इस्लाम के बुनियादी अक़ायद में से एक अक़ीदा आख़िरत पर ईमान है। यह ईमान का पाँचवाँ रुकन है इसका मतलब यह है कि हम इस बात पर यक़ीन रखें कि एक दिन क़यामत बरपा होगी तमाम इंसानों को दोबारा ज़िंदा किया जाएगा और उनके आमाल का हिसाब-ओ-किताब होगा। इस दिन सालेहीन (नेक लोगों) को जन्नत की दायमी (हमेशा रहने वाली) नेअमतें और बदकारों को उनके आमाल की सज़ा मिलेगी।
आख़िरत: इंसाफ़ की तकमील
अक़ीदा-ए-आख़िरत, इंसान को इस दुनिया के बाद की ज़िंदगी की हक़ीक़त से रूशनास (परिचित) कराता है। यह अक़ीदा न सिर्फ़ मज़हबी एतबार से बल्कि अक़्ली व मंतक़ी (तार्किक) लिहाज़ से भी एक मुस्तहकम हक़ीक़त है।
दुनिया में हम देखते हैं कि अक्सर ज़ालिमों को उनके ज़ुल्म की मुकम्मल सज़ा नहीं मिल पाती है और दुनिया में मुकम्मल सज़ा, मुमकिन भी नहीं है। क्योंकि कई लोगों के क़ातिल को कई बार क़त्ल किया जाना मुमकिन नहीं है? इसी तरह हर नेकोकार को उसकी नेकी का मुकम्मल बदला मिलना भी मुश्किल है।
अगर मरने के बाद कोई ज़िंदगी न हो तो अदल-ओ-इंसाफ़ का तकाज़ा अधूरा रह जाएगा। लिहाज़ा, आख़िरत पर ईमान इस बात को यक़ीनी बनाता है कि हर शख़्स को उसके आमाल का पूरा बदला मिले।
फ़ितरत-ए-इंसानी का तकाज़ा भी यही है। क्योंकि हर इंसान के दिल में एक फ़ितरी एहसास मौजूद है कि अच्छे कामों पर जज़ा (पुरस्कार) और बुरे कामों पर सज़ा होनी चाहिए। अगर यह जज़ा-ओ-सज़ा सिर्फ़ दुनिया तक महदूद रहेगी तो इंसाफ़ मुकम्मल नहीं हो सकेगा, लिहाज़ा आख़िरत का तसव्वुर इंसानी फ़ितरत के इस बुनियादी एहसास की तकमील करता है।
अगर मौत के बाद कोई ज़िंदगी न हो तो यह दुनिया एक बे-मक़सद खेल मालूम होती है। लेकिन आख़िरत पर ईमान हमें एक आला मक़सद अता करता है, जहाँ हर अमल की क़द्र-ओ-क़ीमत है और हर अच्छे अमल का सिला मिलने वाला है।
यह अक़ीदा इंसान को बे-राह-रवी (भटकाव) से बचाकर नेकी की तरफ़ राग़िब (आकर्षित) करता है। अल्लाह तआला ने अंबिया-ए-किराम अलैहिमुस्सलाम के ज़रिए आख़िरत की ख़बर दी। क़ुरान मजीद और दीगर तमाम आसमानी किताबें इस हक़ीक़त की ताईद करती हैं कि एक दिन ऐसा आएगा जब तमाम इंसानों को उनके आमाल का हिसाब देना होगा।
आख़िरत पर ईमान की अहमियत
जब इंसान को यह यक़ीन होता है कि मरने के बाद उसे अपने हर क़ौल-ओ-फ़ेअल (कथनी और करनी) का हिसाब देना है, तो वह राह-ए-रास्त पर चलने की कोशिश करता है। यह अक़ीदा उसे ख़यानत, ज़ुल्म और बद-दियानती से रोकता है और नेकी, दियानतदारी और तक़वा की राह दिखाता है।
अल्लाह तआला फ़रमाते हैं:
وَمَن يَعْمَلْ مِثْقَالَ ذَرَّةٍ خَيْرًا يَرَهُ وَمَن يَعْمَلْ مِثْقَالَ ذَرَّةٍ شَرًّا يَرَهُ (अज़-ज़िलज़ाल: 7-8)
“जिसने ज़र्रा बराबर नेकी की होगी, वह उसे देख लेगा, और जिसने ज़र्रा बराबर बुराई की होगी, वह उसे भी देख लेगा।”
अदल-ओ-इंसाफ़ का क़ियाम
दुनिया में इंसाफ़ की तलाश में कई दिल टूटते हैं, कई आँखें अश्कबार होती हैं, और कई हक़दार अपने हक़ूक़ (अधिकारों) से महरूम रह जाते हैं। मगर एक दिन ऐसा आएगा जब न कोई ज़ुल्म होगा, न किसी की फ़रियाद दबाई जाएगी, न किसी बेगुनाह पर इल्ज़ाम लगेगा। वह दिन, जब अदल अपनी कामिल तरीन (पूर्णतम) सूरत में जल्वा-गर होगा।
यह क़यामत का दिन होगा, जब हर इंसान अपने आमाल के साथ अदालत में पेश होगा। वहाँ कोई जाह-ओ-मन्सब (पद), कोई माल-ओ-दौलत, कोई दुनियावी सिफ़ारिश काम न आएगी। सिर्फ़ सच का पलड़ा झुकेगा और हर इंसान को उसके अमल के मुताबिक़ पूरा बदला मिलेगा।
ज़ालिम का हाथ रोका जाएगा, मज़लूम की फ़रियाद सुनी जाएगी, और सबसे बढ़कर, अदल वही होगा जो अल्लाह तआला की मीज़ान (तराज़ू) में होगा। ऐसा अदल जिसमें कोई कमी या ज़्यादती नहीं।
यही वह दिन है जिसके बारे में दुनिया के मुंसिफ़ीन (न्यायाधीशों) को भी ख़बरदार किया गया था, और जिसका यक़ीन हर मोमिन के दिल में ज़िंदा रहना चाहिए। क्योंकि दुनिया के फ़ैसले कुछ भी हों, असल फ़ैसला तो उस दिन होगा, जब अदल का मीज़ान हक़ीक़ी मायनों में क़ायम होगा!
अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:
وَنَضَعُ الْمَوَازِينَ الْقِسْطَ لِيَوْمِ الْقِيَامَةِ فَلَا تُظْلَمُ نَفْسٌ شَيْئًا (अल-अंबिया: 47)
“और क़यामत के दिन हम अदल के तराज़ू रखेंगे, पस किसी पर ज़र्रा बराबर ज़ुल्म नहीं किया जाएगा।”
यह अक़ीदा इंसान को इस दुनिया में अदल-ओ-इंसाफ़ पर क़ायम रहने की तरग़ीब (प्रेरणा) देता है क्योंकि उसे मालूम होता है कि हक़ीक़ी इंसाफ़ अल्लाह तआला की अदालत में होना है।
अख़लाक़ी तरबियत और मुआशरती निज़ाम
आख़िरत पर ईमान रखने वाला इंसान बेहतर अख़लाक़ का हामिल (धारक) होता है। वह जानता है कि अगर दुनिया में उसके बुरे आमाल पोशीदा (छिपे हुए) भी रह गए, तो आख़िरत में वह ज़रूर सामने आएँगे।
यही सोच और अल्लाह तआला की नाराज़गी का ख़ौफ़ उसे मुआशरती इंसाफ़, दियानतदारी और नेकी की फ़ज़ा को फ़रोग़ (बढ़ावा) देने पर मजबूर करता है, जिससे एक मुंसिफ़ाना और पुर-अमन मुआशरा (शांतिपूर्ण समाज) तश्कील पाता है।
अबदी सफ़र का पहला ज़ीना
ज़िंदगी के हंगामों में खोए इंसान को शायद ही कभी यह एहसास होता है कि हर क़दम, हर लम्हा उसे एक ऐसी दुनिया की तरफ़ लिए जा रहा है जहाँ का पहला दरवाज़ा क़ब्र है।
यह नर्म मिट्टी की वह आग़ोश है जहाँ हर शान-ओ-शौक़त मांद पड़ जाती है, हर आवाज़ ख़ामोश हो जाती है, और हर तअल्लुक़ टूट जाता है। यह वह दरवाज़ा है जिसके उस पार न दुनिया का शोर है, न रिश्तों की हमदर्दी, न कोई चमकता सिक्का, न कोई सोने का ताज। बस आमाल की रोशनी या गुनाहों की तारीकी साथ जाती है।
यहाँ सवाल होंगे, जवाब तलब किए जाएँगे और फिर या तो एक नर्म बिस्तर नसीब होगा जहाँ से जन्नत की खिड़कियाँ खुलेंगी, या फिर ऐसा गड्ढा जहाँ ख़ौफ़ के साये दायमी (हमेशा के) साथी होंगे।
यह पहला ज़ीना है, मगर फ़ैसलाकुन। अगर यहाँ रोशनी मिली तो आगे रोशनी ही रोशनी, और अगर यहाँ अंधेरा छा गया तो आगे भी फ़क़त अंधेरा। आज वक़्त है संवारने का, कल सिर्फ़ हिसाब होगा।
नबी करीम ﷺ ने फ़रमाया:
إِنَّ الْقَبْرَ أَوَّلُ مَنَازِلِ الْآخِرَةِ، فَإِنْ نَجَا مِنْهُ فَمَا بَعْدَهُ أَيْسَرُ مِنْهُ، وَإِنْ لَمْ يَنْجُ مِنْهُ فَمَا بَعْدَهُ أَشَدُّ مِنْهُ (तिर्मिज़ी, इब्न-ए-माजा)
“क़ब्र आख़िरत की पहली मंज़िल है, अगर कोई इसमें कामयाब हो गया तो इसके बाद के मराहिल (चरण) आसान होंगे, और अगर वह इसमें नाकाम हुआ तो आगे के मराहिल और ज़्यादा सख़्त होंगे।”
अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:
حَتَّىٰ إِذَا جَاءَ أَحَدَهُمُ الْمَوْتُ قَالَ رَبِّ ارْجِعُونِ۔ لَعَلِّي أَعْمَلُ صَالِحًا فِيمَا تَرَكْتُ ۚكَلَّا ۚ إِنَّهَا كَلِمَةٌ هُوَ قَائِلُهَا ۖ وَمِن وَرَائِهِم بَرْزَخٌ إِلَىٰ يَوْمِ يُبْعَثُونَ۔ (مؤمنون)
“जब किसी को मौत आने लगती है तो कहता है, ‘ऐ मेरे परवरदिगार! मुझे (दुनिया में) वापस लौटा दीजिये ताकि अपनी छोड़ी हुई दुनिया में जाकर नेक आमाल कर लूँ’, (जबकि अब उन्हें हरगिज़ मौक़ा नहीं मिलेगा) यह तो महज़ उनकी एक बात है, उनके पस-पुश्त (पीछे) तो एक बरज़ख़ (हिजाब) है, उन्हें दोबारा उठाए जाने के दिन तक।”
रसूलुल्लाह ﷺ ने इरशाद फ़रमाया:
إِنَّ الْقَبْرَ إِمَّا رَوْضَةٌ مِنْ رِيَاضِ الْجَنَّةِ، أَوْ حُفْرَةٌ مِنْ حُفَرِ النَّارِ
(सुनन तिर्मिज़ी, मुस्नद अहमद)
“बेशक क़ब्र या तो जन्नत के बाग़ों में से एक बाग़ है या जहन्नम के गड्ढों में से एक गड्ढा है।”
अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त अज़ाब-ए-क़ब्र का ज़िक्र करते हुए इरशाद फ़रमाते हैं:
النَّارُ يُعْرَضُونَ عَلَيْهَا غُدُوًّا وَعَشِيًّا وَيَوْمَ تَقُومُ السَّاعَةُ أَدْخِلُوا آلَ فِرْعَوْनَ أَشَدَّ الْعَذَابِ (ग़ाफ़िर: 46)
“आग है जिस पर वे (फ़िरऔन और आल-ए-फ़िरऔन) सुबह और शाम पेश किए जाते हैं, और जिस दिन क़यामत क़ायम होगी (हुक्म दिया जाएगा कि) फ़िरऔन वालों को सख़्त तरीन अज़ाब में दाख़िल कर दो।”
नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इरशाद फ़रमाते हैं।
إِذَا مَاتَ أَحَدُكُمْ فَإِنَّهُ يُعْرَضُ عَلَيْهِ مَقْعَدُهُ بِالْغَدَاةِ وَالْعَشِيِّ فَإِنْ كَانَ مِنْ أَهْلِ الْجَنَّةِ فَمِنْ أَهْلِ الْجَنَّةِ وَإِنْ كَانَ مِنْ أَهْلِ النَّارِ فَمِنْ أَهْلِ النَّارِ (बुख़ारी व मुस्लिम)
अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
“जब तुम में से कोई फ़ौत (देहांत) हो जाता है तो सुबह व शाम उसके सामने उसका ठिकाना पेश किया जाता है, अगर वह जनती है तो जन्नत में उसका मक़ाम, और अगर वह जहन्नमी है तो जहन्नम में उसका मक़ाम (दिखाया जाता है)।”
(बुख़ारी, मुस्लिम)
ख़ामोश तन्हाई में
गूंजते सवालात
रात की तारीकी जैसी तन्हाई, मिट्टी की चादर ओढ़े एक अनजानी दुनिया, जहाँ न कोई हमराज़ होगा, न कोई दिलजोई करने वाला।
दुनिया के सारे रिश्ते पीछे रह जाएँगे, सिर्फ़ आमाल हमसफ़र होंगे।
और फिर, अचानक ख़ामोशी को चीरते हुए सवालात की गूंज सुनाई देगी।
“तेरा रब कौन है?”▪️
वही रब, जिसने हर लम्हा रिज़्क़ दिया, जिसने गुनाहों के बावजूद पर्दा डाले रखा, जिसकी रहमत हर ख़ता पर हावी रही। क्या ज़बान उसका नाम ले सकेगी?
“तेरा दीन क्या है?”▪️
वह दीन जो सिर्फ़ काग़ज़ों में दर्ज था, या वह दीन जो दिल की रोशनी और अमल की सूरत में ज़िंदगी का हिस्सा बना?
“तेरे नबी कौन हैं?”▪️
वह नबी ﷺ, जिनका नाम लबों पर था मगर सुन्नतों को फ़रामोश (भुला) कर दिया? या वह नबी ﷺ, जिनकी मोहब्बत दिल में उतरी और अमल में ढल गई?
जवाब मुनासिब रहा तो एक सवाल और होगा कि निसाब-ए-तअलीम (पाठ्यक्रम) क्या था? ईमान कहाँ से सीखा?
ये सवालात न सिर्फ़ लबों, बल्कि आमाल से भी जवाब माँगेंगे। अगर ज़िंदगी में ईमान दिल की गहराइयों में उतरा हो, तो क़ब्र भी जन्नत की खिड़की बन जाएगी। लेकिन अगर जवाब रुक गए, तो क़ब्र एक तंग व तारीक (अंधेरा) गड्ढा बन जाएगी।
ये सवाल हर एक से होने हैं और उनके जवाबात आज ही संवारने हैं, इससे पहले कि वक़्त की मोहर लग जाए और ज़बान ख़ामोश हो जाए।
हज़रत बरा बिन आज़िब रज़ियल्लाहु अन्हु बयान करते हैं कि नबी करीम ﷺ ने फ़रमाया:
يُثَبِّتُ اللَّهُ الَّذِينَ آمَنُوا بِالْقَوْلِ الثَّابِتِ فِي الْحَيَاةِ الدُّنْيَا وَفِي الْآخِرَةِ (सूरह इब्राहिम: 27)
“अल्लाह तआला ईमान वालों को दुनिया और आख़िरत की ज़िंदगी में सच्ची बात पर साबित-क़दम रखते हैं और ज़ालिमों को गुमराह रहने देते हैं, और अल्लाह तआला जो चाहते हैं करते हैं।”
फिर आप ﷺ ने फ़रमाया:
إِذَا أُقْعِدَ الْمُؤْمِنُ فِي قَبْرِهِ أُتِيَ فَيُشْهَدُ أَنْ لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ وَأَنَّ مُحَمَّدًا رَسُولُ اللَّهِ، فَذَاكَ قَوْلُهُ: يُثَبِّتُ اللَّهُ الَّذِينَ آمَنُوا بِالْقَوْلِ الثَّابِتِ، وَيَأْتِيهِ الْمَلَكَانِ فَيَقُولَانِ لَهُ: مَنْ رَبُّكَ؟ فَيَقُولُ: رَبِّيَ اللَّهُ، فَيَقُولَانِ: مَا دِينُكَ؟ فَيَقُولُ: دِينِيَ الْإِسْلَامُ، فَيَقُولَانِ: مَا هَذَا الرَّجُلُ الَّذِي بُعِثَ فِيكُمْ؟ فَيَقُولُ: هُوَ رَسُولُ اللَّهِ، فَيَقُولَانِ: وَمَا يُدْرِيكَ؟ فَيَقُولُ: قَرَأْتُ كِتَابَ اللَّهِ فَآمَنْتُ بِهِ وَصَدَّقْتُ
“जब मोमिन को क़ब्र में बिठाया जाता है, तो उसके पास फ़रिश्ते आते हैं और उससे सवाल करते हैं।”
▪️मन् रब्बुका? (مَنْ رَبُّكَ؟)
(तेरा रब कौन है?)
▪️वह कहता है: (رَبِّيَ اللَّهُ)
(मेरा रब अल्लाह है)
▪️दूसरा सवाल करते हैं: (مَا دِينُكَ؟)
(तेरा दीन क्या है?)
▪️वह कहता है: (دِينِيَ الْإِسْلَامُ)
(मेरा दीन इस्लाम है)
फिर नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के बारे में पूछते हैं:
▪️(مَا هَذَا الرَّجُلُ الَّذِي بُعِثَ فِيكُمْ؟)
(यह शख़्स कौन है जो तुम में भेजा गया था?)
▪️वह कहता है: (هُوَ رَسُولُ اللَّهِ)
(वह अल्लाह के रसूल ﷺ हैं)
▪️फिर फ़रिश्ते पूछते हैं: वमा युदरीका?
“तुम्हें कैसे मालूम हुआ?”
▪️वह कहता है:
(قَرَأْتُ كِتَابَ اللَّهِ فَآمَنْتُ بِهِ وَصَدَّقْت)
“मैंने अल्लाह तआला की किताब (क़ुरान करीम) पढ़ी, उस पर ईमान लाया और उसकी तस्दीक़ की।”
लेकिन जो काफ़िर और मुनाफ़िक़ होगा, वह कहेगा:
هَاهْ هَاهْ! لَا أَدْرِي سَمِعْتُ النَّاسَ يَقُولُونَ شَيْئًا فَقُلْتُهُ
“हा हा! मुझे कुछ मालूम नहीं, मैंने लोगों को कुछ कहते सुना और मैंने भी कह दिया।”
(मुस्नद अहमद, सुनन इब्न-ए-माजा, सुनन अबी दाऊद)
नबी करीम ﷺ ने फ़रमाया:
إِنَّ هَذِهِ الْأُمَّةَ تُبْتَلَى فِي قُبُورِهَا، فَلَوْلَا أَنْ لَا تَدَافَنُوا لَدَعَوْتُ اللَّهَ أَنْ يُسْمِعَكُمْ مِنْ عَذَابِ الْقَبْرِ الَّذِي أَسْمَعُ مِنْهُ (मुस्लिम)
“यह उम्मत अपनी क़ब्रों में आज़माई जाएगी, अगर यह न होता कि तुम एक दूसरे को दफ़्न करना छोड़ दोगे, तो मैं दुआ करता कि अल्लाह तुम्हें वह अज़ाब-ए-क़ब्र सुनवा दे जो मैं सुनता हूँ।”
सूर: क़यामत की गूंज
दुनिया अपनी रौनक़ में मगन है, इंसान अपने ख़्वाबों में खोया हुआ है, मगर एक दिन ऐसा आएगा जब अचानक सब कुछ रुक जाएगा। वह दिन जब अल्लाह तआला के हुक्म से इसराफ़ील अलैहिस्सलाम सूर फूँकेंगे।
और कायनात की हर शै फ़ना हो जाएगी। पहाड़ धुनी हुई रुई की मानिंद उड़ेंगे, समुंदर भड़क उठेंगे, और ज़मीन अपने राज़ उगल देगी।
यह पहला सूर होगा, जिसके साथ हर जानदार मौत की आग़ोश में चला जाएगा। फिर वक़्त की घड़ियाँ थम जाएँगी, यहाँ तक कि दूसरा सूर फूँका जाएगा, और तमाम इंसान दोबारा ज़िंदा कर दिए जाएँगे—हिसाब के लिए, जज़ा-ओ-सज़ा के फ़ैसले के लिए।
यह एक ऐसी हक़ीक़त है जिसे नज़र-अंदाज़ नहीं किया जा सकता। सूर की आवाज़ जब बुलंद होगी, तो कोई पनाह नहीं मिलेगी, सिवाए उनके जो दुनिया में आख़िरत के लिए तैयारी कर चुके होंगे।
आज का दिन तैयारी का है, कल सिर्फ़ हिसाब होगा।
अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:
وَنُفِخَ فِي الصُّورِ فَصَعِقَ مَنْ فِي السَّمَاوَاتِ وَمَنْ فِي الْأَرْضِ إِلَّا مَنْ شَاءَ اللَّهُ، ثُمَّ نُفِخَ فِيهِ أُخْرَى فَإِذَا هُمْ قِيَامٌ يَنْظُرُونَ (अज़-ज़ुमर: 68)
“और सूर में फूँका जाएगा तो जो भी आसमानों और ज़मीन में हैं वे बेहोश हो जाएँगे, सिवाए उनके जिन्हें अल्लाह तआला चाहें। फिर इसमें दोबारा फूँका जाएगा तो वे फ़ौरन खड़े होकर देखने लगेंगे।”
नबी करीम ﷺ ने फ़रमाया:
كَيْفَ أَنْعَمُ وَقَدِ الْتَقَمَ صَاحِبُ الْقَرْنِ الْقَرْنَ وَحَنَى جَبْهَتَهُ، يَسْتَمِعُ مَتَى يُؤْمَرُ بِالنَّفْخِ فَيَنْفُخُ (मुस्नद अहमद)
“मैं कैसे खुश रह सकता हूँ जबकि सूर फूँकने वाला फ़रिश्ता सूर को मुँह में ले चुका है, और अपना माथा झुकाए हुए हुक्म का मुंतज़िर (इंतज़ार में) है कि कब उसे फूँकने का हुक्म दिया जाए।”
बअस बाद अल-मौत — जब ज़िंदगी फिर लौटेगी
मौत, जिसे इंसान हमेशा अंजाम समझता है, दरहक़ीक़त एक नए सफ़र की इब्तिदा (शुरुआत) है। यह वह दरवाज़ा है जिसके पार एक ऐसी ज़िंदगी मुंतज़िर है, जो न ख़त्म होगी, न मांद पड़ेगी। दुनिया की नींद ख़त्म होगी, और अबदी बेदारी का वक़्त आन पहुँचेगा।
जब सूर फूँका जाएगा, और हर ज़िंदा ख़ाक में मिल चुका होगा, फिर ज़मीन अपने राज़ वापस लौटाएगी, क़ब्रें खुलेंगी, और हर नफ़्स दोबारा ज़िंदा कर दिया जाएगा। कुछ चेहरे नूर में दमक रहे होंगे, और कुछ शर्मिंदगी और ख़ौफ़ के साये में लर्ज़ रहे होंगे।
आमाल का दफ़्तर खुलेगा, मीज़ान नसब होगा, और हर ज़र्रे का हिसाब होगा। वे जो दुनिया में आख़िरत को फ़रामोश कर बैठे हैं, हसरत से हाथ मलेंगे, और वे जो ईमान और अमल-ए-सालेह के चिराग़ जलाए रहे, रहमत की छाँव में दाख़िल होंगे।
बअस बाद अल-मौत एक इंकार न की जा सकने वाली हक़ीक़त है, जो हर इंसान के इंतज़ार में है। यह ज़िंदगी एक पल की मानिंद है, और मौत सिर्फ़ एक दरवाज़ा। असल क़ियाम तो उस जहाँ में है, जहाँ हर चीज़ हमेशा के लिए बाक़ी रहेगी।
अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:
وَأَنَّ اللَّـهَ يَبْعَثُ مَن فِي الْقُبُورِ (अल-हज)
“और बेशक अल्लाह तआला उन लोगों को जो क़ब्रों में हैं (क़यामत के दिन) उठाएँगे।”
सूरह बक़रह में है:
अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:
كَيْفَ تَكْفُرُونَ بِاللَّهِ وَكُنتُمْ أَمْوَاتًا فَأَحْيَاكُمْ ثُمَّ يُمِيتُكُمْ ثُمَّ يُحْيِيكُمْ ثُمَّ إِلَيْهِ تُرْجَعُونَ (अल-बक़रह: 28)
“तुम अल्लाह तआला के साथ कैसे कुफ़्र कर सकते हो? हालाँकि तुम बे-जान थे, तुम्हें ज़िंदगी अता की, फिर वह तुम्हें मौत देंगे, और फिर तुम्हें दोबारा ज़िंदा करेंगे, फिर तुम अल्लाह तआला की तरफ़ लौटाए जाओगे।”
नबी करीम ﷺ ने फ़रमाया:
يُحْشَرُ النَّاسُ يَوْمَ الْقِيَامَةِ حُفَاةً، عُرَاةً، غُرْلًا (बुख़ारी, मुस्लिम)
“क़यामत के दिन लोग नंगे पाँव, नंगे बदन और बग़ैर ख़तना किए हुए उठाए जाएँगे।”
नबी करीम ﷺ ने फ़रमाया:
يُحْشَرُ النَّاسُ يَوْمَ الْقِيَامَةِ حُفَاةً، عُرَاةً، غُرْلًا (बुख़ारी, मुस्लिम)
“क़यामत के दिन लोग नंगे पाँव, नंगे बदन और बग़ैर ख़तना किए हुए उठाए जाएँगे।”
मीज़ान पर पेशी
वक़्त की सुई जब अपनी आख़िरी गर्दिश पूरी कर लेगी। जब सूरज सवा नेज़े पर होगा और इंसान पसीने में डूबा होगा, तब वह लम्हा आएगा, जिससे कोई न बच सकेगा।
मीज़ान पर पेशी
यहाँ कोई सिक्का नहीं चलेगा, कोई हीला (बहाना) काम नहीं आएगा, कोई ज़बान सफ़ाई न दे सकेगी…
बस आमाल होंगे और तराज़ू!…
एक पलड़े में नेकियों का नूर होगा और दूसरे में गुनाहों का बोझ।
यहाँ वे सजदे गवाही देंगे जो रात की तन्हाई में किए गए, वे क़तरे चमकेंगे जो तौबा के आँसू बनकर बहे, वह सदक़ा झिलमिलाएगा जो किसी ज़रूरत मंद के हाथ में दिया गया।
लेकिन वे भी आएँगे जिनके हाथ खाली होंगे, जिनकी गठरी में दुनिया की मोहब्बत तो थी मगर नेकियाँ न थीं, जिन्होंने वक़्त को ज़ाया (बर्बाद) किया और गुनाहों के बोझ को हल्का समझा।
तराज़ू झुकेगा और फ़ैसला सुनाया जाएगा। यह कामयाब हुआ या फिर, “यह ख़सारे (नुकसान) में पड़ गया।”
यह वह दिन है जिसकी तैयारी आज मुमकिन है, वरना कल तराज़ू तोलेगा, मगर हाथ कुछ भी न थाम सकेंगे।
अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:
يَوْمَ نَحْشُرُهُم جَمِيعًا ثُمَّ نَقُولُ لِلَّذِينَ أَشْرَكُوا مَكَانَكُمْ أَنتُمْ وَشُرَكَاؤُكُمْ (यूनुस: 28)
“जिस दिन हम सबको इकट्ठा करेंगे, फिर मुशरिकों से कहेंगे: अपनी जगह खड़े हो जाओ तुम और तुम्हारे शरीक।”
नबी करीम ﷺ ने फ़रमाया:
إِنَّ الشَّمْسَ تَدْنُو يَوْمَ الْقِيَامَةِ حَتَّى يَبْلُغَ الْعَرَقُ نِصْفَ الْأُذُنِ (मुस्लिम)
“क़यामत के दिन सूरज क़रीब आ जाएगा, यहाँ तक कि पसीना आधे कान तक पहुँच जाएगा।”
अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:
فَأَمَّا مَنْ أُوتِيَ كِتَابَهُ بِيَمِينِهِ، فَسَوْفَ يُحَاسَبُ حِسَابًا يَسِيرًا (अल-इनशिकाक़: 7-8)
“जिसको उसका नामा-ए-आमाल उसके दाएँ हाथ में दिया जाएगा, तो उससे आसान हिसाब लिया जाएगा।”
नबी करीम ﷺ फ़रमाते हैं:
لَا تَزُولُ قَدَمَا عَبْدٍ يَوْمَ الْقِيَامَةِ حَتَّى يُسْأَلَ عَنْ أَرْبَعٍ: عَنْ عُمْرِهِ فِيمَا أَفْنَاهُ، وَعَنْ عِلْمِهِ مَاذَا عَمِلَ فِيهِ، وَعَنْ مَالِهِ مِنْ أَيْنَ اكْتَسَبَهُ وَفِيمَا أَنْفَقَهُ، وَعَنْ جِسْمِهِ فِيمَا أَبْلَاهُ. (सुनन तिर्मिज़ी, सुनन अद-दारमी)
“क़यामत के दिन किसी बंदे के क़दम उस वक़्त तक नहीं हटेंगे जब तक उससे चार चीज़ों के बारे में सवाल न कर लिया जाए:
उम्र कहाँ गुज़ारी?▪️
इल्म पर कहाँ तक अमल किया?▪️
माल कहाँ से कमाया और कहाँ खर्च किया?▪️
जिस्म कहाँ बर्बाद किया?▪️
और आप ﷺ ने फ़रमाया:
إِنَّ أَوَّلَ مَا يُحَاسَبُ بِهِ الْعَبْدُ يَوْمَ الْقِيَامَةِ مِنْ عَمَلِهِ صَلَاتُهُ” (सुनन तिर्मिज़ी)
क़यामत के दिन सबसे पहले बंदे के आमाल में से नमाज़ का हिसाब लिया जाएगा।
जन्नत-ओ-जहन्नम का अबदी फ़ैसला
दुनिया फ़रेब है, मगर अंजाम हक़ीक़त!
एक दिन अदालत लगेगी, आमाल के दफ़्तर खुलेंगे, और हर इंसान अपने किए का बदला पाएगा, फिर या तो जन्नत का दरवाज़ा खुलेगा, या जहन्नम की आग लपक उठेगी।
जन्नत, जहाँ न कोई ग़म, न मलाल, बस सुकून, राहत और दायमी (हमेशा रहने वाली) मुस्कुराहटें। और जहन्नम, जहाँ चीख़-ओ-पुकार बे-असर होगी, आँखें हसरत से नम होंगी, मगर कोई बचाने वाला न होगा।
वह लम्हा क़रीब है जब मोहलत ख़त्म हो जाएगी और फ़ैसला हमेशा के लिए सब्त (निश्चित) हो जाएगा।
आज रास्ता चुन लो, क्योंकि कल सिर्फ़ अंजाम बाक़ी रहेगा!
अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:
فَرِيقٌ فِي الْجَنَّةِ وَفَرِيقٌ فِي السَّعِيرِ (अश-शूरा: 7)
“एक गिरोह जन्नत में होगा और एक गिरोह जहन्नम में।”
नबी करीम ﷺ ने फ़रमाया:
يُقَالُ لِأَهْلِ الْجَنَّةِ: يَا أَهْلَ الْجَنَّةِ، خُلُودٌ لَا مَوْتَ وَلِأَهْلِ النَّارِ: يَا أَهْلَ النَّارِ، خُلُودٌ لَا مَوْतَ (मुस्लिम)
“जन्नत वालों से कहा जाएगा: ऐ जन्नत वालो! तुम्हें हमेशा रहना है, कोई मौत नहीं। और जहन्नम वालों से कहा जाएगा: ऐ जहन्नम वालो! तुम हमेशा रहोगे, अब मौत नहीं आएगी।”
اللَّهُمَّ أَجِرْنَا مِنَ النَّارِ، اللَّهُمَّ اجْعَلْنَا مِنْ عِبَادِكَ الصَّالِحِينَ، وَأَدْخِلْنَا جَنَّاتِكَ بِرَحْمَتِكَ، وَنَجِّनَا مِنْ عَذَابِكَ يَا رَحْمَٰنُ يَا رَحِيمُ
(ऐ अल्लाह! हमें आग से पनाह दे। ऐ अल्लाह! हमें अपने नेक बंदों में शामिल फ़रमा, और हमें अपनी रहमत से अपनी जन्नतों में दाख़िल फ़रमा, और हमें अपने अज़ाब से निजात दे, ऐ रहमान, ऐ रहीम!)
आमीन





