयान फ़रमा दिए: لَهَا مَا كَسَبَتْ وَعَلَيْهَا مَا اكْتَسَبَتْ (बक़रह: 286)
“जो नेकी करेगा वह उसके हक़ में है, और जो बुराई करेगा वह उसके ख़िलाफ़ है।”
इंसान का इख़्तियार और अद्ल-ए-इलाही
यह एक नाक़ाबिल-ए-तरदीद (अकाट्य) हक़ीक़त है कि इंसान को शऊर-ओ-इख़्तियार की नेमत से सरफ़राज़ किया गया। दुनिया में वह जिस राह का इंतख़ाब करता है, उसका अंजाम भी उसी के मुताबिक़ मुक़द्दर होता है। अगर कोई शख़्स ज़ुल्म की तारीख़ियों (अंधेरों) में भटकता रहे, हवस और ख़यानत को अपना शेआर (तरीका) बना ले, दूसरों के हक़ूक़ ग़सब (छीनना) करे और झूठ व फ़रेब के सहारे अपनी दुनिया सँवारने की कोशिश करे, तो यह कैसे मुमकिन है कि आख़िरत में उसके लिए राहत-ओ-सुकून का सामान हो?
इसी तरह, एक मुख़लिस (ईमानदार) और नेकोकार शख़्स, जो तक़वा व इख़्लास की रोशनी में ज़िंदगी बसर करे, अल्लाह तआला के बंदों के साथ अद्ल-ओ-अहसान का बर्ताव करे, और हक़ व सदाक़त (सच्चाई) की राह पर गामज़न (चलना) रहे, वह कभी ख़सारे (नुक़सान) में नहीं रह सकता।
अल्लाह तआला ने ख़ैर-ओ-शर की राहें वाज़ेह (स्पष्ट) कर दी हैं, और इंसान को वह बसीरत (सूझ-बूझ) बख़्शी है जिसके ज़रिए वह अपने मुस्तक़बिल (भविष्य) का फ़ैसला खुद कर सकता है। उसकी मशिय्यत, अद्ल और रहमत एक कामिल तवाज़ुन (पूर्ण संतुलन) के साथ कार-फ़रमा हैं।
न वह किसी पर बिला-वजह अज़ाब नाज़िल करता है, न किसी को बे-सबब बख़्शिश से नवाज़ता है। बल्कि हर फ़ैसले की बुनियाद उसकी हिकमत और इंसान के आमाल पर है।
हक़ीक़ी कामयाबी उसी के हिस्से में आएगी जो ईमान और नेक आमाल की रोशनी में अपनी राह मुतअय्यन (तय) करेगा, और नामुरादी उसका मुक़द्दर होगी जो नाफ़रमानी और सरकशी को अपना वतीरा (तरीका) बना ले।
यह दुनिया महज़ एक इम्तिहान-गाह है, जहाँ हर अमल का रिकॉर्ड महफ़ूज़ हो रहा है, और आख़िरत वह अज़ीम दिन है जहाँ हर अमल का हिसाब होगा। जो शख़्स अल्लाह तआला की रहमत का तलबगार होगा, वह उसकी आग़ोश-ए-आतफ़त (स्नेह की गोद) में पनाह पाएगा, और जो अपनी सरकशी के बाइस अज़ाब का मुस्तहिक़ बनेगा, उसके लिए कोई जाए-पनाह न होगी।
इस्लाम हमें तक़दीर और इख़्तियार के माबैन (बीच) एक हसीन तवाज़ुन (संतुलन) का दर्स देता है।
नबी करीम ﷺ का इरशाद-ए-गिरामी है:
“إعْمَلُوا، فَكُلٌّ مُيَسَّرٌ لِمَا خُلِقَ لَهُ” (सहीह मुस्लिम)
“अमल करो, क्योंकि हर एक के लिए वही रास्ता आसान किया गया है जिसके लिए वह पैदा किया गया है।”
यह इरशाद हमें बावर कराता है (दिलासा देता है) कि इंसान जो कुछ भी करता है, उसके नतीजे वैसे ही बरामद होते हैं।
तक़दीर पर कामिल (पूर्ण) ईमान रखने वाला शख़्स हर हाल में मुतमइन रहता है, क्योंकि वह जानता है कि ख़ुशी व ग़म, नफ़ा व नुक़सान सब अल्लाह तआला के फ़ैसले के तहत हैं। उनकी रज़ा में राज़ी रहना ही असल कामयाबी है।
अल्लाह तआला हमें अपनी मोहब्बत की दौलत अता करें और अपने हर फ़ैसले पर कामिल रज़ा और सब्र की तौफ़ीक़ बख़्शें। आमीन।





